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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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पूरुको उसकी जवानी लौटाकर राजाने उसे राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और भोगोंसे अतृप्त रहकर ही अपने पुत्र पूरुसे कहा— ।। ५५ ।।
त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः ।
पौरवो वंश इति ते ख्यातिं लोके गमिष्यति ।। ५६ ।।
‘बेटा! तुम्हारे-जैसे पुत्रसे ही मैं पुत्रवान् हूँ। तुम्हीं मेरे वंश-प्रवर्तक पुत्र हो। तुम्हारा वंश इस जगत्में पौरव वंशके नामसे विख्यात होगा' ।। ५६ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः स नृपशार्दूल पूरुं राज्येऽभिषिच्य च ।
ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुङ्गे महातपाः ।। ५७ ।।
कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान् ।
कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान् ।। ५८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर पूरुका राज्याभिषेक करनेके पश्चात् राजा ययातिने अपनी पत्नियोंके साथ भृगुतुंग पर्वतपर जाकर सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेके बाद स्त्रियोंसहित निराहार व्रत करके उन्होंने स्वर्गलोक प्राप्त किया ।। ५७-५८ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७५ ।।


* वास्तवमें इला माता ही थी। जन्मदाता पिता चन्द्रमाके पुत्र बुध थे, परंतु इला जब पुरुषरूपमें परिणत हुई तो उसका नाम सुद्युम्न हुआ। सुद्युम्नने ही पुरूरवाको राज्य दिया था, इसलिये वे पिता भी कहे जाते हैं।