भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 519

तच्छ्रुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथा । प्रणेदुरुन्मुखा राजन् मेघनाद इवोत्सुकाः ॥ ७ ॥ राजन्! रथकी उस आवाजको सुनकर हाथी और मयूर अपना मुँह ऊपर उठाकर उसी प्रकार उत्कण्ठापूर्वक अपनी बोली बोलने लगे, जैसे वे मेघोंकी गर्जना होनेपर बोला करते हैं ॥ ७ ॥

दमयन्त्युवाच

यथासौ रथनिर्घोषः पूरयन्निव मेदिनीम् । ममाह्लादयते चेतो नल एष महीपतिः ॥ ८ ॥ (उस समय) दमयन्तीने (मन-ही-मन) कहा—अहो! रथकी वह घर्घराहट इस पृथ्वीको गुँजाती हुई जिस प्रकार मेरे मनको आह्लाद प्रदान कर रही है, उससे जान पड़ता है, ये महाराज नल ही पधारे हैं ॥ ८ ॥

अद्य चन्द्राभवक्त्रं तं न पश्यामि नलं यदि । असंख्येयगुणं वीरं विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥ ९ ॥ आज यदि असंख्य गुणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले वीरवर नलको न देखूँगी तो अपने इस जीवनका अन्त कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

यदि वै तस्य वीरस्य बाह्वोर्नाद्याहमन्तरम् । प्रविशामि सुखस्पर्शं न भविष्याम्यसंशयम् ॥ १० ॥ आज यदि मैं उन वीरशिरोमणि नलकी दोनों भुजाओंके मध्यभागमें, जिसका स्पर्श अत्यन्त सुखद है, प्रवेश न कर सकी तो अवश्य जीवित न रह सकूँगी ॥ १० ॥

यदि मां मेघनिर्घोषो नोपगच्छति नैषधः । अद्य चामीकरप्रख्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥ ११ ॥ यदि रथद्वारा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले निषधदेशके स्वामी महाराज नल आज मेरे पास नहीं पधारेंगे तो मैं सुवर्णके समान देदीप्यमान दहकती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगी ॥ ११ ॥

यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रमः । नाभिगच्छति राजेन्द्रो विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥ यदि सिंहके समान पराक्रमी और मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले राजराजेश्वर नल मेरे पास नहीं आयेंगे तो आज अपने जीवनको नष्ट कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥

न स्मराम्यनृतं किंचिन्न स्मराम्यपकारताम् । न च पर्युषितं वाक्यं स्वैरेष्वपि कदाचन ॥ १३ ॥

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