महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 986, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने ॥ २६ ॥ द्वारदेशात् समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः । वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः ॥ २७ ॥ भारत! इस प्रकार अस्त्र-कौशल दिखानेका अधिकांश कार्य जब समाप्त हो चला, मनुष्योंका कोलाहल और बाजे-गाजेका शब्द जब शान्त होने लगा, उसी समय दरवाजेकी ओरसे किसीका अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकनेका भारी शब्द सुनायी पड़ा; मानो वज्र आपसमें टकरा रहे हों। वह शब्द किसी वीरके माहात्म्य तथा बलका सूचक था ॥ २६-२७ ॥
दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद् भूमिर्विदीर्यते । किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः ॥ २८ ॥ उसे सुनकर लोग कहने लगे, 'कहीं पहाड़ तो नहीं फट गये! पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो गयी! अथवा जलकी धारासे परिपूर्ण घनीभूत बादलोंकी गम्भीर गर्जनासे आकाशमण्डल तो नहीं गूँज रहा है?' ॥ २८ ॥
रङ्गस्यैवं मतिरभूत् क्षणेन वसुधाधिप । द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा ॥ २९ ॥ राजन्! उस रंगमण्डपमें बैठे हुए लोगोंके मनमें क्षणभरमें उपर्युक्त विचार आने लगे। उस समय सभी दर्शक दरवाजेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगे ॥ २९ ॥
पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो बभौ । पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ३० ॥ इधर कुन्तीकुमार पाँचों भाइयोंसे घिरे हुए आचार्य द्रोण पाँच तारोंवाले हस्त नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३० ॥
अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम् । दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत् ॥ ३१ ॥ स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधै- र्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः । बभौ यथा दानवसंक्षये पुरा पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ॥ ३२ ॥ शत्रुहन्ता बलवान् दुर्योधन भी उठकर खड़ा हो गया। अश्वत्थामासहित उसके सौ भाइयोंनै आकर उसे चारों ओरसे घेर लिया। हाथोंमें आयुध उठाये खड़े हुए अपने भाइयोंसे घिरा हुआ गदाधारी दुर्योधन पूर्वकालमें दानवसंहारके समय देवताओंसे घिरे देवराज इन्द्रके समान शोभा पाने लगा ॥ ३१-३२ ॥