महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
है, उसी प्रकार जिसने मृत्युके महान् संकटसे हमारा उद्धार किया है और माधव! जिसने हमलोगोंके कारण सदा दुःख ही भोगे हैं, उस दुःख न भोगनेके योग्य हमारी माता कुन्तीसे मिलकर आप उसका कुशल-समाचार अवश्य पूछें ॥ ३७—४० ॥ भृशमाश्वासयेश्चैनां पुत्रशोकपरप्लुताम् । अभिवाद्य स्वजेथास्त्वं पाण्डवान् परिकीर्तयन् ॥ ४१ ॥ आप हम पाण्डवोंका समाचार बताते हुए हमारी माँसे मिलियेगा और प्रणाम करके पुत्रशोकसे पीड़ित हुई उस देवीको बहुत-बहुत आश्वासन दीजियेगा ॥ ऊढात् प्रभृति दुःखानि श्वशुराणामरिंदम । निकारानतदर्हा च पश्यन्ती दुःखमश्नुते ॥ ४२ ॥ शत्रुदमन! उसने विवाह करनेसे लेकर ही अपने श्वशुरके घरमें आकर नाना प्रकारके दुःख और कष्ट ही देखे तथा अनुभव किये हैं और इस समय भी वह वहाँ कष्ट ही भोगती है ॥ ४२ ॥ अपि जातु स कालः स्यात् कृष्ण दुःखविपर्ययः । यदहं मातरं क्लिष्टां सुखं दद्यामरिंदम ॥ ४३ ॥ शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! क्या कभी वह समय भी आयेगा, जब हमारे सब दुःख दूर हो जायँगे और हमलोग दुःखमें पड़ी हुई अपनी माताको सुख दे सकेंगे? ॥ ४३ ॥ प्रव्रजन्तोऽनुधावन्तीं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । रुदतीमपहायैनामगच्छाम वयं वनम् ॥ ४४ ॥ जब हम वनको जा रहे थे, उस समय पुत्रस्नेहसे व्याकुल हो वह कातरभावसे रोती हुई हमारे पीछे-पीछे दौड़ी आ रही थी, परंतु हमलोग उसे वहीं छोड़कर वनमें चले गये ॥ ४४ ॥ न नूनं म्रियते दुःखैः सा चेज्जीवति केशव । तथा पुत्रादिभिर्गाढमार्ता ह्यानर्तसत्कृत ॥ ४५ ॥ आनर्तदेशके सम्मानित वीर केशव! यह निश्चित नहीं है कि मनुष्य दुःखोंसे घबराकर मर ही जाता हो। इसलिये कदाचित् वह जीवित हो, तो भी पुत्रोंकी चिन्तासे अत्यन्त पीड़ित ही होगी ॥ ४५ ॥ अभिवाद्याथ सा कृष्ण त्वया मद्वचनाद् विभो । धृतराष्ट्रश्च कौरव्यो राजानश्च वयोऽधिकाः ॥ ४६ ॥ भीष्मं द्रोणं कृपं चैव महाराजं च बाह्निकम् । द्रौणिं च सोमदत्तं च सर्वांश्च भरतान् प्रति ॥ ४७ ॥ विदुरं च महाप्राज्ञं कुरूणां मन्त्रधारिणम् । अगाधबुद्धिं मर्मज्ञं स्वजेथा मधुसूदन ॥ ४८ ॥
प्रभो! मधुसूदन श्रीकृष्ण! आप माताको प्रणाम करके मेरे कथनानुसार धृतराष्ट्र, दुर्योधन, अन्यान्य वयोवृद्ध नरेश, भीष्म, द्रोण, कृप, महाराज बाह्लीक, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, सोमदत्त, समस्त भरतवंशी क्षत्रिय-वृन्द तथा कौरवोंके मन्त्रकी रक्षा करनेवाले, मर्मवेत्ता, अगाधबुद्धि एवं महाज्ञानी विदुरके पास जाकर इन सबको हृदयसे लगाइयेगा— ॥ ४६—४८ ॥
इत्युक्त्वा केशवं तत्र राजमध्ये युधिष्ठिरः । अनुज्ञातो निववृते कृष्णं कृत्वा प्रदक्षिणम् ॥ ४९ ॥ राजाओंके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर उनकी परिक्रमा करके आज्ञा ले लौट पड़े ॥
व्रजन्नेव तु बीभत्सुः सखायं पुरुषर्षभम् । अब्रवीत् परवीरघ्नं दाशार्हमपराजितम् ॥ ५० ॥ परंतु अर्जुनने पीछे-पीछे जाते हुए ही शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अपराजित नरश्रेष्ठ अपने सखा दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ५० ॥
यदस्माकं विभो वृत्तं पुरा वै मन्त्रनिश्चये । अर्धराज्यस्य गोविन्द विदितं सर्वराजसु ॥ ५१ ॥ 'गोविन्द! पहले जब हमलोगोंमें गुप्त मन्त्रणा हुई थी, उस समय एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचकर हमने आधा राज्य लेकर ही संधि करनेका निर्णय किया था; इस बातको सभी राजा जानते हैं ॥ ५१ ॥
तच्चेद् दद्यादसंगेन सत्कृत्यानवमन्य च । प्रियं मे स्यान्महाबाहो मुच्येरन् महतो भयात् ॥ ५२ ॥ 'महाबाहो! यदि दुर्योधन लोभ छोड़कर अनादर न करके सत्कारपूर्वक हमें आधा राज्य लौटा दे तो मेरा प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तथा समस्त कौरव महान् भयसे छुटकारा पा जायँ ॥ ५२ ॥
अतश्चेदन्यथा कर्ता धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित् । अन्तं नूनं करिष्यामि क्षत्रियाणां जनार्दन ॥ ५३ ॥ 'जनार्दन! यदि समुचित उपायको न जाननेवाला धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन इसके विपरीत आचरण करेगा तो मैं निश्चय ही उसके पक्षमें आये हुए समस्त क्षत्रियोंका संहार कर डालूँगा' ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते पाण्डवेन समहृष्यद् वृकोदरः । मुहुर्मुहुः क्रोधवशात् प्रावेपत च पाण्डवः ॥ ५४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन अर्जुनके ऐसा कहनेपर पाण्डव भीमसेनको बड़ा हर्ष हुआ। वे क्रोधवश बारंबार काँपने लगे ॥ ५४ ॥
