BharatKosha
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

Page 985 of 2256

Read in context
Page 985

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार आनन्दातिरेकसे मुखरित हुआ वह रंगमण्डप जब किसी तरह कुछ शान्त हुआ, तब अर्जुनने आचार्यको अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखानी आरम्भ की। उन्होंने पहले आग्नेयास्त्रसे आग पैदा की, फिर वारुणास्त्रसे जल उत्पन्न करके उसे बुझा दिया। वायव्यास्त्रसे आँधी चला दी और पर्जन्यास्त्रसे बादल पैदा कर दिये ॥ १८-१९ ॥

भौमेन प्राविशद् भूमिं पार्वतेनासृजद् गिरीन् । अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥ उन्होंने भौमास्त्रसे पृथ्वी और पार्वतास्त्रसे पर्वतोंको उत्पन्न कर दिया; फिर अन्तर्धानास्त्रके द्वारा वे स्वयं अदृश्य हो गये ॥ २० ॥

क्षणात् प्रांशुः क्षणाद् ह्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः । क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम् ॥ २१ ॥ वे क्षणभरमें बहुत लंबे हो जाते और क्षणभरमें ही बहुत छोटे बन जाते थे। एक क्षणमें रथके धुरेपर खड़े होते तो दूसरे क्षण रथके बीचमें दिखायी देते थे। फिर पलक मारते-मारते पृथ्वीपर उतरकर अस्त्र-कौशल दिखाने लगते थे ॥ २१ ॥

सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरुं चापि गुरुप्रियः । सौष्ठवेनाभिसंक्षिप्तः सोऽविध्यद् विविधैः शरैः ॥ २२ ॥ अपने गुरुके प्रिय शिष्य अर्जुनने बड़ी फुर्ती और खूबसूरतीके साथ सुकुमार, सूक्ष्म और भारी निशानेको भी बिना हिलाये-डुलाये नाना प्रकारके बाणोंद्वारा बींध दिया ॥ २२ ॥

भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् । पञ्च बाणानसंयुक्तान् सम्मुमोचैकबाणवत् ॥ २३ ॥ रंगभूमिमें लोहेका बना हुआ सूअर इस प्रकार रखा गया था कि वह सब ओर चक्कर लगा रहा था। उस घूमते हुए सूअरके मुखमें अर्जुनने एक ही साथ एक बाणकी भाँति पाँच बाण मारे। वे पाँचों बाण एक-दूसरेसे सटे हुए नहीं थे ॥ २३ ॥

गव्ये विषाणकोषे च चले रज्ज्ववलम्बिनि । निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम् ॥ २४ ॥ एक जगह गायका सींग एक रस्सीमें लटकाया गया था, जो हिल रहा था। महापराक्रमी अर्जुनने उस सींगके छेदमें लगातार इक्कीस बाण गड़ा दिये ॥ २४ ॥

इत्येवमादि सुमहत् खड्गे धनुषि चानघ । गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि ह्यदर्शयत् ॥ २५ ॥ निष्पाप जनमेजय! इस प्रकार उन्होंने बड़ा भारी अस्त्र-कौशल दिखाया। खड्ग, धनुष और गदा आदिके भी शस्त्र-कुशल अर्जुनने अनेक पैंतरे और हाथ दिखलाये ॥ २५ ॥

ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन् कर्मणि भारत ।