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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विद्वान् शुक्राचार्य मदिरापानसे ठगे गये थे और

उस अत्यन्त भयानक परिस्थितिको पहुँच गये थे, जिसमें तनिक भी चेत नहीं रह जाता।

मदिरासे मोहित होनेके कारण ही वे उस समय अपने मनके अनुकूल चलनेवाले प्रिय शिष्य

ब्राह्मणकुमार कचको भी पी गये थे। यह सब देख और सोचकर वे महानुभाव कविपुत्र शुक्र

कुपित हो उठे। मदिरापानके प्रति उनके मनमें क्रोध और घृणाका भाव जाग उठा और

उन्होंने ब्राह्मणोंका हित करनेकी इच्छासे स्वयं इस प्रकार घोषणा की— ॥ ६५-६६ ॥

यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-

न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः ।

अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-

दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६७ ॥

'आजसे इस जगत्का जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा,

वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इस लोक और परलोक दोनोंमें वह

निन्दित होगा' ॥ ६७ ॥

मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां

मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके ।

सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां

देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६८ ॥

'धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित

की हुई यह मर्यादा भी रहे और यह सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके

समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य, मेरी बाँधी हुई इस

मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें' ॥ ६८ ॥

इतीदमुक्त्वा स महानुभाव-

स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः ।

तान् दानवान् दैवविमूढबुद्धी-

निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६९ ॥

ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने

दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा

— ॥ ६९ ॥

आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ

सिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे ।

संजीविनीं प्राप्य विद्यां महात्मा

तुल्यप्रभावो ब्रह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ७० ॥

(योऽकार्षीद् दुष्करं कर्म देवानां कारणात् कचः ।