महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
राजा परीक्षित्के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार
शौनक उवाच
यदपृच्छत् तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजयः।
पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद॥ १॥
**शौनकजी बोले—**सूतनन्दन! राजा जनमेजयने (उत्तंककी बात सुनकर) अपने पिता परीक्षित्के स्वर्गवासके सम्बन्धमें मन्त्रियोंसे जो पूछ-ताछ की थी, उसका आप विस्तारपूर्वक पुनः वर्णन कीजिये॥ १॥
सौतिरुवाच
शृणु ब्रह्मन् यथापृच्छन्मन्त्रिणो नृपतिस्तदा।
यथा चाख्यातवन्तस्ते निधनं तत् परीक्षितः॥ २॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**ब्रह्मन्! सुनिये, उस समय राजाने मन्त्रियोंसे जो कुछ पूछा और उन्होंने परीक्षित्की मृत्युके सम्बन्धमें जैसी बातें बतायीं, वह सब मैं सुना रहा हूँ॥ २॥
जनमेजय उवाच
जानन्ति स्म भवन्तस्तद् यथा वृत्तं पितुर्मम।
आसीद् यथा स निधनं गतः काले महायशाः॥ ३॥
**जनमेजयने पूछा—**आपलोग यह जानते होंगे कि मेरे पिताके जीवनकालमें उनका आचार-व्यवहार कैसा था? और अन्तकाल आनेपर वे महायशस्वी नरेश किस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुए थे?॥ ३॥
श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः।
कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातुचित्॥ ४॥
आपलोगोंसे अपने पिताके सम्बन्धमें सारा वृत्तान्त सुनकर ही मुझे शान्ति प्राप्त होगी; अन्यथा मैं कभी शान्त न रह सकूँगा॥ ४॥
सौतिरुवाच
मन्त्रिणोऽथाब्रुवन् वाक्यं पृष्टास्तेन महात्मना।
सर्वे धर्मविदः प्राज्ञा राजानं जनमेजयम्॥ ५॥