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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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तमब्रवीत् केन पथोsystem- स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र ।। ५३ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**उनकी आवाज सुनकर शुक्राचार्यने पूछा—'विप्र! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये? ठीक-ठीक बताओ' ।। ५३ ।।

कच उवाच

तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः स्मरामि सर्वं यच्च यथा च वृत्तम् । न त्वेवं स्यात् तपसः संक्षयो मे ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि ।। ५४ ।। **कचने कहा—**गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई है, वह सब मुझे याद है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल आनेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसीलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ ।। ५४ ।।

असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य । ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत् ।। ५५ ।। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया! विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लंघन कैसे कर सकता है? ।। ५५ ।।

शुक्र उवाच

किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से वधेन मे जीवितं स्यात् कचस्य । नान्यत्र कुक्षैर्मम भेदनेन दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि ।। ५६ ।। **शुक्राचार्य बोले—**बेटी देवयानी! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके सिवा और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे ।। ५६ ।।

देवयान्युवाच

द्वौ मां शोकाग्निकल्पौ दहेतां कचस्य नाशतस्तव चैवोपघातः ।