महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextउस समय देवताओंने जो खिलौने इन्हें दिये थे, उन्हींसे महाबली महासेन खेलते और मन बहलाते हैं॥
स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा। शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः॥ २१॥
राजन्! अद्भुत शोभासे सम्पन्न और कान्तिमान् कुमार कार्तिकेय उस समय उस स्वर्णमय शिखरपर पिशाचों और देवताओंके समूहसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २१॥
तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः। आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः॥ २२॥
जैसे अंशुमाली सूर्यके उदयसे मनोहर कन्दरावाले मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वीरवर स्कन्दके निवाससे सुन्दर वनवाले उस श्वेतगिरिकी शोभा बढ़ गयी थी॥ २२॥
संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि। पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा॥ २३॥ कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि। दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः॥ २४॥
वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे। कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे। कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे। सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे। इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी॥ २३-२४॥
तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा। मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः॥ २५॥
वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षिगण आकर विराजमान हो गये। क्षुब्ध महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान मेघों और दिव्य वाद्योंका तुमुल घोष सब ओर गूँजने लगा॥ २५॥
तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा। हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान्॥ २६॥
'वहाँ दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हर्षमें भरे हुए प्राणियोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा॥ २६॥
एवं सेन्द्रं जगत् सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम्। प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात्॥ २७॥
इस प्रकार इन्द्रसहित सम्पूर्ण जगत् बड़ी प्रसन्नताके साथ श्वेत पर्वतपर विराजमान कुमार कार्तिकेयका दर्शन करने लगा। उनके दर्शनसे किसीका जी नहीं भरता था॥ २७॥