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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

१०४-

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चतुरधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा त्रिगतोंकी पराजय, कौरव-पाण्डव-सैनिकोंका घोर युद्ध, अभिमन्युसे चित्रसेनकी, द्रोणसे द्रुपदकी और भीमसेनसे बाह्लीककी पराजय तथा सात्यकि और भीष्मका युद्ध

संजय उवाच

अर्जुनस्तान् नरव्याघ्रः सुशर्मानुचरान् नृपान् । अनयत् प्रेतराजस्य सदनं सायकैः शितैः ॥ १ ॥ संजय कहते हैं— राजन्! पुरुषसिंह अर्जुन अपने तीखे बाणोंसे सुशर्माके अनुगामी नरेशोंको यमलोक भेजने लगे ॥ १ ॥

सुशर्मापि ततो बाणैः पार्थं विव्याध संयुगे । वासुदेवं च सप्तत्या पार्थं च नवभिः पुनः ॥ २ ॥ तब सुशर्माने भी युद्धस्थलमें अनेक बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको घायल कर दिया। फिर उसने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सत्तर और अर्जुनको नौ बाण मारे ॥

तं निवार्य शरौघेण शक्रसूनुर्महारथः । सुशर्मणो रणे योध्दान् प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ३ ॥ यह देख इन्द्रपुत्र महारथी अर्जुनने अपने बाण-समूहोंके द्वारा सुशर्माको रोककर रणक्षेत्रमें उसके योद्धाओंको यमलोक पहुँचाना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये । व्यद्रवन्त रणे राजन् भये जाते महारथाः ॥ ४ ॥ राजन्! जैसे युगान्तमें साक्षात् कालके द्वारा सारी प्रजा मारी जाती है, उसी प्रकार रणक्षेत्रमें अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए सारे महारथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ॥ ४ ॥

उत्सृज्य तुरगान् केचिद् रथान् केचिच्च मारिष । गजानन्ये समुत्सृज्य प्राद्रवन्त दिशो दश ॥ ५ ॥ आर्य! कुछ लोग घोड़ोंको, कुछ दूसरे लोग रथोंको और इसी प्रकार कुछ लोग हाथियोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ५ ॥

अपरे तु तदाऽऽदाय वाजिनागरथान् रणे । त्वरया परया युक्ताः प्राद्रवन्त विशाम्पते ॥ ६ ॥ पादाताश्चापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे ।

निरपेक्षा व्यधावन्त तेन तेन स्म भारत ॥ ७ ॥
प्रजानाथ! दूसरे लोग उस समय बड़ी उतावलीके साथ अपने हाथी, घोड़े एवं रथको साथ ले रणभूमिसे भाग निकले। भारत! उस महायुद्धमें पैदल सिपाही भी अपने अस्त्र-शस्त्रोंको फेंककर उनकी कोई अपेक्षा न रखकर जिधरसे राह मिली, उधरसे ही भागने लगे ॥ ७ ॥

वार्यमाणाः सुबहुशस्त्रैगर्तैन सुशर्मणा ।
तथान्यैः पार्थिवश्रेष्ठैर्न व्यतिष्ठन्त संयुगे ॥ ८ ॥

यद्यपि त्रिगर्तराज सुशर्मा तथा अन्य श्रेष्ठ नरेशोंने भी बारंबार रोकनेका प्रयत्न किया, तथापि वे सैनिक युद्धमें ठहर न सके ॥ ८ ॥

तद् बलं प्रद्रुतं दृष्ट्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
पुरस्कृत्य रणे भीष्मं सर्वसैन्यपुरस्कृतः ॥ ९ ॥
सर्वोद्योगेन महता धनंजयमुपाद्रवत् ।
त्रिगर्ताधिपतेरर्थे जीवितस्य विशाम्पते ॥ १० ॥

उस सेनाको भागती देख आपके पुत्र दुर्योधनने रणभूमिमें भीष्मको आगे करके सम्पूर्ण सेनाओंके साथ महान् प्रयत्नपूर्वक धनंजयपर धावा किया। प्रजानाथ! उसके आक्रमणका उद्देश्य था त्रिगर्तराजके जीवनकी रक्षा ॥ ९-१० ॥

