महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1581, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमार्कण्डेय उवाच
यदाभिषिक्तो भगवान् सेनापत्येन पावकिः । तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः ॥ २८ ॥ रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः । (अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः) सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन् युक्तं रथोत्तमे ॥ २९ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! जब अग्निनन्दन भगवान् स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान् भगवान् शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे-पीछे चले। भगवान् शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे ॥ २८-२९ ॥ उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम् । ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् ॥ ३० ॥ सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः । साक्षात् काल उस रथका संचालन कर रहा था। उसकी प्रेरणासे वह शुभ्र रथ आकाशमें उड़ चला। मनोहर केसरोंसे सुशोभित वे सिंह चराचर प्राणियोंको भयभीत करते और दहाड़ते हुए आकाशमें इस प्रकार चलने लगे, मानो उसे पी जायेंगे ॥ ३० १/२ ॥ तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ॥ ३१ ॥ विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा । उस रथपर भगवती उमाके साथ बैठे हुए भगवान् शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघोंकी घटामें विद्युत्के साथ भगवान् सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ ३१ १/२ ॥ अग्रतस्तस्य भगवान् धनेशो गुह्यकैः सह ॥ ३२ ॥ आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः । उनके आगे-आगे गुह्यकोंसहित नरवाहन धनाध्यक्ष भगवान् कुबेर मनोहर पुष्पक विमानपर बैठकर जा रहे थे ॥ ३२ १/२ ॥ ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह ॥ ३३ ॥ पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम् । देवताओंसहित इन्द्र भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो (भद्रवटको) जाते हुए वरदायक भगवान् वृषभध्वजके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥ जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः ॥ ३४ ॥ यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः ।