महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextप्रभो! मधुसूदन श्रीकृष्ण! आप माताको प्रणाम करके मेरे कथनानुसार धृतराष्ट्र, दुर्योधन, अन्यान्य वयोवृद्ध नरेश, भीष्म, द्रोण, कृप, महाराज बाह्लीक, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, सोमदत्त, समस्त भरतवंशी क्षत्रिय-वृन्द तथा कौरवोंके मन्त्रकी रक्षा करनेवाले, मर्मवेत्ता, अगाधबुद्धि एवं महाज्ञानी विदुरके पास जाकर इन सबको हृदयसे लगाइयेगा— ॥ ४६—४८ ॥
इत्युक्त्वा केशवं तत्र राजमध्ये युधिष्ठिरः । अनुज्ञातो निववृते कृष्णं कृत्वा प्रदक्षिणम् ॥ ४९ ॥ राजाओंके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर उनकी परिक्रमा करके आज्ञा ले लौट पड़े ॥
व्रजन्नेव तु बीभत्सुः सखायं पुरुषर्षभम् । अब्रवीत् परवीरघ्नं दाशार्हमपराजितम् ॥ ५० ॥ परंतु अर्जुनने पीछे-पीछे जाते हुए ही शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अपराजित नरश्रेष्ठ अपने सखा दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ५० ॥
यदस्माकं विभो वृत्तं पुरा वै मन्त्रनिश्चये । अर्धराज्यस्य गोविन्द विदितं सर्वराजसु ॥ ५१ ॥ 'गोविन्द! पहले जब हमलोगोंमें गुप्त मन्त्रणा हुई थी, उस समय एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचकर हमने आधा राज्य लेकर ही संधि करनेका निर्णय किया था; इस बातको सभी राजा जानते हैं ॥ ५१ ॥
तच्चेद् दद्यादसंगेन सत्कृत्यानवमन्य च । प्रियं मे स्यान्महाबाहो मुच्येरन् महतो भयात् ॥ ५२ ॥ 'महाबाहो! यदि दुर्योधन लोभ छोड़कर अनादर न करके सत्कारपूर्वक हमें आधा राज्य लौटा दे तो मेरा प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तथा समस्त कौरव महान् भयसे छुटकारा पा जायँ ॥ ५२ ॥
अतश्चेदन्यथा कर्ता धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित् । अन्तं नूनं करिष्यामि क्षत्रियाणां जनार्दन ॥ ५३ ॥ 'जनार्दन! यदि समुचित उपायको न जाननेवाला धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन इसके विपरीत आचरण करेगा तो मैं निश्चय ही उसके पक्षमें आये हुए समस्त क्षत्रियोंका संहार कर डालूँगा' ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते पाण्डवेन समहृष्यद् वृकोदरः । मुहुर्मुहुः क्रोधवशात् प्रावेपत च पाण्डवः ॥ ५४ ॥