महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1922)
सप्ततितमोऽध्यायः
भीष्म और भीमसेनका घमासान युद्ध
संजय उवाच
अकरोत् तुमुलं युद्धं भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
भीमसेनभयादिच्छन् पुत्रांस्तारयितुं तव ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! आपके पुत्रोंको भीमसेनके भयसे छुड़ानेकी इच्छा रखकर उस दिन शान्तनुनन्दन भीष्मने बड़ा भयंकर युद्ध किया ॥ १ ॥
पूर्वाह्ने तन्महद्रौद्रं राज्ञां युद्धमवर्तत ।
कुरूणां पाण्डवानां च मुख्यशूरविनाशनम् ॥ २ ॥
पूर्वाह्नकालमें कौरव-पाण्डव नरेशोंका वह महा-भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ, जो बड़े-बड़े शूरवीरोंका विनाश करनेवाला था ॥ २ ॥
तस्मिन्नाकुलसंग्रामे वर्तमाने महाभये ।
अभवत् तुमुलः शब्दः संस्पृशन् गगनं महत् ॥ ३ ॥
उस अत्यन्त भयानक घमासान युद्धमें बड़ा भयंकर कोलाहल होने लगा, जिससे अनन्त आकाश गूँज उठा ॥ ३ ॥
नदद्भिश्च महानागैर्हेषमाणैश्च वाजिभिः ।
भेरीशङ्खनिनादैश्च तुमुलं समपद्यत ॥ ४ ॥
चिग्घाड़ते हुए बड़े-बड़े गजराजों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भेरी और शंखकी ध्वनियोंसे भयंकर कोलाहल छा गया ॥ ४ ॥
युयुत्सवस्ते विक्रान्ता विजयाय महाबलाः ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोष्ठेष्विव महर्षभाः ॥ ५ ॥
जैसे बड़े-बड़े साँड़ गोशालाओंमें गरजते हुए एक-दूसरेसे भिड़ जाते हैं, उसी प्रकार पराक्रमी और महाबली सैनिक विजयके लिये युद्धकी इच्छा रखकर गरजते हुए एक-दूसरेके सामने आये ॥ ५ ॥
शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः ।
अश्मवृष्टिरिवाकाशे बभूव भरतर्षभ ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समरभूमिमें तीखे बाणोंसे गिराये जानेवाले मस्तकोंकी वर्षा होने लगी, मानो आकाशसे पत्थरोंकी वृष्टि हो रही है ॥ ६ ॥
कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपोज्ज्वलानि च ।
पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि भरतर्षभ ॥ ७ ॥
भरतवंशी नरेश! कुण्डल और पगड़ी धारण करनेवाले तथा स्वर्णमय मुकुट आदिसे उद्भासित होनेवाले अगणित मस्तक कटकर धरतीपर पड़े दिखायी देते थे ॥ ७ ॥ विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बाहुभिश्च सकार्मुकैः । सहस्ताभरणैश्चान्यैरभवच्छादिता मही ॥ ८ ॥ सारी पृथिवी बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुई लाशों, धनुष तथा हस्ताभरणोंसहित कटी हुई दोनों भुजाओंसे पट गयी थी ॥ ८ ॥ कवचोपहितैर्गात्रैर्हस्तैश्च समलंकृतैः । मुखैश्च चन्द्रसंकाशै रक्तान्तनयनैः शुभैः ॥ ९ ॥ गजवाजिमनुष्याणां सर्वगात्रैश्च भूपते । आसीत् सर्वा समास्तीर्णा मुहूर्तेन वसुंधरा ॥ १० ॥ भूपाल! दो ही घड़ीमें वहाँकी सारी वसुधा कवचसे ढके हुए शरीरों, आभूषणोंसे विभूषित हाथों, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखों, जिनके अन्तभागमें कुछ-कुछ लाली थी, ऐसे सुन्दर नेत्रों तथा हाथी, घोड़े और मनुष्योंके सम्पूर्ण अंगोंसे बिछ गयी थी ॥ ९-१० ॥ रजोमेघैश्च तुमुलैः शस्त्रविद्युत्प्रकाशिभिः । आयुधानां च निर्घोषः स्तनयित्नुसमोऽभवत् ॥ ११ ॥ धूलके भयंकर बादल छा रहे थे। उनमें अस्त्र-शस्त्ररूपी विद्युत्के प्रकाश देखे जाते थे। धनुष आदि आयुधोंका जो गम्भीर घोष होता था, वह मेघगर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ ११ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलः कटुकः शोणितोदकः । प्रावर्तत कुरूणां च पाण्डवानां च भारत ॥ १२ ॥ भारत! कौरवों और पाण्डवोंका वह भयानक युद्ध बड़ा ही कटु और रक्तको पानीकी तरह बहानेवाला था ॥ १२ ॥ तस्मिन् महाभये घोरे तुमुले लोमहर्षणे । ववृषुः शरवर्षाणि क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ १३ ॥ उस महान् भयदायक, घोर, रोमांचकारी एवं तुमुल संग्राममें रणदुर्मद क्षत्रिय बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १३ ॥ आक्रोशनन् कुञ्जरास्तत्र शरवर्षप्रतापिताः । तावकानां परेषां च संयुगे भरतर्षभ ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! बाणोंकी वर्षासे पीड़ित हुए आपके और पाण्डवोंके हाथी उस युद्धमें चिग्घाड़ मचा रहे थे ॥ संरब्धानां च वीराणां धीराणाममितौजसाम् । धनुर्ज्यातालशब्देन न प्राज्ञायत किंचन ॥ १५ ॥