स एकः समरे तस्थौ किरन् बहुविधाञ्शरान् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः शेषा हि प्रद्रुता नराः ॥ ११ ॥

केवल दुर्योधन ही अपने समस्त भाइयोंके साथ नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करता हुआ समरभूमिमें खड़ा रहा। शेष सब मनुष्य भाग गये ॥ ११ ॥

तथैव पाण्डवा राजन् सर्वोद्योगेन दंशिताः ।
प्रययुः फाल्गुनार्थाय यत्र भीष्मो व्यतिष्ठत ॥ १२ ॥

राजन्! उसी प्रकार पाण्डव भी कवच बाँधकर सम्पूर्ण उद्योगके साथ अर्जुनकी रक्षाके लिये उसी स्थानपर गये, जहाँ भीष्म स्थित थे ॥ १२ ॥

ज्ञायमाना रणे वीर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः ।
हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः ॥ १३ ॥

गाण्डीवधारी अर्जुनके भयंकर पराक्रमको जाननेके कारण वे लोग उत्साहके साथ कोलाहल और सिंहनाद करते हुए सब ओरसे भीष्मपर आक्रमण करने लगे ॥ १३ ॥

ततस्तालध्वजः शूरः पाण्डवानां वरूथिनीम् ।
छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः ॥ १४ ॥

तदनन्तर तालचिह्नित ध्वजावाले शूरवीर भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युद्धमें पाण्डवसेनाको आच्छादित कर दिया ॥ १४ ॥

एकीभूतास्ततः सर्वे कुरवः सह पाण्डवैः ।

अयुध्यन्त महाराज मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ १५ ॥ महाराज! तत्पश्चात् समस्त कौरव एकत्र संगठित होकर दोपहर होते-होते पाण्डवोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥ १५ ॥ सात्यकिः कृतवर्माणं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः । अतिष्ठदाहवे शूरः किरन् बाणान् सहस्रशः ॥ १६ ॥ शूरवीर सात्यकि कृतवर्माको पाँच बाणोंसे घायल करके समरभूमिमें सहस्रों बाणोंकी वर्षा करते हुए खड़े रहे ॥ १६ ॥ तथैव द्रुपदो राजा द्रोणं विद्ध्वा शितैः शरैः । पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं चास्य पञ्चभिः ॥ १७ ॥ इसी प्रकार राजा द्रुपदने द्रोणाचार्यको तीखे बाणोंसे एक बार घायल करके सत्तर बाणोंद्वारा पुनः घायल किया और पाँच बाणोंसे उनके सारथिको भी भारी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥ भीमसेनस्तु राजानं बाह्लीकं प्रपितामहम् । विद्ध्वा नदन्महानादं शार्दूल इव कानने ॥ १८ ॥ भीमसेनने अपने प्रपितामह राजा बाह्लीकको बाणोंद्वारा घायल करके वनमें सिंहके समान बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १८ ॥ आर्जुनिश्चित्रसेनेन विद्धो बहुभिराशुगैः । अतिष्ठदाहवे शूरः किरन् बाणान् सहस्रशः ॥ १९ ॥ अर्जुनकुमार अभिमन्युको चित्रसेनने बहुत-से बाणों-द्वारा घायल कर दिया था, तो भी शूरवीर अभिमन्यु सहस्रों बाणोंकी वर्षा करता हुआ युद्धभूमिमें डटा रहा ॥ १९ ॥ चित्रसेनं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध समरे भृशम् । समागतौ तौ तु रणे महामात्रौ व्यरोचताम् ॥ २० ॥ यथा दिवि महाघोरौ राजन् बुधशनैश्चरौ । उसने तीन बाणोंसे समरांगणमें चित्रसेनको अत्यन्त घायल कर दिया। राजन्! जैसे आकाशमें दो महाघोर ग्रह बुध और शनैश्चर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार दो महान् वीर चित्रसेन और अभिमन्यु रण-भूमिमें शोभा पा रहे थे ॥ २० १/२ ॥ तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं च नवभिः शरैः ॥ २१ ॥ ननाद बलवन्नादं सौभद्रः परवीरहा । तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्रकुमार अभिमन्युने चित्रसेनके चारों घोड़ोंको मारकर नौ बाणोंसे उसके सारथिको भी नष्ट कर दिया। तत्पश्चात् बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ २१ १/२ ॥ हताश्वात् तु रथात् तूर्णं सोऽवप्लुत्य महारथः ॥ २२ ॥ आरुरोह रथं तूर्णं दुर्मुखस्य विशाम्पते ।

