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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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मैं देवयानीकी सेविका हूँ और वह आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं दोनों ही आपके सेवन करनेयोग्य हैं। अतः मेरा सेवन कीजिये ।। २३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राजा स तथ्यमित्यभिजज्ञिवान् ।
पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रत्यपादयत् ।। २४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया ।। २४ ।।

स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च ।
अन्योन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम् ।। २५ ।।
फिर शर्मिष्ठाके साथ समागम किया और इच्छानुसार कामोपभोग करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये ।। २५ ।।

तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा चारुहासिनी ।
लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात् ।। २६ ।।
सुन्दर भौंह तथा मनोहर मुसकानवाली शर्मिष्ठाने उस समागममें नृपश्रेष्ठ ययातिसे पहले-पहल गर्भ धारण किया ।। २६ ।।

प्रजज्ञे च ततः काले राजन् राजीवलोचना ।
कुमारं देवगर्भाभं राजीवनिभलोचनम् ।। २७ ।।
जनमेजय! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एक कमलनयन कुमारको उत्पन्न किया ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने द्व्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं)