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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 359 of 2256

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Page 359

उग्रश्रवाजी कहते हैं— राजाके सब मन्त्री धर्मज्ञ और बुद्धिमान् थे। उन महात्मा राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर वे सभी उनसे यों बोले ॥ ५ ॥

मन्त्रिण ऊचुः

शृणु पार्थिव यद् ब्रूषे पितुस्तव महात्मनः ।
चरितं पार्थिवेन्द्रस्य यथा निष्ठां गतश्च सः ॥ ६ ॥
मन्त्रियोंने कहा— भूपाल! तुम जो कुछ पूछते हो, वह सुनो। तुम्हारे महात्मा पिता राजराजेश्वर परीक्षित्का चरित्र जैसा था और जिस प्रकार वे मृत्युको प्राप्त हुए वह सब हम बता रहे हैं ॥ ६ ॥

धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव ।
आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ॥ ७ ॥
महाराज! आपके पिता बड़े धर्मात्मा, महात्मा और प्रजापालक थे। वे महामना नरेश इस जगत्में जैसे आचार-व्यवहारका पालन करते थे, वह सुनो ॥ ७ ॥

चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्य्यरक्षत ।
धर्मतो धर्मविद् राजा धर्मो विग्रहवानिव ॥ ८ ॥
वे चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें स्थापित करके उन सबकी धर्मपूर्वक रक्षा करते थे। राजा परीक्षित् केवल धर्मके ज्ञाता ही नहीं थे, वे धर्मके साक्षात् स्वरूप थे ॥ ८ ॥

ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः ।
द्वेष्टारस्तस्य नैवासन् स च द्वेष्टि न कंचन ॥ ९ ॥
उनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी। वे श्रीसम्पन्न होकर इस वसुधादेवीका पालन करते थे। जगत्में उनसे द्वेष रखनेवाले कोई न थे और वे भी किसीसे द्वेष नहीं रखते थे ॥ ९ ॥

समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु ॥ १० ॥
स्थिताः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वधिष्ठिताः ।
विधवानाथविकलान् कृपणांश्च बभार सः ॥ ११ ॥
प्रजापति ब्रह्माजीके समान वे समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखते थे। राजन्! महाराज परीक्षित्के शासनमें रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें संलग्न और प्रसन्नचित्त रहते थे। वे महाराज विधवाओं, अनाथों, अंगहीनों और दीनोंका भी भरण-पोषण करते थे ॥ १०-११ ॥

सुदर्शः सर्वभूतानामासीत् सोम इवापरः ।
तुष्टपुष्टजनः श्रीमान् सत्यवाग् दृढविक्रमः ॥ १२ ॥