प्रजानाथ! घोड़ोंके मारे जानेपर महारथी चित्रसेन तुरंत ही रथसे कूद पड़े और दुर्मुखके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २२ १/२ ॥ द्रोणश्च द्रुपदं भित्त्वा शरैः संनतपर्वभिः ॥ २३ ॥ सारथिं चास्य विव्याध त्वरमाणः पराक्रमी । पराक्रमी द्रोणाचार्यने भी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे द्रुपदको घायल करके बड़ी उतावलीके साथ उनके सारथिको भी बींध डाला ॥ २३ १/२ ॥ पीड्यमानस्ततो राजा द्रुपदो वाहिनीमुखे ॥ २४ ॥ अपायाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन् । इस प्रकार युद्धके मुहानेपर द्रोणाचार्यसे पीड़ित हो राजा द्रुपद पूर्व वैरका स्मरण करते हुए शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग गये ॥ २४ १/२ ॥ भीमसेनस्तु राजानं मुहूर्तादिव बाह्लिकम् ॥ २५ ॥ व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः । भीमसेनने दो ही घड़ीमें सारी सेनाके देखते-देखते राजा बाह्लीकको घोड़े, सारथि तथा रथसे शून्य कर दिया ॥ २५ १/२ ॥ ससम्भ्रमो महाराज संशयं परमं गतः ॥ २६ ॥ अवप्लुत्य ततो वाहाद् बाह्लीकः पुरुषोत्तमः । आरुरोह रथं तूर्णं लक्ष्मणस्य महारणे ॥ २७ ॥ महाराज! नरश्रेष्ठ बाह्लीक बड़ी घबराहटमें पड़ गये। उनका जीवन अत्यन्त संशयमें पड़ गया। उस अवस्थामें वे रथसे कूदकर शीघ्र ही उस महायुद्धमें लक्ष्मणके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २६-२७ ॥ सात्यकिः कृतवर्माणं वारयित्वा महारणे । शरैर्बहुविधै राजन्नाससाद पितामहम् ॥ २८ ॥ राजन्! दूसरी ओर उस महायुद्धमें सात्यकिने कृतवर्माको रोककर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए पितामह भीष्मपर धावा किया ॥ २८ ॥ स विद्ध्वा भारतं षष्ट्या निशितैर्लोमवाहिभिः । नृत्यन्निव रथोपस्थे विधुन्वानो महद् धनुः ॥ २९ ॥ उन्होंने अपने विशाल धनुषकी टंकार फैलाते तथा रथकी बैठकमें नृत्य करते हुए-से पंखयुक्त साठ तीखे बाणोंद्वारा भरतवंशी पितामह भीष्मको घायल कर दिया ॥ २९ ॥ तस्यायसीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः । हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम् ॥ ३० ॥ पितामहने सात्यकिपर लोहेकी बनी हुई एक विशाल शक्ति चलायी, जो सुवर्णजटित, अत्यन्त वेगशालिनी तथा सर्पिणीके समान आकारवाली एवं सुन्दर थी ॥ ३० ॥ तामापतन्तीं सहसा मृत्युकल्पां सुदुर्जयाम् ।

