लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextक्षेत्रव्यवहारः । (१४९) तुल्यचतुर्भुजे स्यात् ॥२२॥ समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे च तथाऽऽयते तद्भुजकोटिघातः ॥ चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्॥ २३ ॥ अन्वयः-तुल्यचतुर्भुजस्येष्टा श्रुतिः कल्प्या तद्वर्गविवर्जिता या चतुर्गुणाबाहुकृतिः तदयिम् मूलं ग्राह्यम् तत् द्वितीयश्रवणप्रमाणम् भवेत् । अतुल्यकर्णाभिहतिःद्विभक्ता कार्य्या तदा फलं तुल्यचतुर्भुजे स्फुटं स्यात् । समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे तथा आयते चतुर्भुजे च तद्भुजकोटिघातः फलं स्यात् । अन्यत्र समानलम्बे क्षेत्रे कुमुखैक्यखंडं लम्बेन निघ्नम् फलम् भवति ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अर्थ-समचतुर्भुजक्षेत्रमें एक इष्ट कर्ण कल्पना करै; फिर कल्पना किये हुए कर्णका वर्ग करनेसे जो अङ्क हों उनको चार ४ से गुणा किय हुए भुजके वर्गमें घटावे, जो शेष रहे उसका मूल ले वह दूसरा कर्ण होता है. चतुर्भुजमें अतुल्य कर्णोंका घातकर जो अङ्क हों उनमें दोका भाग दे तब जो फल मिलता है वह तुल्य चतुर्भुजमें स्पष्ट फल होगा; समकर्णतुल्यचतुर्भुजमें तथा समकर्ण आयतचतुर्भुजमें उस क्षेत्रकी भुजकोटिका घात करनेसे क्षेत्रफल होता है और समानलम्बविषमचतुर्भुजमें पृथ्वी और मुखका योगकर आधा कर ले; तब जो अङ्क हों उनको लम्बसे गुणा कर दे, तब क्षेत्रफल मिलता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अत्रोद्देशकः-समचतुर्भुज, समकर्णचतुर्भुज तथा आयतचतुर्भुजका उदाहरण- क्षेत्रस्य पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य कर्णौ ततश्च गणितं गणक प्र चक्ष्व ॥ तुल्यश्रुतैश्च खलु तस्य तथायतस्य यद्विस्तृती रस- मिताष्टमितञ्च दैर्घ्यम् ॥ १७ ॥ अन्वयः-हे गणक ! पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य क्षेत्रस्य कर्णौ ततः गणितं च प्रचक्ष्व तथा तुल्यश्रुतेः गणितम् प्रचक्ष्व खलु यद्विस्तृतिः रसमिता दैर्घ्य च अष्टमितं तस्य आयतस्य च गणितम् प्रचक्ष्व ॥ १७ ॥ अर्थः-हे गणक ! पांचका वर्ग अर्थात् २५ तुल्य चारों भुजावाले, चतुर्भुजक्षेत्रके दोनों कर्ण और क्षेत्रफल भी कहो; तथा समकर्ण समचतुर्भुजका क्षेत्रफल कहो; और जहां चौडाई ६ है और लम्बाई ८ आठ है उस समकर्ण आयतचतुर्भुजक भी क्षेत्रफल कहो ॥ १७ ॥