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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 539 of 2256

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Page 539

'सती स्त्रियोंके लिये सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वे मन, वाणी, शरीर और चेष्टाओंद्वारा निरन्तर पतिकी सेवा करती रहें। मैंने पहले भी तुम्हें इसके लिये आदेश दिया है। तुम अपने इस व्रतका पालन करो। इस पतिव्रतोचित आचार-व्यवहारसे ही विशिष्ट शोभा प्राप्त कर सकोगी।

तस्माद् भद्रे प्रयातव्यं समीपं पौरवस्य ह ।।
स्वयं नायाति मत्वा ते गतं कालं शुचिस्मिते ।
गत्वाऽऽराध्य राजानं दुष्मन्तं हितकाम्यया ।।
'भद्रे! तुम्हें पूरुनन्दन दुष्मन्तके पास जाना चाहिये। वे स्वयं नहीं आ रहे हैं, ऐसा सोचकर तुमने बहुत-सा समय उनकी सेवासे दूर रहकर बिता दिया। शुचिस्मिते! अब तुम अपने हितकी इच्छासे स्वयं जाकर राजा दुष्मन्तकी आराधना करो।
दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्ट्वा प्रीतिमवाप्स्यसि ।
देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि ।
भर्तॄणां च विशेषेण हितं संगमनं सताम् ।।
तस्मात् पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया ।
प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शापिता मम पादयोः ।।
'वहाँ दुष्मन्तकुमार सर्वदमनको युवराज-पदपर प्रतिष्ठित देख तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। देवता, गुरु, क्षत्रिय, स्वामी तथा साधु पुरुष—इनका संग विशेष हितकर है। अतः बेटी! तुम्हें मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे कुमारके साथ अवश्य अपने पतिके यहाँ जाना चाहिये। मैं अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम मुझे मेरी इस आज्ञाके विपरीत कोई उत्तर न देना'।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वोऽभ्यभाषत ।
परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्ध्युपाघ्राय पौरवम् ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**पुत्रीसे ऐसा कहकर महर्षि कण्वने उसके पुत्र भरतको दोनों बाँहोंसे पकड़कर अंकमें भर लिया और उसका मस्तक सूँघकर कहा।

कण्व उवाच

सोमवंशोद्भवो राजा दुष्मन्तो नाम विश्रुतः ।
तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता ।।
गन्तुकामा भर्तृवशं त्वया सह सुमध्यमा ।
गत्वाभिवाद्य राजानं यौवराज्यमवाप्स्यसि ।।
स पिता तव राजेन्द्रस्तस्य त्वं वशगो भव ।
पितृपैतामहं राज्यमनुतिष्ठस्व भावतः ।।