महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextत्रिसप्ततितमोऽध्यायः
ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत
बृहदश्व उवाच
ततो विदर्भान् सम्प्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम् ।
ऋतुपर्णं जना राज्ञे भीमाय प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर शाम होते-होते सत्यपराक्रमी राजा ऋतुपर्ण विदर्भराज्यमें जा पहुँचे। लोगोंने राजा भीमको इस बातकी सूचना दी ॥ १ ॥
स भीमवचनाद् राजा कुण्डिनं प्राविशत् पुरम् ।
नादयन् रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः ॥ २ ॥
भीमके अनुरोधसे राजा ऋतुपर्णने अपने रथकी घर्घरहाटद्वारा सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः ।
श्रुत्वा तु समहृष्यन्त पुरेव नलसंनिधौ ॥ ३ ॥
नलके घोड़े वहीं रहते थे, उन्होंने रथका वह घोष सुना। सुनकर वे उतने ही प्रसन्न और उत्साहित हुए, जितने कि पहले नलके समीप रहा करते थे ॥ ३ ॥
दमयन्ती तु शुश्राव रथघोषं नलस्य तम् ।
यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे ॥ ४ ॥
दमयन्तीने भी नलके रथकी वह घर्घरहाट सुनी, मानो वर्षाकालमें गरजते हुए मेघोंका गम्भीर घोष सुनायी देता हो ॥ ४ ॥
परं विस्मयमापन्ना श्रुत्वा नादं महास्वनम् ।
नलेन संगृहीतेषु पुरेव नलवाजिषु ।
सदृशं रथनिर्घोषं मेने भौमी तथा हयाः ॥ ५ ॥
वह महाभयंकर रथनाद सुनकर उसे बड़ा विस्मय हुआ। पूर्वकालमें राजा नल जब घोड़ोंकी बाग सँभालते थे, उन दिनों उनके रथसे जैसी गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी, वैसी ही उस समयके रथकी घर्घरहाट भी दमयन्ती और उसके घोड़ोंको जान पड़ी ॥ ५ ॥
प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः ।
हयाश्च शुश्रुवुस्तस्य रथघोषं महीपतेः ॥ ६ ॥
महलपर बैठे हुए मयूरों, गजशालामें बँधे हुए गजराजों और अश्वशालाके अश्वोंने राजाके रथका वह अद्भुत घोष सुना ॥ ६ ॥