महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'अब हमारे निवासका यह ग्यारहवाँ वर्ष चल रहा है। हमलोग सुख भोगनेके अधिकारी थे, परन्तु दुर्योधनने हमारा सुख छीन लिया। उसकी बुद्धि तथा स्वभाव अत्यन्त अधम है। उस दुष्टको धोखा देकर हम अपने अज्ञातवासका समय भी सुखपूर्वक बिता लेंगे ।। ८ ।।
तवाज्ञया पार्थिव निर्विशङ्का विहाय मानं विचरन् वनानि समीपवासेन विलोभितास्ते ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ।। ९ ।।
'भूपशिरोमणे! आपकी आज्ञासे हम मानापमानका विचार छोड़कर निःशंक हो वनमें विचरते रहेंगे। पहले किसी निकटवर्ती स्थानमें रहकर दुर्योधन आदिके मनमें वहीं खोज करनेका लोभ उत्पन्न करेंगे और फिर वहाँसे दूर देशमें चले जायँगे, जिससे उन्हें हमारा पता न लग सकेगा ।। ९ ।।
संवत्सरं तत्र विहृत्य गूढं नराधमं तं सुखमुद्धरेम निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय ।। १० ।। सुयोधनायानुचरैर्वृताय ततो महीमावस धर्मराज स्वर्गोपमं देशमिमं चरद्भिः शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ।। ११ ।।
'वहाँ एक वर्षतक गुप्तरूपसे निवास करके जब हम लौटेंगे, तब अनायास ही उस नराधम दुर्योधनकी जड़ उखाड़ देंगे। नरेन्द्र! नीच दुर्योधन आज अपने अनुचरोंसे घिरकर सुखी हो रहा है। उसने जो वैरका वृक्ष लगा रखा है, उसे हम फल-फूलसहित उखाड़ फेकेंगे और उससे वैरका बदला लेंगे। अतः धर्मराज! आप यहाँसे चलकर पृथ्वीपर निवास करें। नरदेव! इसमें संदेह नहीं कि हमलोग इस स्वर्गतुल्य प्रदेशमें विचरते रहनेपर भी अपना सारा शोक अनायास ही निवृत्त कर सकते हैं ।। १०-११ ।।
कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु तत् प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां शक्यं महत् प्राप्तुमथ क्रियाश्च ।। १२ ।। इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात् कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय कृतागसां भारत निग्रहे च ।। १३ ।।