महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६ ॥ **शर्मिष्ठाने कहा—**राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियोंके प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं॥ १६॥
पृष्टं तु साक्ष्ये प्रवदन्तमन्यथा वदन्ति मिथ्या पतितं नरेन्द्र । एकार्थतायां तु समाहितायां मिथ्या वदन्तं त्वनृतं हिनस्ति ॥ १७ ॥ महाराज! किसी निर्दोष प्राणीका प्राण बचानेके लिये गवाही देते समय किसीके पूछनेपर अन्यथा (असत्य) भाषण करनेवालेको यदि कोई पतित कहता है तो उसका कथन मिथ्या है। परंतु जहाँ अपने और दूसरे दोनोंके ही प्राण बचानेका प्रसंग उपस्थित हो, वहाँ केवल अपने प्राण बचानेके लिये मिथ्या बोलनेवालेका असत्यभाषण उसका नाश कर देता है॥ १७॥
ययातिरुवाच
राजा प्रमाणं भूतानां स नश्येत मृषा वदन् । अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥ १८ ॥ **ययाति बोले—**देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। वह यदि झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है। अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं झूठा काम नहीं कर सकता॥ १८॥
शर्मिष्ठोवाच
समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः । समं विवाहमित्याहुः सख्या मेऽसि वृतः पतिः ॥ १९ ॥ **शर्मिष्ठाने कहा—**राजन्! अपना पति और सखीका पति दोनों बराबर माने गये हैं। सखीके साथ ही उसकी सेवामें रहनेवाली दूसरी कन्याओंका भी विवाह हो जाता है। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया॥ १९॥
(सह दत्तास्मि काव्येन देवयान्या महर्षिणा । पूज्या पोषयितव्येति न मृषा कर्तुमर्हसि ॥ सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च । याचितॄणां ददासि त्वं गोभूम्यादीनि यानि च ॥ वाहिकं दानमित्युक्तं न शरीराश्रितं नृप । दुष्करं पुत्रदानं च आत्मदानं च दुष्करम् ॥