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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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लोपामुद्रोवाच

सहस्रसम्मितः पुत्र एकोऽप्यस्तु तपोधन।
एको हि बहुभिः श्रेयान् विद्वान् साधुरसाधुभिः॥ २२॥
**लोपामुद्रा बोली—**तपोधन! मुझे सहस्रोंकी समानता करनेवाला एक ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो; क्योंकि बहुत-से दुष्ट पुत्रोंकी अपेक्षा एक ही विद्वान् एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्तम माना गया है॥ २२॥

लोमश उवाच

स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनिः।
समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्छ्रद्दधानया॥ २३॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! तब ‘तथास्तु’ कहकर श्रद्धालु महात्मा अगस्त्यने समान शील-स्वभाववाली श्रद्धालु पत्नी लोपामुद्राके साथ यथासमय समागम किया॥ २३॥
तत आधाय गर्भं तमगमद् वनमेव सः।
तस्मिन् वनगते गर्भो ववृधे सप्त शारदान्॥ २४॥
गर्भाधान करके अगस्त्यजी फिर वनमें ही चले गये। उनके वनमें चले जानेपर वह गर्भ सात वर्षोंतक माताके पेटमें ही पलता और बढ़ता रहा॥ २४॥

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