महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextशरीरदानात् तत् सर्वं दत्तं भवति नहुष ।
यस्य यस्य यथा कामस्तस्य तस्य ददाम्यहम् ॥
इत्युक्त्वा नगरे राजंस्त्रिकालं घोषितं त्वया ॥
अनृतं तत्तु राजेन्द्र वृथा घोषितमेव च ।
तत् सत्यं कुरु राजेन्द्र यथा वैश्रवणस्तथा ॥)
राजन्! महर्षि शुक्राचार्यने देवयानीके साथ मुझे भी यह कहकर आपको समर्पित किया है कि तुम इसका भी पालन-पोषण और आदर करना। आप उनके वचनको मिथ्या न करें। महाराज! आप प्रतिदिन याचकोंको जो सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण, गौ और भूमि आदि दान करते हैं, वह बाह्य दान कहा गया है। वह शरीरके आश्रित नहीं है। पुत्रदान और शरीरदान अत्यन्त कठिन है। नहुषनन्दन! शरीरदानसे उपर्युक्त सब दान सम्पन्न हो जाता है। राजन्! 'जिसकी जैसी इच्छा होगी उस-उस मनुष्यको मैं मुँहमाँगी वस्तु दूँगा' ऐसा कहकर आपने नगरमें जो तीनों समय दानकी घोषणा करायी है, वह मेरी प्रार्थना ठुकरा देनेपर झूठी सिद्ध होगी। वह सारी घोषणा ही व्यर्थ समझी जायगी। राजेन्द्र! आप कुबेरकी भाँति अपनी उस घोषणाको सत्य कीजिये।
ययातिरुवाच
दातव्यं याचमानेभ्य इति मे व्रतमाहितम् ।
त्वं च याचसि मां कामं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ २० ॥
**ययाति बोले—**याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायें, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ २० ॥
शर्मिष्ठोवाच
अधर्मात् पाहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय ।
त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम् ॥ २१ ॥
**शर्मिष्ठाने कहा—**राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ ॥ २१ ॥
त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः ।
यत् ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद् धनम् ॥ २२ ॥
महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं हैं—पत्नी, दास और पुत्र। ये जो धन प्राप्त करते हैं वह उसीका होता है जिसके अधिकारमें ये हैं। अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है ॥ २२ ॥
देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी ।
सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम् ॥ २३ ॥