क्रोधावेशमें भरे हुए अमित तेजस्वी धीर-वीरोंके धनुषोंकी टंकारसे वहाँ कुछ भी सुनायी नहीं पड़ता था ।। उत्थितेषु कबन्धेषु सर्वतः शोणितोदके। समरे पर्यधावन्त नृपा रिपुवधोद्यताः ॥ १६॥ चारों ओर केवल कबन्ध (बिना सिरके शरीर) खड़े थे। रक्तका प्रवाह पानीके समान बह रहा था। शत्रुओंका वध करनेके लिये उद्यत हुए नरेशगण समरभूमिमें चारों ओर दौड़ लगा रहे थे ॥ १६ ॥ शरशक्तिगदाभिस्ते खड्गैश्चामिततेजसः। निजघ्नुः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः ॥ १७॥ परिघके समान मोटी भुजाओंवाले अमित तेजस्वी शूरवीर योद्धा बाण, शक्ति और गदाओंद्वारा रणक्षेत्रमें एक-दूसरेको मार रहे थे ॥ १७ ॥ बभ्रमुः कुञ्जराश्चात्र शरैर्विद्धा निरङ्कुशाः। अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥ १८॥ जिनके सवार मारे गये थे, वे अंकुशरहित गजराज बाणविद्ध होकर वहाँ इधर-उधर चक्कर काट रहे थे। सवारोंके मारे जानेसे घोड़े भी शराघातसे पीड़ित हो चारों ओर दौड़ लगा रहे थे ॥ १८ ॥ उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरघातप्रपीडिताः। तावकानां परेषां च योधा भरतसत्तम ॥ १९॥ भरतश्रेष्ठ! आपके और शत्रुपक्षके कितने ही योद्धा बाणोंके गहरे आघातसे अत्यन्त पीड़ित हो उछलकर गिर पड़ते थे ॥ १९ ॥ वाहानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत। गदानां परिघाणां च हस्तानां चोरुभिः सह ॥ २०॥ पादानां भूषणानां च केयूराणां च संघशः। राशयस्तत्र दृश्यन्ते भीष्मभीमसमागमे ॥ २१॥ भारत! भीष्म और भीमके उस संग्राममें मरे हुए वाहनों, कटे हुए मस्तकों, धनुषों, गदाओं, परिघों, हाथों, जाँघों, पैरों, आभूषणों तथा बाजूबन्द आदिके ढेर-के-ढेर दिखायी दे रहे थे ॥ २०-२१ ॥ अश्वानां कुञ्जराणां च रथानां चानिवर्तिनाम्। संघाताः स्म प्रदृश्यन्ते तत्र तत्र विशाम्पते ॥ २२॥ प्रजानाथ! उस युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ घोड़ों, हाथियों तथा युद्धसे पीछे न हटनेवाले रथोंके समूह दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २२ ॥ गदाभिरसिभिः प्रासैर्बाणैश्च नतपर्वभिः। जघ्नुः परस्परं तत्र क्षत्रियाः काल आगते ॥ २३॥
क्षत्रियगण गदा, खड्ग, प्रास तथा झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेको मार रहे थे; क्योंकि उन सबका काल आ गया था ॥ २३ ॥ अपरे बाहुभिर्वीरा नियुद्धकुशला युधि । बहुधा समसज्जन्त आयसैः परिघैरिव ॥ २४ ॥ कितने ही मल्लयुद्धमें कुशल वीर उस युद्धस्थलमें लोहेके परिघोंके समान मोटी भुजाओंसे परस्पर भिड़कर अनेक प्रकारके दाँव-पेंच दिखाते हुए लड़ रहे थे ॥ २४ ॥ मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव तलैश्चैव विशाम्पते । अन्योन्यं जघ्निरे वीरास्तावकाः पाण्डवैः सह ॥ २५ ॥ प्रजानाथ! आपके वीर सैनिक पाण्डवोंके साथ युद्ध करते समय मुक्कों, घुटनों और तमाचोंसे एक-दूसरेपर चोट करते थे ॥ २५ ॥ पतितैः पात्यमानैश्च विचेष्टद्भिश्च भूतले । घोरमायोधनं जज्ञे तत्र तत्र जनेश्वर ॥ २६ ॥ जनेश्वर! कुछ लोग पृथ्वीपर गिरे हुए थे, कुछ गिराये जा रहे थे और कितने ही गिरकर छटपटा रहे थे। इस प्रकार यत्र-तत्र भयंकर युद्ध चल रहा था ॥ विरथा रथिनश्चात्र निस्त्रिंशवरधारिणः । अन्योन्यमभिधावन्तः परस्परवधैषिणः ॥ २७ ॥ कितने ही रथी रथहीन होकर हाथमें सुदृढ़ तलवार लिये एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे परस्पर टूट पड़ते थे ॥ २७ ॥ ततो दुर्योधनो राजा कलिङ्गैर्बहुभिर्वृतः । पुरस्कृत्य रणे भीष्मं पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ २८ ॥ उस समय बहुसंख्यक कलिंगोंसे घिरे हुए राजा दुर्योधनने युद्धमें भीष्मको आगे करके पाण्डवोंपर आक्रमण किया ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । भीष्ममभ्यद्रवन् क्रुद्धास्ततो युद्धमवर्तत ॥ २९ ॥ इसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए समस्त पाण्डवोंने भी भीमसेनको घेरकर भीष्मपर धावा किया। फिर दोनों पक्षोंमें भयंकर युद्ध होने लगा ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुल-युद्धविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
अध्याय (पृष्ठ 1926)
एकसप्ततितमोऽध्यायः
भीष्म, अर्जुन आदि योद्धाओंका घमासान युद्ध
संजय उवाच
दृष्ट्वा भीष्मेण संसक्तान् भ्रातॄनन्यांश्च पार्थिवान् ।
समभ्यधावद् गाङ्गेयमुद्यतास्त्रो धनंजयः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंको भीष्मके साथ उलझा हुआ देख अस्त्र उठाये हुए अर्जुनने भी गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया ॥ १ ॥
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं धनुषो गाण्डिवस्य च ।
ध्वजं च दृष्ट्वा पार्थस्य सर्वान् नो भयमाविशत् ॥ २ ॥
पांचजन्यशंख और गाण्डीवधनुषका शब्द सुनकर तथा अर्जुनके ध्वजको देखकर हमारे सब सैनिकोंके मनमें भय समा गया ॥ २ ॥
सिंहलाङ्गूलमाकाशे ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
असज्जमानं वृक्षेषु धूमकेतुमिवोत्थितम् ॥ ३ ॥
बहुवर्णं विचित्रं च दिव्यं वानरलक्षणम् ।
अपश्याम महाराज ध्वजं गाण्डीवधन्वनः ॥ ४ ॥
महाराज! अर्जुनका ध्वज सिंहपुच्छके समान वानरकी पूँछसे युक्त था। वह प्रज्वलित पर्वत-सा दिखायी देता था। वृक्षोंमें कहीं भी अटकता नहीं था। आकाशमें उदित हुए धूमकेतु-सा दृष्टिगोचर होता था। वह अनेक रंगोंसे सुशोभित, विचित्र, दिव्य एवं वानर-चिह्नसे युक्त था। इस प्रकार हमने गाण्डीवधारी अर्जुनके उस ध्वजको उस समय देखा ॥ ३-४ ॥
