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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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तात! वे ब्रह्मचर्यपालनमें रत थे, तपस्या ही उनका धन था। वे सदा ही सजग रहनेवाले और कार्य करनेमें कुशल थे। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय थे। वे सदा मेरे मनके अनुरूप चलते थे। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गये हैं, वहीं मैं भी चली जाऊँगी ।। ५० ।।

वैशम्पायन उवाच

स पीडितो देवयान्या महर्षिः समाह्वयत् संरम्भाच्चैव काव्यः । असंशयं मामसुरा द्विषन्ति ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति ।। ५१ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी हुए महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं ।। ५१ ।।

अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा- स्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम् । अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ।। ५२ ।।

'ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो? ।। ५२ ।।

गुरोर्हि भीतो विद्यया चोपहूतः शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार ।

जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठे हुए कच भयभीत हो धीरेसे बोले।

(कच उवाच

प्रसीद भगवन् मह्यं कचोऽहमभिवादये । यथा बहुमतः पुत्रस्तथा मन्यतु मां भवान् ॥)

**कचने कहा—**भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न हों, मैं कच हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। जैसे पुत्रपर पिताका बहुत प्यार होता है, उसी प्रकार आप मुझे भी अपना स्नेहभाजन समझें।

वैशम्पायन उवाच