व्यंसयामास वार्ष्णेयो लाघवेन महायशाः ॥ ३१ ॥
उस अत्यन्त दुर्जय मृत्युस्वरूपा शक्तिको सहसा आती देख महायशस्वी सात्यकिने अपनी फुर्तीके कारण उसको असफल कर दिया ॥ ३१ ॥
अनासाद्य तु वार्ष्णेयं शक्तिः परमदारुणा ।
न्यपतद् धरणीपृष्ठे महोल्केव महाप्रभा ॥ ३२ ॥
वह परम भयंकर शक्ति सात्यकितक न पहुँचकर अत्यन्त तेजस्विनी बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३२ ॥
वार्ष्णेयस्तु ततो राजन्
स्वां शक्तिं कनकप्रभाम् ।
वेगवद् गृह्य चिक्षेप
पितामहरथं प्रति ॥ ३३ ॥
राजन्! तब सात्यकिने भी अपनी सुनहरी प्रभावली शक्ति लेकर उसे भीष्मके रथपर बड़े वेगसे चलाया ॥ ३३ ॥
वार्ष्णेयभुजवेगेन प्रणुन्ना सा महाहवे ।
अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रैर्यथा नरम् ॥ ३४ ॥
उस महासमरमें सात्यकिकी भुजाओंके वेगसे चलायी हुई वह शक्ति अत्यन्त वेगपूर्वक भीष्मकी ओर चली, मानो कालरात्रि मनुष्यकी ओर जा रही हो ॥ ३४ ॥
तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारतः ।
क्षुरप्राभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यां सा व्यशीर्यत मेदिनीम् ॥ ३५ ॥
परंतु भरतवंशी भीष्मने अपने अत्यन्त तीखे दो क्षुरप्रोंसे उस सहसा आती हुई शक्तिको दो जगहसे काट दिया। वह छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३५ ॥
छित्त्वा शक्तिं तु गाङ्गेयः सात्यकिं नवभिः शरैः ।
आजघानोरसि क्रुद्धः प्रहसञ्छत्रुकर्शनः ॥ ३६ ॥
शक्तिको काटकर हँसते हुए शत्रुसूदन गंगानन्दन भीष्मने कुपित हो सात्यकिकी छातीमें नौ बाण मारे ॥ ३६ ॥
ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज ।
परिवव्रू रणे भीष्मं माधवत्राणकारणात् ॥ ३७ ॥
पाण्डुके बड़े भाई महाराज धृतराष्ट्र! उस समय मधुवंशी सात्यकिको बचानेके लिये पाण्डवोंने रथ, घोड़े और हाथियोंकी सेनाके साथ आकर युद्धभूमिमें भीष्मको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३७ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
पाण्डवानां कुरूणां च समरे विजयैषिणाम् ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् युद्धमें विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कौरवों तथा पाण्डवोंमें परस्पर घोर युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। ३८ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि वार्ष्णेययुद्धे
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ।। १०४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सात्यकिका युद्धविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०४ ।।

१०५-

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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

दुर्योधनका दुःशासनको भीष्मकी रक्षाके लिये आदेश, युधिष्ठिर और नकुल-सहदेवके द्वारा शकुनिकी घुड़सवार-सेनाकी पराजय तथा शल्यके साथ उन सबका युद्ध

संजय उवाच

दृष्ट्वा भीष्मं रणे क्रुद्धं पाण्डवैरभिसंवृतम् ।
यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम् ॥ १ ॥
दुर्योधनो महाराज दुःशासनमभाषत ।
संजय कहते हैं—महाराज! ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें (वर्षाारम्भ होनेपर) जैसे मेघ आकाशमें सूर्यदेवको ढक लेते हैं, उसी प्रकार पाण्डवोंने युद्धभूमिमें क्रुद्ध हुए भीष्मको सब ओरसे घेर लिया है। यह देखकर आपके पुत्र दुर्योधनने दुःशासनसे कहा— ॥ १ १/२ ॥

एष शूरो महेष्वासो भीष्मः शूरनिषूदनः ॥ २ ॥
छादितः पाण्डवैः शूरैः समन्ताद् भरतर्षभ ।
‘भरतश्रेष्ठ! ये शूरवीरोंका नाश करनेवाले महाधनुर्धर शौर्यसम्पन्न भीष्म पराक्रमी पाण्डवोंद्वारा चारों ओरसे घेर लिये गये हैं ॥ २ १/२ ॥

तस्य कार्यं त्वया वीर रक्षणं सुमहात्मनः ॥ ३ ॥
रक्ष्यमाणो हि समरे भीष्मोऽस्माकं पितामहः ।
निहन्यात् समरे यत्तान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ॥ ४ ॥
‘वीर! तुम्हें उन महात्मा भीष्मकी रक्षा करनी चाहिये। युद्धमें सुरक्षित रहनेपर हमारे पितामह भीष्म समरांगणमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले पाण्डवोंसहित पांचालोंका संहार कर डालेंगे ॥ ३-४ ॥

