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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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कृतवांश्च मुनिः सर्वं लोपामुद्राचिकीर्षितम् ॥ १८ ॥ उस रथमें विराव और सुराव नामक दो घोड़े जुते हुए थे। वे धनसहित राजाओं तथा अगस्त्य मुनिको शीघ्र ही मानो पलक मारते ही अगस्त्याश्रमकी ओर ले भागे। उस समय इल्वल असुरने अगस्त्य मुनिके पीछे जाकर उनको मारनेकी इच्छा की, परंतु महातेजस्वी अगस्त्यमुनिने उस महादैत्य इल्वलको हुंकारसे ही भस्म कर दिया। तदनन्तर उन वायुके समान वेगवाले घोड़ोंने उन सबको मुनिके आश्रमपर पहुँचा दिया। भरतनन्दन! फिर अगस्त्यजीकी आज्ञा ले वे राजर्षिगण अपनी-अपनी राजधानीको चले गये और महर्षिने लोपामुद्राकी सभी इच्छाएँ पूर्ण कीं ॥ १७-१८ ॥

लोपामुद्रोवाच

कृतवानसि तत् सर्वं भगवन् मम काङ्क्षितम् । उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥ १९ ॥ **लोपामुद्रा बोली—**भगवन्! मेरी जो-जो अभिलाषा थी, वह सब आपने पूर्ण कर दी। अब मुझसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न कीजिये ॥ १९ ॥

अगस्त्य उवाच

तुष्टोऽहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने । विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु ॥ २० ॥ **अगस्त्यजीने कहा—**शोभामयी कल्याणी! तुम्हारे सद्व्यवहारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। पुत्रके सम्बन्धमें तुम्हारे सामने एक विचार उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥ २० ॥ सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसम्मितम् । दश वा शततुल्याः स्युरेको वापि सहस्रजित् ॥ २१ ॥ क्या तुम्हारे गर्भसे एक हजार या एक सौ पुत्र उत्पन्न हों, जो दसके ही समान हों? अथवा दस ही पुत्र हों, जो सौ पुत्रोंकी समानता करनेवाले हों? अथवा एक ही पुत्र हो, जो हजारोंको जीतनेवाला हो? ॥ २१ ॥