विद्युतं मेघमध्यस्थां भ्राजमानामिवाम्बरे ।
ददृशुर्गाण्डिवं योधा रुक्मपृष्ठं महामृधे ॥ ५ ॥
उस महान् समरमें हमारे पक्षके योद्धाओंने सुवर्णमय पीठसे युक्त गाण्डीवधनुषको आकाशके भीतर मेघोंकी घटामें चमकती हुई बिजलीके समान देखा ॥ ५ ॥
अशुश्रुम भृशं चास्य शक्रस्येवाभिगर्जतः ।
सुघोरं तलयोः शब्दं निघ्नतस्तव वाहिनीम् ॥ ६ ॥
अर्जुन आपकी सेनाका संहार करते हुए इन्द्रके समान गर्जना कर रहे थे। इस समय हमलोगोंने उनके हस्ततलोंका बड़ा भयंकर शब्द सुना ॥ ६ ॥
चण्डवातो यथा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
दिशः सम्प्लावयन् सर्वाः शरवर्षैः समन्ततः ॥ ७ ॥
समभ्यधावद् गाङ्गेयं भैरवास्त्रो धनंजयः ।
भयंकर अस्त्रवाले अर्जुनने प्रचण्ड आँधी, बिजली तथा गर्जनासे युक्त मेघके समान सम्पूर्ण दिशाओंको अपनी बाणवर्षासे आप्लावित करते हुए गंगानन्दन भीष्मपर सब ओरसे धावा किया।। ७ १/२ ।।
दिशं प्राचीं प्रतीचीं च न जानीमोऽस्त्रमोहिताः ।। ८ ।। कांदिग्भूताः श्रान्तपत्रा हताश्वा हतचेतसः । अन्योन्यमभिसंश्लिष्य योधास्ते भरतर्षभ ।। ९ ।। भीष्ममेवाभ्यलीयन्त सह सर्वैस्तवात्मजैः । तेषामार्तायनमभूद् भीष्मः शान्तनवो रणे ।। १० ।।
उस समय हमलोग उनके अस्त्रोंसे इतने मोहित हो गये थे कि हमें पूर्व और पश्चिमका भी पता नहीं चलता था। भरतश्रेष्ठ! आपके सभी योद्धा घबराकर यह सोचने लगे कि हम किस दिशामें जायँ। उनके सारे वाहन थक गये थे। कितनोंके घोड़े मार डाले गये थे। उन सबका हार्दिक उत्साह नष्ट हो गया था। वे सब-के-सब एक-दूसरेसे सटकर आपके पुत्रोंके साथ भीष्मजीकी ही शरणमें छिपने लगे। उस युद्धस्थलमें उन्हें केवल शान्तनुनन्दन भीष्म ही आर्त सैनिकोंको शरण देनेवाले प्रतीत हुए ।। ८—१० ।।
समुत्पतन्ति वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तथा । सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातयः ।। ११ ।।
वे सभी लोग ऐसे भयभीत हो गये कि रथी रथोंसे और घुड़सवार घोड़ोंकी पीठोंसे गिरने लगे तथा पैदल सैनिक भी पृथ्वीपर लोट-पोट हो गये ।। ११ ।।
श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । सर्वसैन्यानि भीतानि व्यवालीयन्त भारत ।। १२ ।।
भारत! बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीवका गम्भीर घोष सुनकर हमारे समस्त सैनिक भयभीत हो लुकने-छिपने लगे ।। १२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1928)
गोपानां बहुसाहस्रैर्बलैर्गोपायनैर्वृतः ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् काम्बोजराज सुदक्षिण काम्बोजदेशीय विशाल एवं शीघ्रगामी घोड़ोंपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले। उनके साथ गोपायन नामवाले कई हजार गोप-सैनिक थे ॥ १३ ॥ मद्रसौवीरगान्धारैस्त्रैगर्तैश्च विशाम्पते । सर्वकालिङ्गमुख्यैश्च कलिङ्गाधिपतिर्वृतः ॥ १४ ॥ प्रजानाथ! समस्त कलिङ्गदेशीय प्रमुख वीरोंसे घिरे हुए कलिंगराज भी युद्धके लिये आगे बढ़े। उनके साथ मद्र, सौवीर, गान्धार और त्रिगर्तदेशीय योद्धा भी मौजूद थे ॥ १४ ॥ नानानरगणैश्चैव दुःशासनपुरःसरः । जयद्रथश्च नृपतिः सहितः सर्वराजभिः ॥ १५ ॥ इनके सिवा राजा जयद्रथ सम्पूर्ण राजाओंको साथ ले दुःशासनको आगे करके चला। उसके साथ भी अनेक जनपदोंके लोगोंकी पैदल सेना मौजूद थी ॥ १५ ॥ हयारोहवराश्चैव तव पुत्रेण चोदिताः । चतुर्दश सहस्राणि सौबलं पर्यवारयन् ॥ १६ ॥ इसके सिवा आपके पुत्रकी आज्ञासे चौदह हजार अच्छे घुड़सवार सुबलपुत्र शकुनिको घेरकर खड़े हुए ॥ ततस्ते सहिताः सर्वे विभक्तरथवाहनाः । अर्जुनं समरे जघ्नुस्तावका भरतर्षभ ॥ १७ ॥ भरतश्रेष्ठ! फिर पृथक्-पृथक् रथ और वाहन लिये आपके पक्षके ये सब महारथी वीर समरांगणमें अर्जुनपर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करने लगे ॥ १७ ॥ (चेदिकाशिपदातैश्च रथैः पाञ्चालसृंजयैः । सहिताः पाण्डवाः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥ तावकान् समरे जघ्नुर्धर्मपुत्रेण चोदिताः ।) इधर चेदि और काशिदेशके पैदलसैनिकोंके तथा पांचाल और सृंजयदेशके रथियोंसहित धृष्टद्युम्न आदि समस्त पाण्डववीर धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञासे समरभूमिमें आपके सैनिकोंका संहार करने लगे। रथिभिर्वारणैश्चाश्वैः पादातैश्च समीरितम् । घोरमायोधनं चक्रे महाभ्रसदृशं रजः ॥ १८ ॥ रथियों, हाथियों, घोड़ों और पैदलोंके पैरोंसे उड़ी हुई धूलराशिने मेघोंकी भारी घटाके समान आकाशमें व्याप्त होकर उस युद्धको भयंकर बना दिया ॥ १८ ॥ तोमरप्रासनाराचगजाश्वरथयोधिनाम् । बलेन महता भीष्मः समसज्जत् किरीटिना ॥ १९ ॥
भीष्म तोमर, नाराच और प्रास आदि धारण करनेवाले हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथारोही योद्धाओंकी विशाल वाहिनीके साथ किरीटधारी अर्जुनसे भिड़ गये ॥
आवन्त्यः काशिराजेन भीमसेनेन सैन्धवः ।
अजातशत्रुर्मद्राणामृषभेण यशस्विना ॥ २० ॥
सहपुत्रः सहामात्यः शल्येन समसज्जत ।
फिर, अवन्तीनरेश काशिराजके साथ, सिन्धुराज जयद्रथ भीमसेनके साथ तथा पुत्रों और मन्त्रियोंसहित अजातशत्रु राजा युधिष्ठिर यशस्वी मद्रराज शल्यके साथ युद्ध करने लगे ॥ २० १/२ ॥
विकर्णः सहदेवेन चित्रसेनः शिखण्डिना ॥ २१ ॥
मत्स्या दुर्योधनं जग्मुः शकुनिं च विशाम्पते ।
द्रुपदश्चेकितानश्च सात्यकिश्च महारथः ॥ २२ ॥
द्रोणेन समसज्जन्त सपुत्रेण महात्मना ।
प्रजानाथ! विकर्ण सहदेवके साथ और चित्रसेन शिखण्डीके साथ भिड़ गये। मत्स्यदेशीय योद्धाओंने दुर्योधन और शकुनिका सामना किया। द्रुपद, चेकितान और महारथी सात्यकि—ये अश्वत्थामासहित महामना द्रोणसे भिड़ गये ॥ २१-२२ १/२ ॥
कृपश्च कृतवर्मा च धृष्टद्युम्नमभिद्रुतौ ॥ २३ ॥
एवं प्रव्रजिताश्वानि भ्रान्तनागरथानि च ।
सैन्यानि समसज्जन्त प्रयुद्धानि समन्ततः ॥ २४ ॥
कृपाचार्य और कृतवर्मा—इन दोनोंने धृष्टद्युम्नपर धावा किया। इस प्रकार अपने-अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाकर तथा हाथी एवं रथोंको घुमाकर समस्त सैनिक सब ओर युद्ध करने लगे ॥ २३-२४ ॥
निरभ्रे विद्युतस्तीव्रा दिशश्च रजसाऽऽवृताः ।
प्रादुरासन् महोल्काश्च सनिर्घाता विशाम्पते ॥ २५ ॥
प्रजानाथ! बिना बादलके ही दुःसह बिजलियाँ चमकने लगीं, सम्पूर्ण दिशाएँ धूलसे भर गयीं और भयंकर वज्रपातकी-सी आवाजके साथ बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं ॥ २५ ॥
प्रादुर्भूतो महावातः पांसुवर्षं पपात च ।
नभस्यन्तर्दधे सूर्यः सैन्येन रजसाऽऽवृतः ॥ २६ ॥
बड़े जोरकी आँधी उठ गयी। धूलकी वर्षा होने लगी। सेनाके द्वारा उड़ायी हुई धूलसे आकाशमें सूर्यदेव छिप गये ॥ २६ ॥
प्रमोहः सर्वसत्त्वानामतीव समपद्यत ।
रजसा चाभिभूतानामस्त्रजालैश्च तुद्यताम् ॥ २७ ॥
उस समय समस्त प्राणियोंपर बड़ा भारी मोह छा गया; क्योंकि वे धूलसे तो दबे ही थे, अस्त्रोंके समुदायसे भी पीड़ित हो रहे थे ॥ २७ ॥
वीरबाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् ।
संघातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत ॥ २८ ॥
वीरोंकी भुजाओंसे छूटकर सब प्रकारके आवरणों (कवच आदि)-का भेदन करनेवाले बाणसमूहोंके भयानक आघात सब ओर हो रहे थे ॥ २८ ॥
प्रकाशं चक्रुराकाशमुद्यतानि भुजोत्तमैः ।
नक्षत्रविमलाभानि शस्त्राणि भरतर्षभ ॥ २९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उत्तम भुजाओंद्वारा ऊपर उठाये हुए नक्षत्रोंके समान निर्मल एवं चमकीले अस्त्र आकाशमें प्रकाश फैला रहे थे ॥ २९ ॥
आर्षभाणि विचित्राणि रुक्मजालावृतानि च ।
सम्पेतुर्र्दिक्षु सर्वासु चर्माणि भरतर्षभ ॥ ३० ॥
भरतभूषण! सोनेकी जालीसे ढकी और ऋषभ-चर्मकी बनी हुई विचित्र ढालें सम्पूर्ण दिशाओंमें गिर रही थीं ॥ ३० ॥
सूर्यवर्णैश्च निस्त्रिंशैः पात्यमानानि सर्वशः ।
दिक्षु सर्वासुदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ॥ ३१ ॥
सूर्यके समान चमकीले खड्गोंसे सब ओर काटकर गिराये जानेवाले शरीर और मस्तक सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३१ ॥
भग्नचक्राक्षनीडाश्च निपातितमहाध्वजाः ।
हताश्वाः पृथिवीं जग्मुस्तत्र तत्र महारथाः ॥ ३२ ॥
कितने ही महारथियोंके रथोंके पहिये, धुरे और भीतरकी बैठकें टूट-फूटकर नष्ट हो गयीं, बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ खण्डित होकर गिर गयीं, घोड़े मार दिये गये और वे महारथी स्वयं भी मारे जाकर धरतीपर जहाँ-तहाँ गिर पड़े ॥ ३२ ॥
परिपेतुर्र्हयाश्चात्र केचिच्छस्त्रकृतव्रणाः ।
रथान् विपरिकर्षन्तो हतेषु रथयोधिषु ॥ ३३ ॥
उस युद्धस्थलमें कितने ही घोड़े अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे घायल होकर अपने रथियोंके मारे जानेके बाद भी रथ खींचते हुए भागते और गिर पड़ते थे ॥ ३३ ॥
शराहता भिन्नदेहा बद्धयोक्त्रा हयोत्तमाः ।
युगानि पर्यकर्षन्त तत्र तत्र स्म भारत ॥ ३४ ॥
भारत! कितने ही उत्तम घोड़ोंके शरीर बाणोंसे आहत होकर क्षत-विक्षत हो गये थे, तो भी रथके साथ रस्सीमें बँधे हुए थे, इसलिये रथके जूओंको इधर-उधर खींचते रहते थे ॥ ३४ ॥
अदृश्यन्त ससूताश्व साश्वाः सरथयोधिनः ।
एकेन बलिना राजन् वारणेन विमर्दिताः ॥ ३५ ॥
राजन्! कितने ही रथारोही युद्धस्थलमें एक ही महाबली गजराजके द्वारा घोड़ों और सारथियोंसहित कुचले हुए दिखायी पड़ते थे ॥ ३५ ॥
गन्धहस्तिमदस्रावमाघ्राय बहवो रणे ।
संनिपाते बलौघानां वीतमददिरे गजाः ॥ ३६ ॥
समस्त सेनाओंमें भीषण मार-काट मची हुई थी और बहुत-से हाथी गन्धयुक्त गजराजके मदकी गन्ध सूँघकर उसीके भ्रमसे निर्बल हाथीको भी मार गिरानेके लिये पकड़ लेते थे ॥ ३६ ॥
सतोमरैर्महामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः ।
