लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
Page 164 of 268
Read in context( १४८ ) लीलावती । अर्थ:-उन हीं भुजाओंमें कर्ण अनेक प्रकारके हो जाते हैं; तिससे क्षेत्रफल भी अनेक प्रकारका होता है ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्यान्तः प्रवेश्यमानौ भुजौ तत्संसक्तं कर्णं संकोचयतः, इतरौ तु बहिः प्रसरन्तौ स्वकर्णं वर्द्धयतः अत उक्तम्- "तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णाविति" ॥ अर्थ:-चतुर्भुजक्षेत्रमें एक एक बीचका कोना छोड़कर सन्मुखके दोनों कोणोंको खैंचनेसे भीतरको घुसते हुए भुज अपनेसे मिले हुए अपने कर्णको संकुचित करते हैं और जो भुज खैंचनेसे बाहरको फैलते हैं; वह अपने कर्णको बढ़ाते हैं; इसी- कारण ऊपर कहा है कि कर्णोंके अनेक प्रकार होनेसे फल भी अनेक प्रकारका होता है; परन्तु भुज वही रहते हैं, क्योंकि, कोनोंके खैंचनेसे वह कण तो बढ़ेगा और दूसरा कर्ण छोटा होगा तो कर्ण अनेक प्रकारके होंगे; इसी कारण उसी क्षेत्रके फल भी बहुत रीतिंके होंगे ॥ लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरः कथम् ॥ पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतञ्चापि तत्फलम् ॥ १ ॥ स पृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ॥ यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥ २ ॥ अन्वयः-अपरः लम्बयोः वा कर्णयोः एकम् अनिर्दिश्य अनियतत्त्वेऽपि नियतं तत्फलं कथम् पृच्छति ॥ १ ॥ सः पिशाचः पृच्छकः वा वक्ता अपि ततः नितरां पिशाचः यः चतुर्बाहुक्षेत्रस्य अनियतां स्थितिम् न वेत्ति ॥ २ ॥ अर्थः-जो चतुर्भुज क्षेत्रके फलका प्रश्न करनेवाला लम्ब या कर्ण एक भी बिना कहे अनियत होनेपर भी चतुर्भुजका नियत फल बूझता है वह पिशाच तुल्य है यदि वक्ता उत्तर देनेको तैयार हो तो वह प्रश्न करनेवालेसे भी बडा पिशाच है क्योंकि जो चतुर्भुजकी अनियत फलकी स्थितिको नहीं जानता है ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ समचतुर्भुजायतयोः फलानयने करणसूत्रं सार्द्धश्लोकद्वयम्- समचतुर्भुज और आयतचतुर्भुजके फल लानेकी रीति ढाई श्लोकमें- इष्टा श्रुतिस्तुल्यचतुर्भुजस्य कल्प्या च तद्वर्गविवर्जिता या ॥२१॥ चतुर्गुणा बाहुकृतिस्तदीयं मूलं द्वितीय- श्रवणप्रमाणम्॥अतुल्यकर्णाभिहतिर्द्विभक्ता फलं स्फुटं