महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextशर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर ठहर गये ॥ १० ॥
तमेकं रहिते दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी । प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥ मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही ॥ ११ ॥
शर्मिष्ठोवाच
सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य च । तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥ १२ ॥ रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा । सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप ॥ १३ ॥ **शर्मिष्ठाने कहा—**नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम, वरुण अथवा आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव यहाँ मैं सर्वथा सुरक्षित हूँ) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये—मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये ॥ १२-१३ ॥
ययातिरुवाच
वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम् । रूपं च ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम् ॥ १४ ॥ **ययातिने कहा—**शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो ॥ १४ ॥
अब्रवीदुशना काव्यो देवयानीं यदावहम् । नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी ॥ १५ ॥ परंतु क्या करूँ; जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय कविपुत्र शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना' ॥ १५ ॥
शर्मिष्ठोवाच
न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे