महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1937, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिच्छेद समरे भीष्मः शरैः संनतपर्वभिः ॥ २४ ॥ उसमें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उसको सह लेना बहुत ही कठिन था। उसे सहसा आते देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युद्धभूमिमें काट गिराया॥ ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । कार्मुकं भीमसेनस्य द्विधा चिच्छेद भारत ॥ २५ ॥ भरतनन्दन! तदनन्तर एक तीखे और पानीदार भल्लसे उन्होंने भीमसेनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये॥ (अपस्य तु धनुश्छिन्नं भीमसेनो महाबलः । शरैर्बहुभिरानर्च्छद् भीष्मं शान्तनवं युधि ।) महाबली भीमसेनने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष ले बहुत-से बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शान्तनुनन्दन भीष्मको अत्यन्त पीड़ा दी। सात्यकिस्तु ततस्तूर्णं भीष्ममासाद्य संयुगे । आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः ॥ २६ ॥ शरैर्बहुभिरानर्च्छत् पितरं ते जनेश्वर । जनेश्वर! तत्पश्चात् उस युद्धमें सात्यकिने शीघ्र ही आपके ताऊ भीष्मके पास पहुँचकर धनुषको कानोंतक खींचकर चलाये हुए बहुत-से तीखे एवं तेज सायकोंद्वारा उन्हें बहुत पीड़ा दी॥ २६ १/२ ॥ ततः संधाय वै तीक्ष्णं शरं परमदारुणम् ॥ २७ ॥ वार्ष्णेयस्य रथाद् भीष्मः पातयामास सारथिम् । तब भीष्मने अत्यन्त भयंकर तीक्ष्ण बाणका संधान करके सात्यकिके रथसे उनके सारथिको मार गिराया॥ तस्याश्वाः प्रद्रुता राजन् निहते रथसारथौ ॥ २८ ॥ राजन्! रथ-सारथिके मारे जानेपर सात्यकिके घोड़े वहाँसे भाग चले॥ २८ ॥ तेन तेनैव धावन्ति मनोमारुतरंहसः । ततः सर्वस्य सैन्यस्य निस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ २९ ॥ मन और वायुके समान वेगवाले वे घोड़े जिधर राह मिली, उधर ही दौड़ने लगे। इससे सारी सेनामें कोलाहल मच गया॥ २९ ॥ हाहाकारश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् । अभ्यद्रवत गृह्णीत हयान् यच्छत धावत ॥ ३० ॥ इत्यासीत् तुमुलः शब्दो युयुधानरथं प्रति । महात्मा पाण्डवोंके दलमें हाहाकार होने लगा। अरे! दौड़ो, पकड़ो, घोड़ोंको रोको, भागो। सात्यकिके रथकी ओर इस तरहका शब्द गूँजने लगा॥ ३० १/२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ३१ ॥