वेपमानश्च कौन्तेयः प्राक्रोशन्महतो रवान् ।
धनंजयवचः श्रुत्वा हर्षोत्सिक्तमना भृशम् ॥ ५५ ॥
काँपते-काँपते ही कुन्तीकुमार भीमसेन बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे। अर्जुनकी पूर्वोक्त बातें सुनकर उनका हृदय अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गया था ॥ ५५ ॥
तस्य तं निनदं श्रुत्वा सम्प्रावेपन्त धन्विनः ।
वाहनानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रे प्रसुस्रुवुः ॥ ५६ ॥
उनका वह सिंहनाद सुनकर समस्त धनुर्धर भयके मारे थरथर काँपने लगे। उनके सभी वाहनोंने मल-मूत्र कर दिये ॥ ५६ ॥
इत्युक्त्वा केशवं तत्र तथा चोक्त्वा विनिश्चयम् ।
अनुज्ञातो निववृते परिष्वज्य जनार्दनम् ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णसे वार्तालाप करके उन्हें अपना निश्चय बता गले मिलकर अर्जुन श्रीकृष्णसे आज्ञा ले लौट आये ॥ ५७ ॥
तेषु राजसु सर्वेषु निवृत्तेषु जनार्दनः ।
तूर्णमभ्यगमद्धृष्टः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥ ५८ ॥
उन सब राजाओंके लौट जानेपर शैब्य और सुग्रीव आदिसे युक्त रथपर चलनेवाले जनार्दन श्रीकृष्ण बड़े हर्षके साथ तीव्र गतिसे आगे बढ़े ॥ ५८ ॥
ते हया वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः ।
पन्थानमाचेमुरिव ग्रसमाना इवाम्बरम् ॥ ५९ ॥
दारुकके हाँकनेपर भगवान् वासुदेवके वे अश्व इतने वेगसे चलने लगे, मानो समस्त मार्गको पी रहे हों और आकाशको ग्रस लेना चाहते हों ॥ ५९ ॥
अथापश्यन्महाबाहुर्ऋषीनध्वनि केशवः ।
ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानान् स्थितानुभयतः पथि ॥ ६० ॥
तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने मार्गमें कुछ महर्षियोंको उपस्थित देखा, जो रास्तेके दोनों ओर खड़े थे और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६० ॥
सोऽवतीर्य रथात् तूर्णमभिवाद्य जनार्दनः ।
यथावृत्तान्ऋषीन् सर्वानभ्यभाषत पूजयन् ॥ ६१ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही रथसे उतर पड़े और पूर्वोक्तरूपसे खड़े हुए उन समस्त महर्षियोंको प्रणाम करके उनका समादर करते हुए बोले— ॥ ६१ ॥
कच्चिल्लोकेषु कुशलं कच्चिद् धर्मः स्वनुष्ठितः ।
ब्राह्मणानां त्रयो वर्णाः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने ॥ ६२ ॥
(पितृदेवातिथिभ्यश्च कच्चित् पूजा स्वनिष्ठिता ।)
‘महात्माओ! सम्पूर्ण लोकोंमें कुशल तो है न? क्या धर्मका अच्छी तरह अनुष्ठान हो रहा है? क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अधीन रहते हैं न? क्या पितरों, देवताओं और अतिथियोंकी पूजा भलीभाँति सम्पन्न हो रही है?’ ।। ६२ ।।
तेभ्यः प्रयुज्य तां पूजां प्रोवाच मधुसूदनः ।
भगवन्तः क्व संसिद्धाः का वीथी भवतामिह ।। ६३ ।।
किं वा कार्यं भगवतामहं किं करवाणि वः ।
केनार्थेनोपसम्प्राप्ता भगवन्तो महीतलम् ।। ६४ ।।
तत्पश्चात् उन महर्षियोंकी पूजा करके भगवान् मधुसूदनने फिर उनसे पूछा—‘महात्माओ! आपने कहाँ सिद्धि प्राप्त की है? आपलोगोंका यहाँ कौन-सा मार्ग है? अथवा आपलोगोंका क्या कार्य है? भगवन्! मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ? किस प्रयोजनसे आपलोग इस भूतलपर पधारे हैं?’ ।। ६३-६४ ।।
(एवमुक्ताः केशवेन मुनयः संशितव्रताः ।
नारदप्रमुखाः सर्वे प्रत्यनन्दन्त केशवम् ।।
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कठोर व्रत धारण करनेवाले नारद आदि सब महर्षि उनका अभिनन्दन करने लगे।
अधःशिराः सर्पमाली महर्षिः स हि देवलः ।
अर्वावसुः सुजानुश्च मैत्रेयः शुनको बली ॥ बको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनस्तथा । आयोदधौम्यो धौम्यश्च अणीमाण्डव्यकौशिकौ ॥ दामोष्णीषस्त्रिश्रवणः पर्णादो घटजानुकः । मौज्जायनो वायुभक्षः पाराशर्योऽथ शालिकः ॥ शीलवानशनिर्धाता शून्यपालोऽकृतव्रणः । श्वेतकेतुः कहोलश्च रामश्चैव महातपाः ॥ ) (नारदजीके अतिरिक्त जो महर्षि वहाँ उपस्थित थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—) अधःशिरा, सर्पमाली, महर्षि देवल, अर्वावसु, सुजानु, मैत्रेय, शुनक, बली, दल्भपुत्र बक, स्थूलशिरा, पराशरनन्दन श्रीकृष्णद्वैपायन, आयोदधौम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष त्रिश्रवण, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, शालिक, शीलवान्, अशनि, धाता, शून्यपाल, अकृतव्रण, श्वेतकेतु, कहोल एवं महातपस्वी परशुराम। तमब्रवीज्जामदग्न्य उपेत्य मधुसूदनम् । परिष्वज्य च गोविन्दं सुरासुरपतेः सखा ॥ ६५ ॥ उस समय देवराज तथा दैत्यराजके भी सखा जमदग्निनन्दन परशुरामने मधुसूदन श्रीकृष्णके पास जाकर उन्हें हृदयसे लगाया और इस प्रकार कहा— ॥ ६५ ॥ देवर्षयः पुण्यकृतो ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । राजर्षयश्च दाशार्ह मानयन्तस्तपस्विनः । देवासुरस्य द्रष्टारः पुराणस्य महामते ॥ ६६ ॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं दिदृक्षन्तश्च सर्वतः । सभासदश्च राजानस्त्वां च सत्यं जनार्दनम् ॥ ६७ ॥ एतन्महत् प्रेक्षणीयं द्रष्टुं गच्छाम केशव । धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव ॥ ६८ ॥ त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परंतप । 'महामते केशव! जिन्होंने पुरातन देवासुरसंग्रामको भी अपनी आँखोंसे देखा है, वे पुण्यात्मा देवर्षिगण, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् ब्रह्मर्षिगण तथा आपका सम्मान करनेवाले तपस्वी राजर्षिगण सम्पूर्ण दिशाओंसे एकत्र हुए भूमण्डलके क्षत्रियनरेशोंको, सभामें बैठे हुए भूपालों-को तथा सत्यस्वरूप आप भगवान् जनार्दनको देखना चाहते हैं। इस परम दर्शनीय वस्तुका दर्शन करनेके लिये ही हम हस्तिनापुरमें चल रहे हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले माधव! वहाँ कौरवों तथा अन्य राजाओंकी मण्डलीमें आपके द्वारा कही जानेवाली धर्म और अर्थसे युक्त बातोंको हम सुनना चाहते हैं ॥ ६६—६८ ½ ॥ भीष्मद्रोणादयश्चैव विदुरश्च महामतिः ॥ ६९ ॥ त्वं च यादवशार्दूल सभायां वै समेष्यथ ।
'यदुकुलसिंह! वहाँ कौरवसभामें भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख व्यक्ति, परम बुद्धिमान् विदुर तथा आप पधारेंगे ।। ६९ १/३ ।। तव वाक्यानि दिव्यानि तथा तेषां च माधव ।। ७० ।। श्रोतुमिच्छाम गोविन्द सत्यानि च हितानि च । 'गोविन्द! माधव! उस सभामें आपके तथा भीष्म आदिके मुखसे जो दिव्य, सत्य एवं हितकर वचन प्रकट होंगे, उन सबको हमलोग सुनना चाहते हैं ।। ७० १/३ ।। आपृष्टोऽसि महाबाहो पुनर्द्रक्ष्यामहे वयम् ।। ७१ ।। याह्यविघ्नेन वै वीर द्रक्ष्यामस्त्वां सभागम् । आसीनमासने दिव्ये बलतेजःसमाहितम् ।। ७२ ।। 'महाबाहो! अब हमलोग आपसे पूछकर विदा ले रहे हैं, पुनः आपका दर्शन करेंगे। वीर! आपकी यात्रा निर्विघ्न हो। जब सभामें पधारकर आप दिव्य आसनपर बैठे होंगे, उसी समय बल और तेजसे सम्पन्न आपके श्रीअंगोंका हम पुनः दर्शन करेंगे' ।। ७१-७२ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णप्रस्थाने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णप्रस्थानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८३ ।। [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७७ १/३ श्लोक हैं।]
मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना
चतुरशीतितमोऽध्यायः
मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना
वैशम्पायन उवाच
प्रयान्तं देवकीपुत्रं परवीररुजो दश ।
महारथा महाबाहुमन्वयुः शस्त्रपाणयः ॥ १ ॥
पदातीनां सहस्रं च सादिनां च परंतप ।
भोज्यं च विपुलं राजन् प्रेष्याश्च शतशोऽपरे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! महाबाहु श्रीकृष्णके प्रस्थान करते समय विपक्षी वीरोंपर विजय पानेवाले शस्त्रधारी दस महारथी, एक हजार पैदल योद्धा, एक हजार घुड़सवार, प्रचुर खाद्य-सामग्री तथा दूसरे सैकड़ों सेवक उनके साथ गये ॥ १-२ ॥
जनमेजय उवाच
कथं प्रयातो दाशार्हो महात्मा मधुसूदनः ।
कानि वा व्रजतस्तस्य निमित्तानि महौजसः ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— दशार्हकुलतिलक महात्मा मधुसूदनने किस प्रकार यात्रा की? उन महातेजस्वी श्रीकृष्णके जाते समय कौन-कौन-से भले-बुरे शकुन प्रकट हुए थे? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य प्रयाणे यान्यासन् निमित्तानि महात्मनः ।
तानि मे शृणु सर्वाणि दैवान्यौत्पातिकानि च ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! महात्मा श्रीकृष्णके प्रस्थान करते समय जो दिव्य शकुन और उत्पातसूचक अपशकुन प्रकट हुए थे, मुझसे उन सबका वर्णन सुनो ॥ ४ ॥
