भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1192

प्रदक्षिणं वैश्रवणाधिवासं चकार धर्मार्थविदुत्तमौजाः। आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः ॥ १८ ॥ यथागतं मार्गमवेक्षमाणः पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः। ततो महात्मा स विशुद्धबुद्धिः सम्प्राथयामास नगेन्द्रवर्यम् ॥ १९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उत्तम ओजसे सम्पन्न श्रेष्ठ महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उस समय उन सबके अभिप्रायको जानकर कुबेरके निवासस्थान उस गन्धमादन पर्वतकी प्रदक्षिणा की। फिर उन्होंने वहाँके भवनों, नदियों, सरोवरों तथा समस्त राक्षसोंसे विदा ली। इसके बाद वे जिस मार्गसे आये थे, उसकी ओर देखने लगे। तदनन्तर उन विशुद्धबुद्धि महात्मा युधिष्ठिरने पुनः गन्धमादन पर्वतकी ओर देखते हुए उस श्रेष्ठ गिरिराजसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ १७—१९ ॥

समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि- र्जित्वा सपत्नान् प्रतिलभ्य राज्यम्। शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥ २० ॥ ‘शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धिको संयममें रखनेवाला मैं शत्रुओंको जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पानेके बाद सुहृदोंके साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्याके लिये लौटनेपर आपका दर्शन करूँगा’। इस प्रकार युधिष्ठिरने निश्चय किया ॥ २० ॥

वृतश्च सर्वैरनुजैर्द्विजैश्च तेनैव मार्गेण पतिः कुरूणाम्। उवाह चैतान् गणशस्तथैव घटोत्कचः पर्वतनिर्झरेषु ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् समस्त भाइयों और ब्राह्मणोंसे घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर उसी मार्गसे नीचे उतरने लगे जहाँ दुर्गम पर्वत और झरने पड़ते थे, वहाँ घटोत्कच अपने गणोंसहित आकर पहलेकी तरह इन सबको पीठपर बिठा वहाँसे पार कर देता था ॥ २१ ॥

तान् प्रस्थितान् प्रीतमना महर्षिः पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान्। स लोमशः प्रीतमना जगाम दिवौकसां पुण्यतमं निवासम् ॥ २२ ॥