बभूवायोधनं छन्नं नाराचाभिहतैर्गजैः ॥ ३७ ॥
तोमरोंसहित प्राणशून्य होकर गिरे हुए महावतों और नाराचोंकी मारसे मरकर गिरनेवाले हाथियोंसे वह रणभूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ ३७ ॥
संनिपाते बलौघानां प्रेषितैर्वरवारणैः ।
निपेतुर्र्युधि सम्भग्नाः सयोधाः सध्वजा गजाः ॥ ३८ ॥
सैन्यसमूहोंके उस भीषण संघर्षमें आगे बढ़ाये हुए बड़े-बड़े हाथियोंसे टकराकर युद्धमें कितने ही छोटे-छोटे हाथी अंग-भंग हो जानेके कारण सवारों और ध्वजोंसहित गिर जाते थे ॥ ३८ ॥
नागराजोपमैर्हस्तैर्नगैरैराक्षिप्य संयुगे ।
व्यदृश्यन्त महाराज सम्भग्ना रथकूबराः ॥ ३९ ॥
महाराज! उस युद्धमें कितने ही हाथियोंके द्वारा विशाल सर्पराजके समान सूँड़ोंसे खींचकर फेंके हुए रथोंके ध्वज और कूबर चूर-चूर होकर गिरते देखे जाते थे ॥ ३९ ॥
विशीर्णरथसंघाश्च केशेष्वाक्षिप्य दन्तिभिः ।
द्रुमशाखा इवाविध्य निष्पिष्टा रथिनो रणे ॥ ४० ॥
कितने ही दन्तार हाथी रथसमूहोंको तोड़-फोड़कर उनमें बैठे हुए रथियोंको उनके केश पकड़कर खींच लेते और वृक्षकी शाखाकी भाँति उन्हें घुमाकर धरतीपर दे मारते थे। इस प्रकार उस युद्धमें उन रथियोंकी धज्जियाँ उड़ जाती थीं ॥ ४० ॥
रथेषु च रथान् युद्धे संसक्तान् वरवारणाः ।
विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशब्दगाः ॥ ४१ ॥
कितने ही बड़े-बड़े गजराज रथसमूहोंमें घुसकर युद्धमें उलझे हुए रथोंको पकड़ लेते और सब प्रकारके शब्दोंका अनुसरण करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें उन रथोंको खींचे फिरते थे ॥ ४१ ॥
तेषां तथा कर्षतां तु गजानां रूपमाबभौ ।
सरःसु नलिनीजालं विषक्तमिव कर्षताम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार रथोंसे रथियोंको खींचनेवाले उन हाथियोंका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो वे तालाबमें वहाँ उगे हुए कमलोंका समूह खींच रहे हों ।।
एवं संछादितं तत्र बभूवायोधनं महत् ।
सादिभिश्च पदातैश्च सध्वजैश्च महारथैः ॥ ४३ ॥
इस तरह सवारों, पैदलों और ध्वजोंसहित महारथियोंके शरीरोंसे वह विशाल युद्धस्थल पट गया था ।। ४३ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४४ १/३ श्लोक हैं।]
अध्याय (पृष्ठ 1934)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध
संजय उवाच
शिखण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशाम्पते ।
भीष्ममाशु महेष्वासमाससाद सुदुर्जयम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! मत्स्यनरेश विराटके साथ मिलकर शिखण्डीने अत्यन्त दुर्जय महाधनुर्धर भीष्मपर शीघ्रतापूर्वक चढ़ाई की ॥ १ ॥
द्रोणं कृपं विकर्णं च महेष्वासं महाबलम् ।
राज्ञश्चान्यान् रणे शूरान् बहूनाच्छर्द धनंजयः ॥ २ ॥
उस समय अर्जुनने उस रणभूमिमें महाधनुर्धर एवं महाबली द्रोण, कृपाचार्य, विकर्ण तथा अन्यान्य बहुत-से शूरवीर नरेशोंको अपने बाणोंद्वारा पीड़ा पहुँचायी ॥ २ ॥
सैन्धवं च महेष्वासं सामात्यं सह बन्धुभिः ।
प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च भूमिपान् भूमिपर्षभ ॥ ३ ॥
पुत्रं च ते महेष्वासं दुर्योधनममर्षणम् ।
दुःसहं चैव समरे भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ४ ॥
नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार मन्त्री और बन्धुओंसहित महाधनुर्धर सिंधुराज जयद्रथपर, पूर्व और दक्षिणके भूमिपालोंपर तथा आपके अमर्षशील पुत्र महाधनुर्धर दुर्योधन एवं दुःसहपर भीमसेनने आक्रमण किया ॥
सहदेवस्तु शकुनिमुल्लूकं च महारथम् ।
पितापुत्रौ महेष्वासावभ्यवर्तत दुर्जयौ ॥ ५ ॥
सहदेवने शकुनि और महारथी उलूक—इन दोनों दुर्जय महाधनुर्धर पिता-पुत्रोंपर धावा किया ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरो महाराज गजानीकं महारथः ।
समवर्तत संग्रामे पुत्रेण निकृतस्तव ॥ ६ ॥
महाराज! आपके पुत्रद्वारा ठगे गये महारथी राजा युधिष्ठिरने संग्राममें गजसेनापर आक्रमण किया ॥ ६ ॥
माद्रीपुत्रस्तु नकुलः शूरसंक्रन्दनो युधि ।
त्रिगर्तानां बलैः सार्धं समसज्जत पाण्डवः ॥ ७ ॥
माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल युद्धमें बड़े-बड़े शूरवीरोंको रुलानेवाले थे। उन्होंने त्रिगर्तोंकी सेनाके साथ युद्ध ठाना ॥ ७ ॥
अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धाः समरे शाल्वकेकयान् ।
सात्यकिश्चेकितनश्च सौभद्रश्च महारथः ॥ ८ ॥
सात्यकि, चेकितान और महारथी अभिमन्युने समरभूमिमें कुपित होकर शाल्वों तथा केकयोंपर धावा किया ॥ ८ ॥
धृष्टकेतुश्च समरे राक्षसश्च घटोत्कचः ।
(नाकुलिश्च शतानीकः समरे रथपुङ्गवः ।)
पुत्राणां ते रथानीकं प्रत्युद्याताः सुदुर्जयाः ॥ ९ ॥
धृष्टकेतु, राक्षस घटोत्कच और नकुलपुत्र श्रेष्ठ रथी शतानीक—इन अत्यन्त दुर्जय वीरोंने समरांगणमें आपकी रथसेनापर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
