महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदृष्ट्वा च तं पतितं ब्रह्मराशि- मुत्थापयामास मृतं कचोऽपि । विद्यां सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ॥ ६२ ॥
मूर्तिमान् वेदराशिके तुल्य शुक्राचार्यको भूमिपर पड़ा देख कचने भी अपने मरे हुए गुरुको विद्याके बलसे जिलाकर उठा दिया और उस सिद्ध विद्याको प्राप्त कर लेनेपर गुरुको प्रणाम करके वे इस प्रकार बोले— ॥ ६२ ॥
यः श्रोत्रयोरमृतं संनिषिञ्चेद् विद्यामविद्यस्य यथा ममायम् । तं मन्येऽहं पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन् ॥ ६३ ॥
‘मैं विद्यासे शून्य था, उस दशामें मेरे इन पूजनीय आचार्य जैसे मेरे दोनों कानोंमें मृतसंजीवनी विद्यारूप अमृतकी धारा डाली है, इसी प्रकार जो कोई दूसरे ज्ञानी महात्मा मेरे कानोंमें ज्ञानरूप अमृतका अभिषेक करेंगे, उन्हें भी मैं अपना माता-पिता मानूँगा (जैसे गुरुदेव शुक्राचार्यको मानता हूँ)। गुरुदेवके द्वारा किये हुए उपकारको स्मरण रखते हुए शिष्यको उचित है कि वह उनसे कभी द्रोह न करे ॥ ६३ ॥
ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य निधिं निधीनामपि लब्धविद्याः । ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥ ६४ ॥
‘जो लोग सम्पूर्ण वेदके सर्वोत्तम ज्ञानको देने-वाले तथा समस्त विद्याओंके आश्रयभूत पूजनीय गुरुदेवका उनसे विद्या प्राप्त करके भी आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठारहित होकर पापपूर्ण लोकों—नरकोंमें जाते हैं’ ॥ ६४ ॥
वैशम्पायन उवाच
सुरापानाद् वञ्चनां प्राप्य विद्वान् संज्ञानाशं चैव महातिघोरम् । दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं पीतं तदा सुरया मोहितेन ॥ ६५ ॥ समन्युरुत्थाय महानुभाव- स्तद्दोषना विप्रहितं चिकीर्षुः । सुरापानं प्रति संजातमन्युः काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद ॥ ६६ ॥