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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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उन्होंने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ दीर्घकालतक विहार करके चैत्ररथ वनमें जाकर विश्वाची अप्सराके साथ रमण किया ।। ४८ ।।

नाध्यगच्छत् तदा तृप्तिं कामानां स महायशाः । अवेत्य मनसा राजन्निमां गाथां तदा जगौ ।। ४९ ।।

परंतु उस समय भी महायशस्वी ययाति काम-भोगसे तृप्त न हो सके। राजन्! उन्होंने मनसे विचारकर यह निश्चय कर लिया कि विषयोंके भोगनेसे भोगेच्छा कभी शान्त नहीं हो सकती। तब राजाने (संसारके हितके लिये) यह गाथा गायी— ।। ४९ ।।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ।। ५० ।।

‘विषय-भोगकी इच्छा विषयोंका उपभोग करनेसे कभी शान्त नहीं हो सकती। घीकी आहुति डालनेसे अधिक प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है’ ।। ५० ।।

पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।। ५१ ।।

‘रत्नोंसे भरी हुई सारी पृथिवी, संसारका सारा सुवर्ण, सारे पशु और सुन्दरी स्त्रियाँ किसी एक पुरुषको मिल जायँ, तो भी वे सब-के-सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे। वह और भी पाना चाहेगा। ऐसा समझकर शान्ति धारण करे—भोगेच्छाको दबा दे ।। ५१ ।।

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ५२ ।।

‘जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसी भी प्राणीके प्रति बुरा भाव नहीं करता, तब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है’ ।। ५२ ।।

यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ५३ ।।

‘जब सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि होनेके कारण यह पुरुष किसीसे नहीं डरता और जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह न तो किसीकी इच्छा करता है और न किसीसे द्वेष ही रखता है, उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है’ ।। ५३ ।।

इत्यवेक्ष्य महाप्राज्ञः कामानां फल्गुतां नृप । समाधाय मनो बुद्ध्या प्रत्यगृह्णाज्जरां सुतात् ।। ५४ ।।

जनमेजय! परम बुद्धिमान् महाराज ययातिने इस प्रकार भोगोंकी निःसारताका विचार करके बुद्धिके द्वारा मनको एकाग्र किया और पुत्रसे अपना बुढ़ापा वापस ले लिया ।।

दत्त्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिषिच्य च । अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह ।। ५५ ।।