तत्र कार्यतमं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् ।
गोप्ता ह्येष महेष्वासो भीष्मोऽस्माकं महाव्रतः ॥ ५ ॥
‘अतः इस अवसरपर मैं भीष्मजीकी रक्षाको ही प्रधान कार्य समझता हूँ; क्योंकि ये महाव्रती महाधनुर्धर भीष्म हमलोगोंके रक्षक हैं ॥ ५ ॥

स भवान् सर्वसैन्येन परिवार्य पितामहम् ।
समरे कर्म कुर्वाणं दुष्करं परिरक्षतु ॥ ६ ॥
‘अतः तुम सम्पूर्ण सेनाके साथ समरभूमिमें दुष्कर कर्म करनेवाले पितामह भीष्मको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करो’ ॥ ६ ॥

स एवमुक्तः समरे पुत्रो दुःशासनस्तव ।

परिवार्य स्थितो भीष्मं सैन्येन महता वृतः ॥ ७ ॥
(पालयामास महता यत्नेन च सुसंयतः ।)
दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपका पुत्र दुःशासन समरभूमिमें अपनी विशाल सेनाके साथ जा भीष्मको सब ओरसे घेरकर खड़ा हो गया और बड़े यत्नसे सावधान रहकर उनकी रक्षा करने लगा ॥ ७ ॥
ततः शतसहस्राणां हयानां सुबलात्मजः ।
विमलप्रासहस्तानादृष्टितोमरधारिणाम् ॥ ८ ॥
दर्पितानां सुवेषानां बलस्थानां पताकिनाम् ।
शिक्षितैर्युद्धकुशलैरुपैतानां नरोत्तमैः ॥ ९ ॥
तदनन्तर सुबलपुत्र शकुनि एक लाख घुड़सवारोंकी सेनाके साथ युद्धके लिये आ पहुँचा। वे सभी सैनिक अपने हाथोंमें चमकते हुए प्रास, ऋष्टि और तोमर लिये हुए थे। सबको अपने शौर्यका अभिमान था। सभी बलवान्, सुन्दर वेशभूषासे सुसज्जित और ध्वजा-पताकासे सुशोभित थे। अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पाये हुए युद्धकुशल श्रेष्ठ पैदल सिपाहियोंकी भी बहुत बड़ी संख्या उन घुड़सवारोंके साथ थी ॥ ८-९ ॥
(एवं बहुसहस्रैश्च योधानां युद्धशालिनाम् ।
संवृतः शकुनिस्तस्थौ युद्धायैव सुदंशितः ॥)
इस प्रकार युद्धभूमिमें शोभा पानेवाले कई हजार योद्धाओंसे घिरा हुआ शकुनि कवच धारण करके युद्धके लिये ही वहाँ खड़ा हो गया।
नकुलं सहदेवं च धर्मराजं च पाण्डवम् ।
न्यवारयन्नरश्रेष्ठान् परिवार्य समन्ततः ॥ १० ॥
राजन्! शकुनि नकुल, सहदेव तथा धर्मराज युधिष्ठिर—इन तीनों श्रेष्ठ पुरुषोंको सब ओरसे घेरकर इन्हें आगे बढ़नेसे रोकने लगा ॥ १० ॥
ततो दुर्योधनो राजा शूराणां हयसादिनाम् ।
अयुतं प्रेषयामास पाण्डवानां निवारणे ॥ ११ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधनने पाण्डवोंकी प्रगतिको रोकने-के लिये दस हजार घुड़सवार सैनिक और भेजे ॥ ११ ॥
तैः प्रविष्टैर्महावेगैर्गरुत्मद्भिरिवाहवे ।
(शुशुभे स महातेजाः शकुनिः सुबलात्मजः ।
तैरश्वैः सुमहावेगैर्मरुद्भिरिव वासवः ॥)
गरुड़के समान अत्यन्त वेगशाली वे अश्व रणभूमिमें यथास्थान पहुँच गये। जैसे मरुद्गणोंसे महातेजस्वी इन्द्रकी शोभा होती है, उसी प्रकार उन अत्यन्त वेगशाली अश्वोंके द्वारा अत्यन्त तेजस्वी सुबलपुत्र शकुनि सुशोभित होने लगा ॥ ११ १/२ ॥
खुराहता धरा राजंश्चकम्पे च ननाद च ॥ १२ ॥