अनभ्रेऽशनिनिर्घोषः सविद्युत् समजायत ।
अन्वगेव च पर्जन्यः प्रावर्षद् विघने भृशम् ॥ ५ ॥
बिना बादलके ही आकाशमें बिजलीसहित वज्रकी गड़गड़ाहट सुनायी देने लगी। उसके साथ ही पर्जन्यदेवताने मेघोंकी घटा न होनेपर भी प्रचुर जलकी वर्षा की ॥ ५ ॥
प्रत्यगूहर्महानद्यः प्राङ्मुखाः सिन्धुसप्तमाः ।
विपरीता दिशः सर्वा न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
पूर्वकी ओर बहनेवाली सिन्धु आदि बड़ी-बड़ी नदियोंका प्रवाह उलटकर पश्चिमकी ओर हो गया। सारी दिशाएँ विपरीत प्रतीत होने लगीं। कुछ भी समझमें नहीं आता था॥ ६॥
प्राज्वलन्नग्नयो राजन् पृथिवी समकम्पत ।
उदपानाश्च कुम्भाश्च प्रासिञ्चञ्छतशो जलम् ॥ ७ ॥
राजन्! सब ओर आग जलने लगी। धरती डोलने लगी। सैकड़ों जलाशय और कलश छलक-छलककर जल गिराने लगे ॥ ७ ॥
तमःसंवृतमप्यासीत् सर्वं जगदिदं तथा ।
न दिशो नादिशो राजन् प्रज्ञायन्ते स्म रेणुना ॥ ८ ॥
राजन्! यह सारा संसार धूलके कारण अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो गया। कौन दिशा है, कौन दिशा नहीं है—इसका ज्ञान नहीं हो पाता था ॥ ८ ॥
प्रादुरासीन्महाञ्छब्दः खे शरीरमदृश्यत ।
सर्वेषु राजन् देशेषु तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ९ ॥
महाराज! फिर बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा। आकाशमें सब ओर मनुष्यकी-सी आकृति दिखायी देने लगी। सम्पूर्ण देशोंमें यह अद्भुत-सी बात दिखायी दी ॥ ९ ॥
प्राग्मथ्नाद्धास्तिनपुरं वातो दक्षिणपश्चिमः ।
आरुजन् गणशो वृक्षान् परुषोऽशनिनिःस्वनः ॥ १० ॥
दक्षिण-पश्चिमसे आँधी उठी और हस्तिनापुरको मथने लगी। उसने झुंड-के-झुंड वृक्षोंको तोड़-उखाड़कर धराशायी कर दिया। वज्रपातका-सा कठोर शब्द होने लगा (इस प्रकारके उत्पात हस्तिनापुरके आस-पास घटित होते थे) ॥ १० ॥
यत्र यत्र च वार्ष्णेयो वर्तते पथि भारत ।
तत्र तत्र सुखो वायुः सर्वं चासीत् प्रदक्षिणम् ॥ ११ ॥
भारत! वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण मार्गमें जहाँ-जहाँ रहते थे, वहाँ-वहाँ सुखदायिनी वायु चलती थी और सभी शुभ शकुन उनके दाहिने भागमें प्रकट होते थे ॥ ११ ॥
ववर्ष पुष्पवर्षं च कमलानि च भूरिशः ।
समश्च पन्था निर्दुःखो व्यपेतकुशकण्टकः ॥ १२ ॥
उनपर फूलोंकी और बहुत-से खिले हुए कमलोंकी भी वृष्टि होती तथा सारा मार्ग कुश-कण्टकसे शून्य और समतल होकर क्लेश और दुःखसे रहित हो जाता था ॥ १२ ॥
संस्तुतो ब्राह्मणैर्गीर्भिस्तत्र तत्र सहस्रशः ।
अर्च्यते मधुपर्कैश्च वसुभिश्च वसुप्रदः ॥ १३ ॥
सहस्रों ब्राह्मण विभिन्न स्थानोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते तथा मधुपर्कद्वारा उनकी पूजा करते थे। धनदाता भगवान्ने भी उन सबको यथेष्ट धन दिया ॥
तं किरन्ति महात्मानं वन्यैः पुष्पैः सुगन्धिभिः ।
स्त्रियः पथि समागम्य सर्वभूतहिते रतम् ॥ १४ ॥
मार्गमें कितनी ही स्त्रियाँ आकर सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत रहनेवाले उन महात्मा श्रीकृष्णके ऊपर वनके सुगन्धित फूलोंकी वर्षा करती थीं ॥ १४ ॥
स शालिभवनं रम्यं सर्वसस्यसमाचितम् ।
सुखं परमधर्मिष्ठमभ्यगाद् भरतर्षभ ॥ १५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मकार्यके लिये अत्यन्त उपयोगी तथा सम्पूर्ण सस्य-सम्पत्तिसे भरे हुए अगहनी धानके मनोहर खेत देखते हुए भगवान् बड़े सुखसे यात्रा कर रहे थे ॥ १५ ॥
पश्यन् बहुपशून् ग्रामान् रम्यान् हृदयतोषणान् ।
पुराणि च व्यतिक्रामन् राष्ट्राणि विविधानि च ॥ १६ ॥
रास्तेमें कितने ही ऐसे गाँव मिलते, जिनमें बहुत-से पशुओंका पालन-पोषण होता था। वे देखनेमें अत्यन्त सुन्दर और मनको संतोष देनेवाले थे। उन सबको देखते और अनेकानेक नगरों एवं राष्ट्रोंको लाँघते हुए वे आगे बढ़ते चले गये ॥ १६ ॥
नित्यं हृष्टाः सुमनसो भारतैरभिरक्षिताः ।
नोद्विग्नाः परचक्राणां व्यसनानामकोविदाः ॥ १७ ॥
उपप्लव्यादथायान्तं जनाः पुरनिवासिनः ।
पथ्यतिष्ठन्त सहिता विष्वक्सेनदिदृक्षया ॥ १८ ॥
इधर उपप्लव्य नगरसे आते हुए भगवान् श्रीकृष्णको देखनेकी इच्छासे अनेक नागरिक रास्तेमें एक साथ खड़े थे। भरतवंशियोंद्वारा सुरक्षित होनेके कारण वे सदा हर्ष एवं उल्लाससे भरे रहते थे। उनका मन बहुत प्रसन्न था। उन्हें शत्रुओंकी सेनाओंसे उद्विग्न होनेका अवसर नहीं आता था। दुःख और संकट कैसा होता है, इसको वे जानते ही नहीं थे ॥ १७-१८ ॥
