महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 605, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै, उसी प्रकार जिसने मृत्युके महान् संकटसे हमारा उद्धार किया है और माधव! जिसने हमलोगोंके कारण सदा दुःख ही भोगे हैं, उस दुःख न भोगनेके योग्य हमारी माता कुन्तीसे मिलकर आप उसका कुशल-समाचार अवश्य पूछें ॥ ३७—४० ॥ भृशमाश्वासयेश्चैनां पुत्रशोकपरप्लुताम् । अभिवाद्य स्वजेथास्त्वं पाण्डवान् परिकीर्तयन् ॥ ४१ ॥ आप हम पाण्डवोंका समाचार बताते हुए हमारी माँसे मिलियेगा और प्रणाम करके पुत्रशोकसे पीड़ित हुई उस देवीको बहुत-बहुत आश्वासन दीजियेगा ॥ ऊढात् प्रभृति दुःखानि श्वशुराणामरिंदम । निकारानतदर्हा च पश्यन्ती दुःखमश्नुते ॥ ४२ ॥ शत्रुदमन! उसने विवाह करनेसे लेकर ही अपने श्वशुरके घरमें आकर नाना प्रकारके दुःख और कष्ट ही देखे तथा अनुभव किये हैं और इस समय भी वह वहाँ कष्ट ही भोगती है ॥ ४२ ॥ अपि जातु स कालः स्यात् कृष्ण दुःखविपर्ययः । यदहं मातरं क्लिष्टां सुखं दद्यामरिंदम ॥ ४३ ॥ शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! क्या कभी वह समय भी आयेगा, जब हमारे सब दुःख दूर हो जायँगे और हमलोग दुःखमें पड़ी हुई अपनी माताको सुख दे सकेंगे? ॥ ४३ ॥ प्रव्रजन्तोऽनुधावन्तीं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । रुदतीमपहायैनामगच्छाम वयं वनम् ॥ ४४ ॥ जब हम वनको जा रहे थे, उस समय पुत्रस्नेहसे व्याकुल हो वह कातरभावसे रोती हुई हमारे पीछे-पीछे दौड़ी आ रही थी, परंतु हमलोग उसे वहीं छोड़कर वनमें चले गये ॥ ४४ ॥ न नूनं म्रियते दुःखैः सा चेज्जीवति केशव । तथा पुत्रादिभिर्गाढमार्ता ह्यानर्तसत्कृत ॥ ४५ ॥ आनर्तदेशके सम्मानित वीर केशव! यह निश्चित नहीं है कि मनुष्य दुःखोंसे घबराकर मर ही जाता हो। इसलिये कदाचित् वह जीवित हो, तो भी पुत्रोंकी चिन्तासे अत्यन्त पीड़ित ही होगी ॥ ४५ ॥ अभिवाद्याथ सा कृष्ण त्वया मद्वचनाद् विभो । धृतराष्ट्रश्च कौरव्यो राजानश्च वयोऽधिकाः ॥ ४६ ॥ भीष्मं द्रोणं कृपं चैव महाराजं च बाह्निकम् । द्रौणिं च सोमदत्तं च सर्वांश्च भरतान् प्रति ॥ ४७ ॥ विदुरं च महाप्राज्ञं कुरूणां मन्त्रधारिणम् । अगाधबुद्धिं मर्मज्ञं स्वजेथा मधुसूदन ॥ ४८ ॥