महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 1099 of 2580
Read in contextरक्ताक्षा हेमसंकाशा महाकाया महाबलाः । सायुधा बद्धनिस्त्रिंशा यक्षा दशशतावराः ॥ २८ ॥ उन सबके नेत्र लाल थे। शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सभी महाकाय और महाबली थे। वे सब तलवार बाँधे अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे। उनकी संख्या एक हजारसे कम नहीं थी ॥ २८ ॥
ते जवेन महावेगाः प्लवमाना विहायसा । गन्धमादनमाजग्मुः प्रकर्षन्त इवाम्बरम् ॥ २९ ॥ वे महान् वेगशाली यक्ष आकाशमें उड़ते हुए गन्धमादन पर्वतपर आये, मानो समूचे आकाशमण्डल-को खींचे ले रहे हों ॥ २९ ॥
तत् केसरिमहाजालं धनाधिपतिपालितम् । कुबेरं च महात्मानं यक्षरक्षोगणावृतम् ॥ ३० ॥ ददृशुर्हृष्टरोमाणः पाण्डवाः प्रियदर्शनम् । कुबेरस्तु महासत्त्वान् पाण्डोः पुत्रान् महारथान् ॥ ३१ ॥ आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशान् दृष्ट्वा प्रीतोऽभवत् तदा । देवकार्यं चिकीर्षन् स हृदयेन तुतोष ह ॥ ३२ ॥ धनाध्यक्ष कुबेरके द्वारा पालित घोड़ोंके उस महा समुदायको तथा यक्ष-राक्षसोंसे घिरे हुए प्रियदर्शन महामना कुबेरको भी पाण्डवोंने देखा। देखकर उनके अंगोंमें रोमाञ्च हो आया। इधर कुबेर भी धनुष और तलवार लिये शक्तिशाली महारथी पाण्डुपुत्रोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। कुबेर देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहते थे, इसलिये मन-ही-मन पाण्डवोंसे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३०—३२ ॥
ते पक्षिण इवापेतुर्गिरिशृङ्गं महाजवाः । तस्थुस्तेषां समभ्याशे धनेश्वरपुरःसराः ॥ ३३ ॥ वे कुबेर आदि तीव्र वेगशाली यक्ष-राक्षस पक्षीकी तरह उड़कर गन्धमादन पर्वतके शिखरपर आये और पाण्डवोंके समीप खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
ततस्तं हृष्टमनसं पाण्डवान् प्रति भारत । समीक्ष्य यक्षगन्धर्वा निर्विकारमवस्थिताः ॥ ३४ ॥ जनमेजय! पाण्डवोंके प्रति कुबेरका मन प्रसन्न देखकर यक्ष और गन्धर्व निर्विकारभावसे खड़े रहे ॥ ३४ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानः प्रणम्य धनदं प्रभुम् । नकुलः सहदेवश्च धर्मपुत्रश्च धर्मवित् ॥ ३५ ॥ अपराद्धमिवात्मानं मन्यमाना महारथाः । तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे परिवार्य धनेश्वरम् ॥ ३६ ॥