ते तु सर्वे समायान्तमग्निमिद्धमिव प्रभुम् ।
अर्चयामासुरर्हं देशातिथिमुपस्थितम् ॥ १९ ॥
उन सबने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और अपने देशके पूजनीय अतिथि भगवान् श्रीकृष्णको समीप आते देख निकट जाकर उनका यथावत् पूजन किया ॥
वृकस्थलं समासाद्य केशवः परवीरहा ।
प्रकीर्णरश्मावादित्ये व्योम्नि वै लोहितायति ॥ २० ॥
अवतीर्य रथात् तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि ।
रथमोचनमादिश्य संध्यामुपविवेश ह ॥ २१ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जब वृकस्थलमें पहुँचे, उस समय नाना किरणोंसे मण्डित सूर्य अस्त होने लगे और पश्चिमके आकाशमें लाली छा गयी। तब भगवान्ने शीघ्र ही रथसे उतरकर उसे खोलनेकी आज्ञा दी और विधिपूर्वक शौच-स्नान करके वे संध्योपासना करने लगे ॥ २०-२१ ॥
दारुकोऽपि हयान् मुक्त्वा परिचर्य च शास्त्रतः ।
मुमोच सर्वयोक्त्रादि मुक्त्वा चैतानवासृजत् ॥ २२ ॥
दारुकने भी घोड़ोंको खोलकर शास्त्रविधिके अनुसार उनकी परिचर्या की और उनका सारा साज-बाज उतार दिया तथा उन्हें बन्धनमुक्त करके छोड़ दिया ॥ २२ ॥
अभ्यतीत्य तु तत् सर्वमुवाच मधुसूदनः ।
युधिष्ठिरस्य कार्यार्थमिह वत्स्यामहे क्षपाम् ॥ २३ ॥
संध्या-वन्दन आदि सारा कार्य समाप्त करके मधुसूदन श्रीकृष्णने कहा—'युधिष्ठिरका कार्य सिद्ध करनेके लिये आज रातमें हमलोग यहीं रहेंगे' ॥ २३ ॥
तस्य तन्मतमाज्ञाय चक्रुरावसथं नराः ।
क्षणेन चान्नपानानि गुणवन्ति समार्जयन् ॥ २४ ॥
उनका यह विचार जानकर सेवकोंने वहीं डेरे डाल दिये। क्षणभरमें उन्होंने खाने-पीनेके उत्तमोत्तम पदार्थ प्रस्तुत कर दिये ॥ २४ ॥
तस्मिन् ग्रामे प्रधानास्तु य आसन् ब्राह्मणा नृप ।
आर्याः कुलीना ह्रीमन्तो ब्राह्मीं वृत्तिमनुष्ठिताः ॥ २५ ॥
राजन्! उस गाँवमें जो प्रमुख ब्राह्मण रहते थे, वे श्रेष्ठ, कुलीन, लज्जाशील और ब्राह्मणोचित वृत्तिका पालन करनेवाले थे ॥ २५ ॥ तेऽभिगम्य महात्मानं हृषीकेशमरिंदमम् । पूजां चक्रुर्यथान्यायमाशीर्मङ्गलसंयुताम् ॥ २६ ॥
उन्होंने शत्रुदमन महात्मा हृषीकेशके पास जाकर आशीर्वाद तथा मंगलपाठपूर्वक उनका यथोचित पूजन किया ॥ ते पूजयित्वा दाशार्हं सर्वलोकेषु पूजितम् । न्यवेदयन्त वेश्मानि रत्नवन्ति महात्मने ॥ २७ ॥ सर्वलोकपूजित दशार्हनन्दन श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्होंने उन महात्माको अपने रत्नसम्पन्न गृह समर्पित कर दिये अर्थात् अपने-अपने घरोंमें ठहरनेके लिये प्रभुसे प्रार्थना की ॥ २७ ॥ तान् प्रभुः कृतमित्युक्त्वा सत्कृत्य च यथार्हतः । अभ्येत्य चैषां वेश्मानि पुनरायात् सहैव तैः ॥ २८ ॥ तब भगवान्ने यह कहकर कि यहाँ ठहरनेके लिये पर्याप्त स्थान है, उनका यथायोग्य सत्कार किया और (उनके संतोषके लिये) उन सबके घरोंपर जाकर पुनः उनके साथ ही लौट आये ॥ २८ ॥
सुमृष्टं भोजयित्वा च ब्राह्मणांस्तत्र केशवः ।
भुक्त्वा च सह तैः सर्वैरवसत् तां क्षपां सुखम् ॥ २९ ॥
तत्पश्चात् केशवने वहीं उन ब्राह्मणोंको सुस्वादु अन्न भोजन कराया, फिर स्वयं भी भोजन करके उन सबके साथ उस रातमें वहाँ सुखपूर्वक निवास किया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णप्रयाणे
चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थानविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 617)
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्र आदिकी अनुमतिसे श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये मार्गमें विश्रामस्थान बनवाना
वैशम्पायन उवाच
तथा दूतैः समाज्ञाय प्रयान्तं मधुसूदनम् ।
धृतराष्ट्रोऽब्रवीद् भीष्ममर्चयित्वा महाभुजम् ॥ १ ॥
द्रोणं च संजयं चैव विदुरं च महामतिम् ।
दुर्योधनं सहामात्यं हृष्टरोमाब्रवीदिदम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दूतोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनके आगमनका समाचार जानकर धृतराष्ट्रके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने महाबाहु भीष्म, द्रोण, संजय तथा परम बुद्धिमान् विदुरका यथावत् सत्कार करके मन्त्रियोंसहित दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥
अद्भुतं महदाश्चर्यं श्रूयते कुरुनन्दन ।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च कथयन्ति गृहे गृहे ॥ ३ ॥
सत्कृत्याचक्षते चान्ये तथैवान्ये समागताः ।
पृथग्वादाश्च वर्तन्ते चत्वरेषु सभासु च ॥ ४ ॥