राजन्! उन घोड़ोंकी टापसे आहत होकर यह पृथ्वी काँपने और भयंकर शब्द करने लगी ॥ १२ ॥ खुरशब्दश्च सुमहान् वाजिनां शुश्रुवे तदा । महावंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ॥ १३ ॥ उस समय घोड़ोंकी टापोंका महान् शब्द सब ओर उसी प्रकार सुनायी देने लगा, मानो पर्वतपर जलते हुए बड़े-बड़े बाँसोंके जंगलमें उनके पोरोंके फटनेका शब्द हो रहा हो ॥ १३ ॥ उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्भूतं महद् रजः । दिवाकररथं प्राप्य छादयामास भास्करम् ॥ १४ ॥ वहाँ घोड़ोंके उछलने-कूदनेसे जो बड़े जोरकी धूलि ऊपरको उठी, उसने मानो सूर्यके रथके समीप पहुँचकर उन्हें आच्छादित कर दिया ॥ १४ ॥ वेगवद्भिर्हयैस्तैस्तु क्षोभिता पाण्डवी चमूः । निपतद्भिर्महावेगैर्हंसैरिव महत् सरः ॥ १५ ॥ उन वेगशाली अश्वोंने पाण्डवसेनाको उसी प्रकार क्षुब्ध कर दिया, जैसे महान् वेगसे उड़नेवाले हंस किसी विशाल जलाशयमें पड़कर उसे मथ डालते हैं ॥ १५ ॥ (तुरंगैर्वायुवेगैश्च तत् सैन्यं व्याकुलीकृतम् ।) ह्रेषतां चैव शब्देन न प्राज्ञायत किञ्चन । वायुके समान वेगवाले उन अश्वोंने पाण्डव-सेनाको व्याकुल कर दिया। उनके हिनहिनानेकी आवाजसे दबकर दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ १५ १/२ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १६ ॥ प्रत्यघ्नंस्तरसा वेगं समरे ह्यसादिनाम् । उद्वृत्तस्य महाराज प्रावृट्कालेऽतिपूर्यतः ॥ १७ ॥ पौर्णमास्यामम्बुवेगं यथा वेला महोदधेः । महाराज! तब राजा युधिष्ठिर तथा पाण्डुपुत्र माद्रीनन्दन नकुल-सहदेवने समरभूमिमें उन घुड़सवारोंका वेग नष्ट कर दिया। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षा-ऋतुमें अधिक जलसे परिपूर्ण होकर मर्यादा तोड़नेवाले समुद्रके पूर्णिमा तिथिमें बढ़े हुए वेगको तटकी भूमि रोक देती है ॥ १६-१७ १/२ ॥ ततस्ते रथिनो राजञ्छरैः संनतपर्वभिः ॥ १८ ॥ न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि कायेभ्यो ह्यसादिनाम् । राजन्! तत्पश्चात् वे रथी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा घुड़सवारोंके मस्तक काटने लगे ॥ १८ १/२ ॥ ते निपेतुर्महाराज निहता दृढधन्विभिः ॥ १९ ॥ नागैरिव महानागा यथावद् गिरिगह्वरे ।

