महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतब अगस्त्य, श्रुतर्वा और ब्रध्नश्व—तीनों पुरुकुत्सनन्दन-महाधनी त्रसदस्युके पास गये॥ १२॥
त्रसदस्युस्तु तान् दृष्ट्वा प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि।
अभिगम्य महाराज विषयान्ते महामनाः॥ १३॥
अर्चयित्वा यथान्यायमैक्ष्वाकू राजसत्तमः।
समस्तांश्च ततोऽपृच्छत् प्रयोजनमुपक्रमे॥ १४॥
महाराज! भूपालोंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी महामना त्रसदस्युने उन्हें आते देख राज्यकी सीमापर पहुँचकर विधिपूर्वक उन सबका स्वागत-सत्कार किया और उन सबसे अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा॥ १३-१४॥
अगस्त्य उवाच
वित्तकामानिह प्राप्तान् विद्धि नः पृथिवीपते।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः॥ १५॥
**अगस्त्यने कहा—**पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम धनकी कामनासे यहाँ आये हैं। आप दूसरे प्राणियोंको पीड़ा न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका कुछ भाग हम सबको दीजिये॥ १५॥
लोमश उवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ तेषां राजा न्यवेदयत्।
एतज्ज्ञात्वा ह्युपादध्वं यदत्र व्यतिरिच्यते॥ १६॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत॥ १७॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजाने उन्हें अपने आय-व्ययका पूरा विवरण दे दिया और कहा—‘इसे समझकर जो धन शेष बचता हो, वह आपलोग ले लें।’ समबुद्धिवाले महर्षि अगस्त्यने वहाँ भी आय-व्ययका लेखा बराबर देखकर यही माना कि इसमेंसे धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है॥ १६-१७॥
ततः सर्वे समेत्याथ ते नृपास्तं महामुनिम्।
इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम्॥ १८॥
महाराज! तब वे सब राजा परस्पर मिलकर एक-दूसरेकी ओर देखते हुए महामुनि अगस्त्यसे इस प्रकार बोले—॥ १८॥
अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्वलो वसुमान् भुवि।
तमतिक्रम्य सर्वेऽद्य वयं चार्थामहे वसु॥ १९॥
‘ब्रह्मन्! यह इल्वल दानव इस पृथ्वीपर सबसे अधिक धनी है। हम सब लोग उसीके पास चलकर आज धन माँगें’॥ १९॥