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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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अगस्त्यजीने कहा— महान् असुर! तुम इनमेंसे एक-एक राजाको दस-दस हजार गौएँ तथा इतनी ही (दस-दस हजार) सुवर्णमुद्राएँ देना चाहते हो ।। १४ ।।
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मयः ।
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर ।। १५ ।।
इन राजाओंकी अपेक्षा दूनी गौएँ और सुवर्ण-मुद्राएँ तुमने मेरे लिये देनेका विचार किया है। महादैत्य! इसके सिवा एक स्वर्णमय रथ, जिसमें मनके समान तीव्रगामी दो घोड़े जुते हों, तुम मुझे और देना चाहते हो ।। १५ ।।
(लोमश उवाच
इल्वलस्तु मुनिं प्राह सर्वमस्ति यथाऽऽत्थ माम् ।
रथं तु यमवोचो मां नैनं विद्मो हिरण्मयम् ।।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! इसपर इल्वलने अगस्त्य मुनिसे कहा कि 'आपने मुझसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है; किंतु आपने जो मुझसे रथकी बात कही है, उस रथको हमलोग सुवर्णमय नहीं समझते हैं'।
अगस्त्य उवाच
न मे वागनृता काचिदुक्तपूर्वा महासुर ।)
जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्त एष हिरण्मयः ।
अगस्त्यजीने कहा— महादैत्य! मेरे मुँहसे पहले कभी कोई बात झूठी नहीं निकली है, अतः शीघ्र पता लगाओ, यह रथ निश्चय ही सोनेका है ।।
लोमश उवाच
जिज्ञास्यमानः स रथः कौन्तेयासीद्धिरण्मयः ।
ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु ।। १६ ।।
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पता लगानेपर वह रथ सोनेका ही निकला, तब मनमें (भाईकी मृत्युसे) व्यथित हुए उस दैत्यने महर्षिको बहुत अधिक धन दिया ।। १६ ।।
विरावश्च सुरावश्च तस्मिन् युक्तौ रथे हयौ ।
ऊहतुः सवसूनाशु तावगस्त्याश्रमं प्रति ।। १७ ।।
सर्वान् राज्ञः सहागस्त्यान् निमेषादिव भारत ।
(इल्वलस्त्वनुगम्यैनमगस्त्यं हन्तुमैच्छत ।
भस्म चक्रे महातेजा हुंकारेण महासुरम् ।।
मुनेराश्रममश्वौ तौ निन्यतुर्वातरंहसौ ।)
अगस्त्येनाभ्यनुज्ञाता जग्मू राजर्षयस्तदा ।