‘कुरुनन्दन! एक अद्भुत और अत्यन्त आश्चर्यकी बात सुनायी देती है। घर-घरमें स्त्री-बालक और बूढ़े इसीकी चर्चा करते हैं। जो यहाँके निवासी हैं, वे तथा जो बाहरसे आये हुए हैं, वे भी आदरपूर्वक उसी बातको कहते हैं। चौराहोंपर और सभाओंमें भी पृथक्-पृथक् वही चर्चा चलती है ॥ ३-४ ॥
उपायास्यति दाशार्हः पाण्डवार्थे पराक्रमी ।
स नो मान्यश्च पूज्यश्च सर्वथा मधुसूदनः ॥ ५ ॥
‘वह बात यह है कि पाण्डवोंकी ओरसे परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारेंगे। वे मधुसूदन हमलोगोंके माननीय तथा सब प्रकारसे पूजनीय हैं ॥ ५ ॥
तस्मिन् हि यात्रा लोकस्य भूतानामीश्वरो हि सः ।
तस्मिन् धृतिश्च वीर्यं च प्रज्ञा चौजश्च माधवे ॥ ६ ॥
‘सम्पूर्ण लोकोंका जीवन उन्हींपर निर्भर है, क्योंकि वे सम्पूर्ण भूतोंके अधीश्वर हैं। उन माधवमें धैर्य, पराक्रम, बुद्धि और तेज सब कुछ है ॥ ६ ॥
स मान्यतां नरश्रेष्ठः स हि धर्मः सनातनः ।
पूजितो हि सुखाय स्यादसुखः स्यादपूजितः ॥ ७ ॥
‘उन नरश्रेष्ठ श्रीकृष्णका यहाँ सम्मान होना चाहिये; क्योंकि वे सनातन धर्मस्वरूप हैं। सम्मानित होनेपर वे हमारे लिये सुखदायक होंगे और सम्मानित न होनेपर हमारे दुःखके कारण बन जायँगे॥ ७॥ स चेत् तुष्यति दाशार्ह उपचारैररिंदमः। कृष्णात् सर्वानभिप्रायन् प्राप्स्यामः सर्वराजसु॥ ८॥ ‘शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण यदि हमारे सत्कार-साधनोंसे संतुष्ट हो जायँगे, तब हम समस्त राजाओंमें उनसे अपने सारे मनोरथ प्राप्त कर लेंगे॥ ८॥ तस्य पूजार्थमद्यैव संविधत्स्व परंतप। सभाः पथि विधीयन्तां सर्वकामसमन्विताः॥ ९॥ ‘परंतप! तुम श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये आजसे ही तैयारी करो। मार्गमें अनेक विश्रामस्थान बनवाओ और उनमें सब प्रकारकी मनोनुकूल उपभोग-सामग्री प्रस्तुत करो॥ ९॥ यथा प्रीतिर्महाबाहो त्वयि जायेत तस्य वै। तथा कुरुष्व गान्धारे कथं वा भीष्म मन्यसे॥ १०॥ ‘महाबाहु गान्धारीनन्दन! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे श्रीकृष्णके हृदयमें तुम्हारे प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाय। अथवा भीष्मजी! इस विषयमें आपकी क्या सम्मति है?’॥ १०॥ ततो भीष्मादयः सर्वे धृतराष्ट्रं जनाधिपम्। ऊचुः परममित्येवं पूजयन्तोऽस्य तद् वचः॥ ११॥ तब भीष्म आदि सब लोगोंने उस प्रस्तावकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए राजा धृतराष्ट्रसे कहा—‘बहुत उत्तम बात है’॥ ११॥ तेषामनुमतं ज्ञात्वा राजा दुर्योधनस्तदा। सभावास्तूनि रम्याणि प्रदेष्टुमुपचक्रमे॥ १२॥ उन सबकी अनुमति जानकर राजा दुर्योधनने उस समय जगह-जगह सुन्दर सभामण्डप तथा विश्रामस्थान बनवानेके लिये आदेश जारी किया॥ १२॥ ततो देशेषु देशेषु रमणीयेषु भागशः। सर्वरत्नसमाकीर्णाः सभाश्चक्रुरनेकशः॥ १३॥ तब कारीगरोंने विभिन्न रमणीय प्रदेशोंमें अलग-अलग सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न अनेक विश्राम-स्थान बनाये॥ १३॥ आसनानि विचित्राणि युतानि विविधैर्गुणैः। स्त्रियो गन्धानलंकारान् सूक्ष्माणि वसनानि च॥ १४॥ गुणवन्त्यन्नपानानि भोज्यानि विविधानि च। माल्यानि च सुगन्धीनि तानि राजा ददौ ततः॥ १५॥
नाना प्रकारके गुणोंसे युक्त विचित्र आसन, स्त्रियाँ, सुगन्धित पदार्थ, आभूषण, महीन वस्त्र, गुणकारक अन्न और पेय पदार्थ, भाँति-भाँतिके भोजन तथा सुगन्धित पुष्पमालाएँ आदि वस्तुओंको राजा दुर्योधनने उन स्थानोंमें रखवाया ॥ १४-१५ ॥
विशेषतश्च वासार्थं सभां ग्रामे वृकस्थले ।
विदधे कौरवो राजा बहुरत्नां मनोरमाम् ॥ १६ ॥
विशेषतः वृकस्थल नामक ग्राममें निवास करनेके लिये कुरुराज दुर्योधनने जो विश्रामस्थान बनवाया था, वह बड़ा मनोरम तथा प्रचुर रत्नराशिसे सम्पन्न था ॥ १६ ॥
एतद् विधाय वै सर्वं देवार्हमतिमानुषम् ।
आचख्यौ धृतराष्ट्राय राजा दुर्योधनस्तदा ॥ १७ ॥
मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ यह सब देवोचित व्यवस्था करके राजा दुर्योधनने धृतराष्ट्रको इसकी सूचना दे दी ॥ १७ ॥
ताः सभाः केशवः सर्वा रत्नानि विविधानि च ।
असमीक्ष्यैव दाशार्ह उपायात् कुरुसद्म तत् ॥ १८ ॥
परंतु यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण उन विश्रामस्थानों तथा नाना प्रकारके रत्नोंकी ओर दृष्टिपाततक न करके कौरवोंके निवासस्थान हस्तिनापुरकी ओर बढ़ते चले गये ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मार्गे सभानिर्माणे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मार्गमें विश्रामस्थलनिर्माणविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 620)
षडशीतितमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दुःशासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना
धृतराष्ट्र उवाच
उपप्लव्यादिह क्षत्तरुपायातो जनार्दनः ।
वृकस्थले निवसति स च प्रातरिहैष्यति ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**विदुर! मुझे सूचना मिली है कि भगवान् श्रीकृष्ण उपप्लव्यसे यहाँके लिये प्रस्थित हो गये हैं, आज वृकस्थलमें ठहरे हैं तथा कल सबेरे ही इस नगरमें पहुँच जायँगे ॥ १ ॥
आहुकानामधिपतिः पुरोगः सर्वसात्वताम् ।
महामना महावीर्यो महासत्त्वो जनार्दनः ॥ २ ॥
भगवान् जनार्दन आहुकवंशी क्षत्रियोंके अधिपति तथा समस्त सात्वतों (यादवों)-के अगुआ हैं। उनका हृदय महान् है, पराक्रम भी महान् है तथा वे महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं ॥ २ ॥
स्फीतस्य वृष्णिराष्ट्रस्य भर्ता गोप्ता च माधवः ।
त्रयाणामपि लोकानां भगवान् प्रपितामहः ॥ ३ ॥
वे भगवान् माधव समृद्धिशाली यादव गणराष्ट्रके पोषक तथा संरक्षक हैं। पितामहके भी जनक होनेके कारण वे तीनों लोकोंके प्रपितामह हैं ॥ ३ ॥
वृष्ण्यन्धकाः सुमनसो यस्य प्रज्ञामुपासते ।
आदित्या वसवो रुद्रा यथा बुद्धिं बृहस्पतेः ॥ ४ ॥
जैसे आदित्य, वसु तथा रुद्रगण बृहस्पतिकी बुद्धिका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके लोग प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णकी ही बुद्धिके आश्रित रहते हैं ॥ ४ ॥
तस्मै पूजां प्रयोक्ष्यामि दाशार्हाय महात्मने ।
प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तां मे कथयतः शृणु ॥ ५ ॥
धर्मज्ञ विदुर! मैं तुम्हारे सामने ही उन महात्मा श्रीकृष्णको जो पूजा दूँगा, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ५ ॥
एकवर्णैः सुक्लृप्ताङ्गैर्बाह्लिजातैर्हयोत्तमैः ।
चतुर्युक्तान् रथांस्तस्मै रौक्मान् दास्यामि षोडश ॥ ६ ॥
एक रंगके, सुदृढ़ अंगोंवाले तथा बाह्लीकदेशमें उत्पन्न हुए उत्तम जातिके चार-चार घोड़ोंसे जुते हुए सोलह सुवर्णमय रथ मैं श्रीकृष्णको भेंट करूँगा ॥ ६ ॥
नित्यप्रभिन्नान् मातङ्गानीषादन्तान् प्रहारिणः । अष्टानुचरमेकैकम्शौ दास्यामि कौरव ॥ ७ ॥ कुरुनन्दन! इनके सिवा मैं उन्हें आठ मतवाले हाथी भी दूँगा, जिनके मस्तकोंसे सदा मद चूता रहता है, जिनके दाँत ईषादण्डके समान प्रतीत होते हैं तथा जो शत्रुओंपर प्रहार करनेमें कुशल हैं और जिन आठों गजराजोंमेंसे प्रत्येकके साथ आठ-आठ सेवक हैं ॥ ७ ॥
दासीनाम्प्रजातानां शुभानां रुक्मवर्चसाम् । शतमस्मै प्रदास्यामि दासानापि तावताम् ॥ ८ ॥ साथ ही मैं उन्हें सुवर्णकी-सी कान्तिवाली परम सुन्दरी सौ ऐसी दासियाँ दूँगा, जिनसे किसी संतानकी उत्पत्ति नहीं हुई है। दासियोंके ही बराबर दास भी दूँगा ॥ ८ ॥
आविकं च सुखस्पर्शं पार्वतीयैरुपाहृतम् । तदप्यस्मै प्रदास्यामि सहस्राणि दशाष्ट च ॥ ९ ॥ मेरे यहाँ पर्वतीयोंसे भेंटमें मिले हुए भेड़के ऊनसे बने हुए (असंख्य) कम्बल हैं, जो स्पर्श करनेपर बड़े मुलायम जान पड़ते हैं; उनमेंसे अठारह हजार कम्बल भी मैं श्रीकृष्णको उपहारमें दूँगा ॥ ९ ॥
अजिनानां सहस्राणि चीनदेशोद्भव्वानि च । तान्यप्यस्मै प्रदास्यामि यावदर्हति केशवः ॥ १० ॥ चीनदेशमें उत्पन्न हुए सहस्रों मृगचर्म मेरे भण्डारमें सुरक्षित हैं; उनमेंसे श्रीकृष्ण जितने लेना चाहेंगे, उतने सब-के-सब उन्हें अर्पित कर दूँगा ॥ १० ॥
दिवा रात्रौ च भात्येष सुतेजा विमलो मणिः । तमप्यस्मै प्रदास्यामि तमर्हति हि केशवः ॥ ११ ॥ मेरे पास यह एक अत्यन्त तेजस्वी निर्मल मणि है, जो दिन तथा रातमें भी प्रकाशित होती है, इसे भी मैं श्रीकृष्णको ही दूँगा; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं ॥
एकेनाभिपतत्यह्ना योजनानि चतुर्दश । यानमश्वतरीयुक्तं दास्ये तस्मै तदप्यहम् ॥ १२ ॥ मेरे पास खच्चरियोंसे युक्त एक रथ है, जो एक दिनमें चौदह योजनतक चला जाता है, वह भी मैं उन्हींको अर्पित करूँगा ॥ १२ ॥
यावन्ति वाहनान्यस्य यावन्तः पुरुषाश्च ते । ततोऽष्टगुणमप्यस्मै भोज्यं दास्याम्यहं सदा ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णके साथ जितने वाहन और जितने सेवक आयेंगे उन सबको औसतसे आठगुना भोजन मैं प्रत्येक समय देता रहूँगा ॥ १३ ॥