महाराज! उन सुदृढ़ धनुर्धरोंद्वारा मारे गये वे घुड़सवार रणभूमिमें उसी प्रकार गिरते थे, जैसे पर्वतोंकी कन्दरामें बड़े-बड़े हाथी हाथियोंसे ही मारे जाकर गिरते हैं।। १९ १/२ ।।
तेऽपि प्रासैः सुनिशितैः शरैः संनतपर्वभिः ।। २० ।।
न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि विचरन्तो दिशो दश ।
वे घुड़सवार भी दसों दिशाओंमें विचरते हुए झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणों तथा प्रासोंद्वारा शत्रु-पक्षके सैनिकोंके मस्तक काट गिराते थे ।। २० १/२ ।।
अभ्याहता हयारोहा ऋष्टिभिर्भरतर्षभ ।। २१ ।।
अत्यजन्नुत्तमाङ्गानि फलानीव महाद्रुमाः ।
भरतश्रेष्ठ! ऋष्टियोंद्वारा मारे गये घुड़सवार अपने मस्तकोंको उसी प्रकार गिराते थे, जैसे बड़े-बड़े वृक्ष अपने पके हुए फलोंको गिराते हैं ।। २१ १/२ ।।
ससादिनो हया राजंस्तत्र तत्र निषूदिताः ।। २२ ।।
पतिताः पात्यमानाश्च प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ।
राजन्! सवारोंसहित वहाँ मारे गये बहुत-से घोड़े सब ओर गिरे और गिराये जाते हुए दिखायी देते थे ।।
वध्यमाना हयाश्चैव प्राद्रवन्त भयार्दिताः ।। २३ ।।
यथा सिंहं समासाद्य मृगाः प्राणपरायणाः ।
जैसे सिंहका सामना पड़ जानेपर मृग भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये भागते हैं, उसी प्रकार मारे जाते हुए घोड़े भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भाग रहे थे ।। २३ १/२ ।।
पाण्डवाश्च महाराज जित्वा शत्रून् महामृधे ।। २४ ।।
दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च ताडयामासुराहवे ।
महाराज! पाण्डव उस महासमरमें शत्रुओंको जीतकर शंख फूँकने और नगाड़े पीटने लगे ।। २४ १/२ ।।
ततो दुर्योधनो दीनो दृष्ट्वा सैन्यं पराजितम् ।। २५ ।।
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठ मद्रराजमिदं वचः ।
भरतश्रेष्ठ! तब अपनी सेनाको पराजित देख दुर्योधनने दीन होकर मद्रराज शल्यसे इस प्रकार कहा— ।। २५ १/२ ।।
एष पाण्डुसुतो ज्येष्ठो यमाभ्यां सहितो रणे ।। २६ ।।
पश्यतां वो महाबाहो सेनां द्रावयति प्रभो ।
तं वारय महाबाहो वेलेव मकरालयम् ।। २७ ।।
त्वं हि संश्रूयसेऽत्यर्थमसह्यबलविक्रमः ।

‘महाबाहो! ये ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर नकुल और सहदेवको साथ लेकर रणभूमिमें आपलोगोंके देखते-देखते मेरी सेनाको खदेड़ रहे हैं। प्रभो! महाबाहो! जैसे तटप्रान्त समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकता है, उसी प्रकार आप भी युधिष्ठिरको आगे बढ़नेसे रोकिये; क्योंकि आपका बल और पराक्रम अत्यन्त असह्य सुना जाता है’ ।। २६-२७ १/२ ।।

पुत्रस्य तव तद् वाक्यं श्रुत्वा शल्यः प्रतापवान् ।। २८ ।। स ययौ रथवंशेन यत्र राजा युधिष्ठिरः ।

राजन्! आपके पुत्रकी यह बात सुनकर प्रतापी राजा शल्य रथसमूहके साथ उसी स्थानपर गये, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ।। २८ १/२ ।।

तदापतद् वै सहसा शल्यस्य सुमहद् बलम् ।। २९ ।। महौघवेगं समरे वारयामास पाण्डवः । मद्रराजं च समरे धर्मराजो महारथः ।। ३० ।।

उस समय सहसा अपनी ओर आती हुई राजा शल्यकी उस विशाल वाहिनी तथा स्वयं मद्रराजको भी पाण्डुपुत्र महारथी धर्मराज युधिष्ठिरने महान् जल-प्रवाहके समान समरभूमिमें रोक दिया ।। २९-३० ।।

दशभिः सायकैस्तूर्णमाजघान स्तनान्तरे । नकुलः सहदेवश्च तं सप्तभिरजिह्मगैः ।। ३१ ।।

उन्होंने शल्यकी छातीमें तुरंत ही दस बाण मारे तथा नकुल और सहदेवने भी सीधे जानेवाले सात बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया ।। ३१ ।।

मद्रराजोऽपि तान् सर्वानजघान त्रिभिस्त्रिभिः । युधिष्ठिरं पुनः षष्ट्या विव्याध निशितैः शरैः ।। ३२ ।।

तब मद्रराज शल्यने भी उनको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। फिर युधिष्ठिरको उन्होंने साठ तीखे बाण मारे ।। ३२ ।।

माद्रीपुत्रौ च सम्भ्रान्तौ द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत् । (पुनः स बहुभिर्बाणैराजघान युधिष्ठिरम् ।)

