महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextन तत्कीर्तिर्जरां गच्छेद यज्ञियश्च भविष्यति ॥)
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स भार्गवः ।
दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम् ॥ ७१ ॥
‘जिन महात्मा कचने देवताओंके लिये वह दुष्कर कार्य किया है, उनकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं हो सकती और वे यज्ञभागके अधिकारी होंगे।’ ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी चुप हो गये और दानव आश्चर्यचकित होकर अपने-अपने घर चले गये ॥ ७१ ॥
गुरोरुष्य सकाशे तु दशवर्षशतानि सः ।
अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ७२ ॥
कचने एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर कचने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं)