BharatKosha
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

Page 702 of 2580

Read in context
Page 702

सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ६ ॥ ब्रह्मर्षि अगस्त्यकी बुद्धि सम थी। उन्होंने आय और व्यय दोनोंको बराबर देखकर यह विचार किया कि इसमेंसे थोड़ा-सा भी धन लेनेपर दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ६ ॥ स श्रुतर्वाणमादाय ब्रध्नश्वमगमत् ततः । स च तौ विषयस्यान्ते प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ७ ॥ तब वे श्रुतर्वाको साथ लेकर राजा ब्रध्नश्वके पास गये। उन्होंने भी अपने राज्यकी सीमापर आकर उन दोनों सम्माननीय अतिथियोंकी अगवानी की और विधिपूर्वक उन्हें अपनाया ॥ ७ ॥ तयोरर्घ्यं च पाद्यं च ब्रध्नश्वः प्रत्यवेदयत् । अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे ॥ ८ ॥ ब्रध्नश्वने उन दोनोंको अर्घ्य और पाद्य निवेदन किये, फिर उनकी आज्ञा ले अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ८ ॥

अगस्त्य उवाच वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते । यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नौ ॥ ९ ॥ अगस्त्यजीने कहा— पृथिवीपते! आपको विदित हो कि हम दोनों आपके यहाँ धनकी इच्छासे आये हैं। दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए जो धन आपके पास बचता हो, उसमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें भी दीजिये ॥ ९ ॥

लोमश उवाच तत आयव्ययौ पूर्णौ ताभ्यां राजा न्यवेदयत् । अतो ज्ञात्वा तु गृह्णीतं यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १० ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब राजा ब्रध्नश्वने भी उन दोनोंके सामने आय और व्ययका पूरा विवरण रख दिया और कहा—'आप दोनोंको इसमें जो धन अधिक जान पड़ता हो, वह ले लें' ॥ १० ॥ तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः । सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ११ ॥ तब समान बुद्धिवाले ब्रह्मर्षि अगस्त्यने उस विवरणमें आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमेंसे यदि थोड़ा-सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ११ ॥ पौरुकुत्सं ततो जग्मुस्त्रसदस्युं महाधनम् । अगस्त्यश्च श्रुतर्वा च ब्रध्नश्वश्च महीपतिः ॥ १२ ॥