महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1191, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘परंतु ऐसा होनेपर चराचर जगत्में आपकी पुण्यमयी कीर्ति नष्ट हो जायगी। इसलिये कुरुवंश-शिरोमणि अपने पूर्वजोंके उस महान् राज्यको प्राप्त करके ही हम और कोई सत्कर्म करनेयोग्य हो सकते हैं। भरतकुलभूषण महाराज! आप कुबेरसे जो सम्मान या अनुग्रह प्राप्त कर रहे हैं, इसे तो सदा ही प्राप्त कर सकते हैं। इस समय तो अपराधी शत्रुओंको मारने और दण्ड देनेका निश्चय कीजिये ।। १२-१३ ।।
तेजस्तवोग्रं न सहेत राजन् समेत्य साक्षादपि वज्रपाणिः न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ समेत्य देवैरपि धर्मराज ।। १४ ।। तवार्थसिद्धयर्थमपि प्रवृत्तौ सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता तथैव कृष्णोऽप्रतिमो बलेन तथैव चाहं नरदेववर्य ।। १५ ।। तवार्थसिद्धयर्थमभिप्रपन्नो यथैव कृष्णः सह यादवैस्तैः तथैव चाहं नरदेववर्य यमौ च वीरौ कृतिनौ प्रयोगे ।। १६ ।।
‘राजन्! साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी आपसे भिड़कर आपके भयंकर तेजको नहीं सह सकते। धर्मराज! आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये दो वीर सदा प्रयत्न करते हैं! गरुड़ध्वज भगवान् श्रीकृष्ण और शिनिके नाती वीरवर सात्यकि। ये दोनों आपके लिये देवताओंसे भी युद्ध करनेमें कभी कष्टका अनुभव नहीं करेंगे। नरदेवशिरोमणे! इन्हीं दोनोंके समान अर्जुन भी बल और पराक्रममें अपना सानी नहीं रखते। इसी प्रकार मैं भी बलमें किसीसे कम नहीं हूँ। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यादवोंके साथ आपके प्रत्येक कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत रहते हैं, उसी प्रकार मैं, अर्जुन तथा अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल वीर नकुल-सहदेव भी आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा संनद्ध रहा करते हैं ।। १४—१६ ।।
त्वदर्थयोगप्रभवप्रधानाः शमं करिष्याम परान् समेत्य ।। १६ ½ ।।
आपको धनकी प्राप्ति हो और आपका ऐश्वर्य बढ़े, यही हमारा प्रधान लक्ष्य है। अतः हमलोग शत्रुओंसे भिड़कर वैरकी शान्ति करेंगे ।। १६ ½ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा तेषां च धर्मस्य सुतो वरिष्ठः ।। १७ ।।