मम पुत्राश्च पौत्राश्च सर्वे दुर्योधनादृते । प्रत्युद्यास्यन्ति दाशार्हं रथैर्मुख्यैः स्वलंकृताः ॥ १४ ॥
दुर्योधनके सिवा मेरे सभी पुत्र और पौत्र वस्त्र-आभूषणोंसे विभूषित हो स्वच्छ-सुन्दर रथोंपर बैठकर श्रीकृष्णकी अगवानीके लिये जायँगे ॥ १४ ॥
स्वलंकृताश्च कल्याण्यः पादैरेव सहस्रशः ।
वारमुख्या महाभागं प्रत्युद्यास्यन्ति केशवम् ॥ १५ ॥
सहस्रों सुन्दरी वारांगनाएँ सुन्दर वेषभूषासे सज-धजकर महाभाग केशवकी अगवानीके लिये पैदल ही जायँगी ॥ १५ ॥
नगरादपि याः काश्चिद् गमिष्यन्ति जनार्दनम् ।
द्रष्टुं कन्याश्च कल्याण्यस्ताश्च यास्यन्त्यनावृताः ॥ १६ ॥
जनार्दनका दर्शन करनेके लिये इस नगरसे जो भी कोई पर्दा न रखनेवाली कल्याणमयी कन्याएँ जाना चाहेंगी, वे जा सकेंगी ॥ १६ ॥
सस्त्रीपुरुषबालं च नगरं मधुसूदनम् ।
उदीक्षतां महात्मानं भानुमन्तमिव प्रजाः ॥ १७ ॥
जैसे प्रजा सूर्यदेवका दर्शन करती है, उसी प्रकार स्त्री, पुरुष और बालकोंसहित यह सारा नगर महात्मा मधुसूदनका दर्शन करे ॥ १७ ॥
महाध्वजपताकाश्च क्रियन्तां सर्वतो दिशः ।
जलावसिक्तो विरजाः पन्थास्तस्येति चान्वशात् ॥ १८ ॥
‘नगरमें चारों ओर विशाल ध्वजाएँ और पताकाएँ फहरा दी जायँ और श्रीकृष्ण जिसपर आ रहे हों, उस राजपथपर जलका छिड़काव करके उसे धूलरहित बना दिया जाय’ इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रने आदेश दिया ॥ १८ ॥
दुःशासनस्य च गृहं दुर्योधनगृहाद् वरम् ।
तदद्य क्रियतां क्षिप्रं सुसम्मृष्टमलंकृतम् ॥ १९ ॥
इतना कहकर वे फिर बोले—दुःशासनका महल दुर्योधनके राजभवनसे भी श्रेष्ठ है। उसीको आज झाड़-पोंछकर सब प्रकारसे सुसज्जित कर दिया जाय ॥ १९ ॥
एतद्धि रुचिराकारैः प्रासादैरुपशोभितम् ।
शिवं च रमणीयं च सर्वर्तुसुमहाधनम् ॥ २० ॥
यह महल सुन्दर आकारवाले भवनोंसे सुशोभित, कल्याणकारी, रमणीय, सभी ऋतुओंके वैभवसे सम्पन्न तथा अनन्त धनराशिसे समृद्ध है ॥ २० ॥
सर्वमस्मिन् गृहे रत्नं मम दुर्योधनस्य च ।
यद् यदर्हति वार्ष्णेयस्तत् तद् देयमसंशयम् ॥ २१ ॥
मेरे और दुर्योधनके पास जो भी रत्न हैं, वे सब इसी घरमें रखे हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उनमेंसे जो-जो रत्न लेना चाहें, वे सब उन्हें निःसंदेह दे दिये जायँ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 624)
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना
विदुर उवाच
राजन् बहुमतश्चासि त्रैलोक्यस्यापि सत्तमः । सम्भावितश्च लोकस्य सम्मतश्चासि भारत ॥ १ ॥ **विदुरजी बोले—**राजन्! आप तीनों लोकोंके श्रेष्ठतम पुरुष हैं और सर्वत्र आपका बहुत सम्मान होता है। भारत! इस लोकमें भी आपकी बड़ी प्रतिष्ठा और सम्मान है ॥ १ ॥
यत् त्वमेवंगते ब्रूयाः पश्चिमे वयसि स्थितः । शास्त्राद् वा सुप्रतर्काद् वा सुस्थिरः स्थविरो ह्यसि ॥ २ ॥ इस समय आप अन्तिम अवस्था (बुढ़ापे)-में स्थित हैं। ऐसी स्थितिमें आप जो कुछ कह रहे हैं, वह शास्त्रसे अथवा लौकिक युक्तिसे भी ठीक ही है। इस सुस्थिर विचारके कारण ही आप वास्तवमें स्थविर (वृद्ध) हैं ॥ २ ॥
लेखा शशिनि भाः सूर्ये महोर्मिरिव सागरे । धर्मस्त्वयि तथा राजन्निति व्यवसिताः प्रजाः ॥ ३ ॥ राजन्! जैसे चन्द्रमामें कला है, सूर्यमें प्रभा है और समुद्रमें उत्ताल तरंगें हैं, उसी प्रकार आपमें धर्मकी स्थिति है। यह समस्त प्रजा निश्चितरूपसे जानती है ॥
सदैव भावितो लोको गुणौघैस्तव पार्थिव । गुणानां रक्षणे नित्यं प्रयतस्व सबान्धवः ॥ ४ ॥ भूपाल! आपके सद्गुणसमूहसे सदा ही इस जगत्की उन्नति एवं प्रतिष्ठा हो रही है। अतः आप अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सदा ही इन सद्गुणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न कीजिये ॥ ४ ॥
आर्जवं प्रतिपद्यस्व मा बाल्याद् बहु नीनशः । राजन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च सुहृदश्चैव सुप्रियान् ॥ ५ ॥ राजन्! आप सरलताको अपनाइये। मूर्खतावश कुटिलताका आश्रय ले अपने अत्यन्त प्रिय पुत्रों, पौत्रों तथा सुहृदोंका महान् सर्वनाश न कीजिये ॥ ५ ॥
यत् त्वमिच्छसि कृष्णाय राजन्नतिथये बहु । एतदन्यच्च दाशार्हः पृथिवीमपि चार्हति ॥ ६ ॥ नरेश्वर! श्रीकृष्णको अतिथिरूपमें पाकर आप जो उन्हें बहुत-सी वस्तुएँ देना चाहते हैं, उन सबके साथ-साथ वे आपसे इस समूची पृथिवीके भी पानेके अधिकारी हैं ॥ ६ ॥