सेनापतिरमेयात्मा धृष्टद्युम्नो महाबलः ।
द्रोणेन समरे राजन् समियायोग्रकर्मणा ॥ १० ॥
राजन्! अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डव-सेनापति महाबली धृष्टद्युम्नने संग्रामभूमिमें भयंकर कर्म करनेवाले द्रोणाचार्यसे लोहा लिया ॥ १० ॥
एवमेते महेष्वासास्तावकाः पाण्डवैः सह ।
समेत्य समरे शूराः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ११ ॥
इस प्रकार ये आपके महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा पाण्डवोंके साथ समरभूमिमें युद्ध करने लगे ॥ ११ ॥
मध्यन्दिनगते सूर्ये नभस्याकुलतां गते ।
कुरवः पाण्डवेयाश्च निजघ्नुरितरेतरम् ॥ १२ ॥
सूर्यदेव दिनके मध्यभागमें आ गये। आकाश तपने लगा। परंतु उस समय भी कौरव तथा पाण्डव एक-दूसरेको मार रहे थे ॥ १२ ॥
ध्वजिनो हेमचित्राङ्गा विचरन्तो रणाजिरे ।
सपताका रथा रेजुर्वैयाघ्रपरिवारणाः ॥ १३ ॥
समेतानां च समरे जिगीषूणां परस्परम् ।
बभूव तुमुलः शब्दः सिंहानामिव नर्दताम् ॥ १४ ॥
जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनका एक-एक अवयव सुवर्णभूषित हो विचित्र शोभा धारण करता था तथा जिनपर व्याघ्रके चर्मका आवरण पड़ा हुआ था, ऐसे अनेक रथ उस समरांगणमें विचरते हुए शोभा पा रहे थे। समरमें एक-दूसरेसे भिड़कर परस्पर विजय पानेकी इच्छावाले शूरवीर सिंहके समान गर्जना कर रहे थे और उनका वह तुमुल नाद सब ओर गूँज रहा था ॥ १३-१४ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम सम्प्रहारं सुदारुणम् ।
यदकुर्वन् रणे शूराः सृंजयाः कुरुभिः सह ॥ १५ ॥
नैव खं न दिशो राजन् न सूर्य शत्रुतापन ।
विदिशो वापि पश्यामः शरैर्मुक्तेः समन्ततः ॥ १६ ॥
राजन्! हमने वहाँ अत्यन्त भयंकर और अद्भुत संग्राम देखा, जिसे रणवीर सृञ्जयोंने कौरवोंके साथ किया था। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! वहाँ चारों ओर इतने बाण छोड़े गये थे कि उनसे आच्छादित हो जानेके कारण हम आकाश, सूर्य, दिशा तथा विदिशाओंको भी नहीं देख पाते थे ॥ १५-१६ ॥
शक्तीनां विमलाग्राणां तोमराणां तथास्यताम् ।
निस्त्रिंशानां च पीतानां नीलोत्पलनिभाः प्रभाः ॥ १७ ॥
चमकती हुई धारवाली शक्तियाँ, चलाये जाते हुए तोमरों और पानीदार तलवारोंकी प्रभा नील कमलके समान सुशोभित हो रही थीं ॥ १७ ॥
कवचानां विचित्राणां भूषणानां प्रभास्तथा ।
खं दिशः प्रदिशश्चैव भासयामासुरोजसा ॥ १८ ॥
वे तथा विचित्र कवचों और आभूषणोंके प्रभा-समूह आकाश, दिशा एवं कोणोंको अपने तेजसे प्रकाशित कर रहे थे ॥ १८ ॥
वपुर्भिश्च नरेन्द्राणां चन्द्रसूर्यसमप्रभैः ।
विरराज तदा राजंस्तत्र तत्र रणाङ्गणम् ॥ १९ ॥
राजन्! चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले राजाओंके शरीरोंसे वह समरांगण यत्र-तत्र सर्वत्र शोभा पा रहा था ॥ १९ ॥
रथसङ्घा नरव्याघ्राः समायान्तश्च संयुगे ।
विरेजुः समरे राजन् ग्रहा इव नभस्तले ॥ २० ॥
राजन्! रथोंके समूह और नरश्रेष्ठ नरेशगण युद्धमें आते हुए उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, जैसे आकाशमें ग्रह-नक्षत्र सुशोभित होते हैं ॥ २० ॥
भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो भीमसेनं महाबलम् ।
अवारयत संक्रुद्धः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ २१ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने कुपित होकर सब सेनाओंके देखते-देखते महाबली भीमसेनको रोक दिया ॥ २१ ॥
ततो भीष्मविनिर्मुक्ता रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।
अभ्यघ्नन् समरे भीमं तैलधौताः सुतेजनाः ॥ २२ ॥
उस समय पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए, सुवर्णमय पंखसे युक्त और तेलके धोये तीखे बाण भीष्मके हाथोंसे छूटकर समरभूमिमें भीमसेनको चोट पहुँचाने लगे ॥ २२ ॥
तस्य शक्तिं महावेगां भीमसेनो महाबलः ।
क्रुद्धाशीविषसंकाशां प्रेषयामास भारत ॥ २३ ॥
भारत! तब महाबली भीमसेनने क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर महावेगशालिनी शक्ति भीष्मपर छोड़ी ॥ २३ ॥
तामापतन्तीं सहसा रुक्मदण्डां दुरासदाम् ।
चिच्छेद समरे भीष्मः शरैः संनतपर्वभिः ॥ २४ ॥ उसमें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उसको सह लेना बहुत ही कठिन था। उसे सहसा आते देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युद्धभूमिमें काट गिराया॥ ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । कार्मुकं भीमसेनस्य द्विधा चिच्छेद भारत ॥ २५ ॥ भरतनन्दन! तदनन्तर एक तीखे और पानीदार भल्लसे उन्होंने भीमसेनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये॥ (अपस्य तु धनुश्छिन्नं भीमसेनो महाबलः । शरैर्बहुभिरानर्च्छद् भीष्मं शान्तनवं युधि ।) महाबली भीमसेनने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष ले बहुत-से बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शान्तनुनन्दन भीष्मको अत्यन्त पीड़ा दी। सात्यकिस्तु ततस्तूर्णं भीष्ममासाद्य संयुगे । आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः ॥ २६ ॥ शरैर्बहुभिरानर्च्छत् पितरं ते जनेश्वर । जनेश्वर! तत्पश्चात् उस युद्धमें सात्यकिने शीघ्र ही आपके ताऊ भीष्मके पास पहुँचकर धनुषको कानोंतक खींचकर चलाये हुए बहुत-से तीखे एवं तेज सायकोंद्वारा उन्हें बहुत पीड़ा दी॥ २६ १/२ ॥ ततः संधाय वै तीक्ष्णं शरं परमदारुणम् ॥ २७ ॥ वार्ष्णेयस्य रथाद् भीष्मः पातयामास सारथिम् । तब भीष्मने अत्यन्त भयंकर तीक्ष्ण बाणका संधान करके सात्यकिके रथसे उनके सारथिको मार गिराया॥ तस्याश्वाः प्रद्रुता राजन् निहते रथसारथौ ॥ २८ ॥ राजन्! रथ-सारथिके मारे जानेपर सात्यकिके घोड़े वहाँसे भाग चले॥ २८ ॥ तेन तेनैव धावन्ति मनोमारुतरंहसः । ततः सर्वस्य सैन्यस्य निस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ २९ ॥ मन और वायुके समान वेगवाले वे घोड़े जिधर राह मिली, उधर ही दौड़ने लगे। इससे सारी सेनामें कोलाहल मच गया॥ २९ ॥ हाहाकारश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् । अभ्यद्रवत गृह्णीत हयान् यच्छत धावत ॥ ३० ॥ इत्यासीत् तुमुलः शब्दो युयुधानरथं प्रति । महात्मा पाण्डवोंके दलमें हाहाकार होने लगा। अरे! दौड़ो, पकड़ो, घोड़ोंको रोको, भागो। सात्यकिके रथकी ओर इस तरहका शब्द गूँजने लगा॥ ३० १/२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ३१ ॥
न्यहनत् पाण्डवीं सेनामासुरीमिव वृत्रहा । इसी बीचमें शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डव-सेनाका उसी प्रकार विनाश आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र आसुरीसेनाका संहार करते हैं ॥ ३१ १/२ ॥ ते वध्यमाना भीष्मेण पञ्चालाः सोमकैः सह ॥ ३२ ॥ स्थिरां युद्धे मतिं कृत्वा भीष्ममेवाभिदुद्रुवुः । भीष्मके द्वारा पीड़ित हुए पांचाल और सोमक युद्धका दृढ़ निश्चय लेकर भीष्मकी ही ओर दौड़े ।। धृष्टद्युम्नमुखाश्चापि पार्थाः शान्तनवं रणे ॥ ३३ ॥ अभ्यधावञ्जिगीषन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् । धृष्टद्युम्न आदि समस्त पाण्डव योद्धा आपके पुत्रकी सेनाको जीतनेकी इच्छासे युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मपर ही चढ़ आये ॥ ३३ १/२ ॥ तथैव कौरवा राजन् भीष्मद्रोणपुरोगमाः ॥ ३४ ॥ अभ्यधावन्त वेगेन ततो युद्धमवर्तत ॥ ३५ ॥ राजन्! इसी प्रकार भीष्म, द्रोण आदि कौरव योद्धा भी बड़े वेगसे पाण्डव-सेनापर टूट पड़े; फिर तो दोनों दलोंमें भयंकर युद्ध होने लगा ।। ३४-३५ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चमदिवसयुद्धे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें पाँचवें दिनके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७२ ।। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३६ १/२ श्लोक हैं।]
अध्याय (पृष्ठ 1939)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध
संजय उवाच
विराटोऽथ त्रिभिर्बाणैर्भीष्ममार्च्छन्महारथम् ।
विव्याध तुरगांश्चास्य त्रिभिर्बाणैर्महारथः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! महारथी राजा विराटने तीन बाण मारकर महारथी भीष्मको पीड़ित किया और तीन ही बाणोंसे उनके घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ १ ॥
तं प्रत्यविध्यद् दशभिर्भीष्मः शान्तनवः शरैः ।
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः कृतहस्तो महाबलः ॥ २ ॥
तब महाधनुर्धर महाबली तथा शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने सोनेके पंखवाले दस बाण मारकर विराटको भी घायल कर दिया ॥ २ ॥
द्रौणिर्गाण्डीवधन्वानं भीमधन्वा महारथः ।
अविध्यदिषुभिः षड्भिर्दृढहस्तः स्तनान्तरे ॥ ३ ॥
भयंकर धनुष धारण करनेवाले महारथी अश्वत्थामाने अपने हाथकी दृढ़ताका परिचय देते हुए गाण्डीवधारी अर्जुनकी छातीमें छः बाणोंसे प्रहार किया ॥ ३ ॥
कार्मुकं तस्य चिच्छेद फाल्गुनः परवीरहा ।
अविध्यच्च भृशं तीक्ष्णैः पत्रिभिः शत्रुकर्शनः ॥ ४ ॥
तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले शत्रुसूदन अर्जुनने अश्वत्थामाका धनुष काट दिया और उसे तीन तीखे बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ४ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय वेगवान् क्रोधमूर्च्छितः ।
अमृष्यमाणः पार्थेन कार्मुकच्छेदमाहवे ॥ ५ ॥
अविध्यत् फाल्गुनं राजन् नवत्या निशितैः शरैः ।
वासुदेवं च सप्तत्या विव्याध परमेषुभिः ॥ ६ ॥
राजन्! युद्धमें अर्जुनके द्वारा अपने धनुषका काटा जाना अश्वत्थामाको सहन नहीं हुआ। उस वेगशाली वीरने क्रोधसे मूर्च्छित होकर तुरंत ही दूसरा धनुष ले नब्बे पैने बाणोंद्वारा अर्जुनको और सत्तर श्रेष्ठ सायकोंद्वारा श्रीकृष्णको घायल कर दिया ॥ ५-६ ॥
ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कृष्णेन सह फाल्गुनः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥ ७ ॥
धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ।
गाण्डीवधन्वा संक्रुद्धः शितान् संनतपर्वणः ॥ ८ ॥
जीवितान्तकरान् घोरान् समादत्त शिलीमुखान् ।
तैस्तूर्णं समरेऽविध्यद् द्रौणिं बलवतां वरः ॥ ९ ॥
तब श्रीकृष्णसहित अर्जुनने क्रोधसे लाल आँखें करके बारंबार गरम-गरम लंबी साँस खींचकर सोच-विचार करनेके पश्चात् धनुषको बायें हाथसे दबाया। फिर उन शत्रुसूदन गाण्डीवधारी पार्थने कुपित हो झुकी हुई गाँठवाले कुछ भयंकर बाण हाथमें लिये, जो जीवनका अन्त कर देनेवाले थे। बलवानोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उन बाणोंद्वारा तुरंत ही समरांगणमें अश्वत्थामाको घायल किया ॥ ७—९ ॥
तस्य ते कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ।
न विव्यथे च निर्भिन्नो द्रौणिर्गाण्डीवधन्वना ॥ १० ॥
वे बाण उसका कवच फाड़कर उस युद्धस्थलसे उसके शरीरका रक्त पीने लगे, किंतु गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा विदीर्ण किये जानेपर भी अश्वत्थामा व्यथित नहीं हुआ ॥ १० ॥
तथैव च शरान् द्रौणिः प्रविमुञ्चन्नविह्वलः ।
तस्थौ स समरे राजंस्त्रातुमिच्छन् महाव्रतम् ॥ ११ ॥
राजन्! द्रोणकुमार तनिक भी विह्वल हुए बिना ही पूर्ववत् समरभूमिमें बाणोंकी वर्षा करता रहा और अपने महान् व्रतकी रक्षाकी इच्छासे समरांगणमें डटा रहा ॥ ११ ॥
तस्य तत् सुमहत् कर्म शशंसुः कुरुसत्तमाः ।
यत् कृष्णाभ्यां समेताभ्यामभ्यापतत संयुगे ॥ १२ ॥
अश्वत्थामा युद्धभूमिमें जो श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंका सामना करता रहा, उसके इस महान् कर्मकी श्रेष्ठ कौरवोंने बड़ी प्रशंसा की ॥ १२ ॥
(तथार्जुनोऽपि संहृष्ट अश्वत्थामानमाहवे ।
शशंस सर्वभूतानां शृण्वतामपि भारत ॥)
भारत! अर्जुनने भी अत्यन्त हर्षमें भरकर रण-भूमिमें सम्पूर्ण भूतोंके सुनते हुए अश्वत्थामाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
स हि नित्यमनीकेषु युध्यतेऽभयमास्थितः ।
अस्त्रग्रामं ससंहारं द्रोणात् प्राप्य सुदुर्लभम् ॥ १३ ॥
वह द्रोणाचार्यसे उपसंहारसहित सुदुर्लभ अस्त्र-समुदायकी शिक्षा पाकर निर्भय हो सदा ही पाण्डव-सैनिकोंके साथ युद्ध करता था ॥ १३ ॥
ममैष आचार्यसुतो द्रोणस्यापि प्रियः सुतः ।
ब्राह्मणश्च विशेषेण माननीयो ममेति च ॥ १४ ॥
समास्थाय मतिं वीरो बीभत्सुः शत्रुतापनः ।
कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति ॥ १५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे आचार्यका पुत्र है, द्रोणका लाड़ला बेटा है तथा ब्राह्मण होनेके कारण भी विशेषरूपसे मेरे लिये माननीय है; आचार्यपुत्रपर कृपा की ॥ १४-१५ ॥ द्रौणिं त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेयः श्वेतवाहनः । युयुधे तावकान् निघ्नंस्त्वरमाणः पराक्रमी ॥ १६ ॥ तदनन्तर श्वेत घोड़ोंवाले कुन्तीकुमार पराक्रमी अर्जुनने अश्वत्थामाको वहीं युद्धस्थलमें छोड़कर बड़ी उतावलीके साथ आपके दूसरे सैनिकोंका संहार करते हुए उनके साथ युद्ध आरम्भ किया ॥ १६ ॥ दुर्योधनस्तु दशभिर्गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । भीमसेनं महेष्वासं रुक्मपुङ्खैः समर्पयत् ॥ १७ ॥ दुर्योधनने शान चढ़ाकर तेज किये हुए गृध्र-पंखयुक्त अथवा सुवर्णमय पंखवाले दस बाण मारकर महाधनुर्धर भीमसेनको बड़ी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥ भीमसेनः सुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् । चित्रं कार्मुकमादत्त शरांश्च निशितान् दश ॥ १८ ॥ आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । अविध्यत् तूर्णमव्यग्रः कुरुराजं महोरसि ॥ १९ ॥ इससे भीमसेन अत्यन्त क्रोधसे जल उठे। उन्होंने एक विचित्र धनुष हाथमें लिया, जो अत्यन्त सुदृढ़ और शत्रुओंके प्राण लेनेमें समर्थ था। उसके ऊपर उन्होंने दस तीखे बाण रखे; फिर धनुषको कानतक खींचकर वे बाण छोड़ दिये। उन सीधे जानेवाले वेगवान् एवं तीक्ष्ण बाणोंद्वारा भीमने बिना किसी व्यग्रताके तुरंत ही कुरुराज दुर्योधनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ तस्य काञ्चनसूत्रस्थः शरैः संछादितो मणिः । रराजोरसि खे सूर्यो ग्रहैरिव समावृतः ॥ २० ॥ दुर्योधनकी छातीपर एक मणि शोभा पाती थी, जो सुवर्णमय सूत्रमें पिरोयी हुई थी। वह भीमसेनके बाणोंसे आच्छादित होकर वैसे ही शोभा पाने लगी, जैसे आकाशमें ग्रहोंसे घिरे हुये सूर्य सुशोभित होते हैं ॥ २० ॥ पुत्रस्तु तव तेजस्वी भीमसेनेन ताडितः । नामृष्यत यथा नागस्तलशब्दं मदोत्कटः ॥ २१ ॥ भीमसेनके बाणोंसे पीड़ित होकर आपका तेजस्वी पुत्र उनके द्वारा किये गये आघातको उसी प्रकार नहीं सह सका, जैसे मतवाला हाथी तालीकी आवाज नहीं सहन करता है ॥ २१ ॥