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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 524 of 2256

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Page 524

उपस्पृष्टुं गतश्चाहमपश्यं शयितामिमाम् ॥ १३ ॥
निर्जने विपिने रम्ये शकुन्तैः परिवारिताम् ।
(मां दृष्ट्वैवान्वपद्यन्त पादयोः पतिता द्विजाः ।
अब्रुवंश्छकुनाः सर्वे कलं मधुरभाषिणः ॥
इस प्रकार वहाँ शकुन्त ही मेनकाकुमारीकी रक्षा कर रहे थे। उसी समय आचमन करनेके लिये जब मैं मालिनीतटपर गया तो देखा—यह रमणीय निर्जन वनमें पक्षियोंसे घिरी हुई सो रही है। मुझे देखते ही वे सब मधुरभाषी पक्षी मेरे पैरोंपर गिर गये और सुन्दर वाणीमें इस प्रकार कहने लगे ॥ १३ १/२ ॥

द्विजा ऊचुः
विश्वामित्रसुतां ब्रह्मन् न्यासभूतां भरस्व वै ।
कामक्रोधावजितवान् सखा ते कौशिकीं गतः ॥
तस्मात् पोषय तत्पुत्रीं दयावानिति तेऽब्रुवन् ।
**पक्षी बोले—**ब्रह्मन्! यह विश्वामित्रकी कन्या आपके यहाँ धरोहरके रूपमें आयी है। आप इसका पालन-पोषण कीजिये। कौशिकीके तटपर गये हुए आपके सखा विश्वामित्र काम और क्रोधको नहीं जीत सके थे। आप दयालु हैं; इसलिये उनकी पुत्रीका पालन कीजिये। इस प्रकार पक्षियोंने कहा।

कण्व उवाच
सर्वभूतरुतज्ञोऽहं दयावान् सर्वजन्तुषु ।
निर्जनेऽपि महारण्ये शकुनैः परिवारिताम् ॥)
आनयित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्यवेशयम् ॥ १४ ॥
**कण्व मुनि कहते हैं—**ब्रह्मन्! मैं समस्त प्राणियोंकी बोली समझता हूँ और सब जीवोंके प्रति दयाभाव रखता हूँ। अतः उस निर्जन महावनमें पक्षियोंसे घिरी हुई इस कन्याको वहाँसे लाकर मैंने इसे अपनी पुत्रीके पदपर प्रतिष्ठित किया ॥ १४ ॥

शरीरकृत् प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते ।
क्रमेणैते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने ॥ १५ ॥
जो गर्भाधानके द्वारा शरीरका निर्माण करता है, जो अभयदान देकर प्राणोंकी रक्षा करता है और जिसका अन्न भोजन किया जाता है, धर्मशास्त्रमें क्रमशः ये तीनों पुरुष पिता कहे गये हैं ॥ १५ ॥

निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिवारिता ।
शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मया ॥ १६ ॥
निर्जन वनमें इसे शकुन्तोंने घेर रखा था, इसलिये ‘शकुन्तान् लाति रक्षकत्वेन गृह्णाति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार इस कन्याका नाम मैंने ‘शकुन्तला’ रख दिया ॥ १६ ॥