इसके बाद दो-दो बाणोंसे उन्होंने उत्तम कुलमें उत्पन्न माद्रीकुमारोंको घायल किया तथा अनेक बाणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरको भी पुनः चोट पहुँचायी ।। ३२ १/२ ।।

ततो भीमो महाबाहुर्दृष्ट्वा राजानमाहवे ।। ३३ ।। मद्रराजरथं प्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा । अभ्यपद्यत संग्रामे युधिष्ठिरममित्रजित् ।। ३४ ।।

तब शत्रुविजयी महाबाहु भीमसेन समरभूमिमें राजा युधिष्ठिरको मृत्युके मुखमें पड़े हुएके समान मद्रराजके रथके समीप पहुँचा हुआ देखकर युद्धके लिये वहाँ आ पहुँचे ।। ३३-३४ ।।

(आपतन्नेव भीमस्तु मद्रराजमताडयत् ।

सर्वपारशवैस्तीक्ष्णैर्नाराचैर्मर्मभेदिभिः ।।
ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्येन महता वृतौ ।
राजानमभ्यपद्येतामञ्जसा शरवर्षिणौ ।।)
भीमसेनने आते ही पूर्णतः लोहेके बने हुए और मर्मस्थानोंको विदीर्ण करनेमें समर्थ तीखे नाराचोंसे मद्रराज शल्यको गहरी चोट पहुँचाई। तब भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी विशाल सेनाके साथ अनायास ही बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ राजा शल्यकी रक्षाके लिये आ पहुँचे।

ततो युद्धं महाघोरं प्रावर्तत सुदारुणम् ।
अपरां दिशमास्थाय पतमाने दिवाकरे ।। ३५ ।।
तदनन्तर जब सूर्यदेव पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर अस्ताचलको जा रहे थे, उसी समय दोनों सेनाओंमें अत्यन्त दारुण महाघोर युद्ध आरम्भ हुआ ।। ३५ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०५ ।।

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।]

१०६-

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षडधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मके द्वारा पराजित पाण्डवसेनाका पलायन और भीष्मको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको अर्जुनका रोकना

संजय उवाच
ततः पिता तव क्रुद्धो निशितैः सायकोत्तमैः ।
आजघान रणे पार्थान् सहसेनान् समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! तब आपके ताऊ देवव्रत कुपित हो रणभूमिमें अपने तीखे एवं श्रेष्ठ सायकोंद्वारा सेनासहित कुन्तीकुमारोंको सब ओरसे घायल करने लगे ॥ १ ॥
भीमं द्वादशभिर्विद्ध्वा सात्यकिं नवभिः शरैः ।
नकुलं च त्रिभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरं द्वादशभिर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
उन्होंने भीमसेनको बारह, सात्यकिको नौ, नकुलको तीन और सहदेवको सात बाणोंसे घायल करके राजा युधिष्ठिरकी दोनों भुजाओं और छातीमें बारह बाण मारे ॥ २ ½ ॥
धृष्टद्युम्नं ततो विद्ध्वा ननाद सुमहाबलः ॥ ३ ॥
तं द्वादशाख्यैर्नकुलो माधवश्च त्रिभिः शरैः ।
धृष्टद्युम्नश्च सप्तत्या भीमसेनश्च सप्तभिः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरो द्वादशभिः प्रत्यविध्यत् पितामहम् ।
तदनन्तर धृष्टद्युम्नको भी अपने बाणोंद्वारा बींधकर महाबली भीष्मने सिंहके समान गर्जना की। तब नकुलने बारह, सात्यकिने तीन, धृष्टद्युम्नने सत्तर, भीमसेनने सात तथा युधिष्ठिरने बारह बाण मारकर पितामह भीष्मको घायल कर दिया ॥ ३-४ ½ ॥
द्रोणस्तु सात्यकिं विद्ध्वा भीमसेनमविध्यत ॥ ५ ॥
एकैकं पञ्चभिर्बाणैर्यमदण्डोपमैः शितैः ।
द्रोणाचार्यने यमदण्डके समान भयंकर एवं तीखे पाँच-पाँच बाणोंद्वारा सात्यकि और भीमसेनमेंसे प्रत्येकको घायल किया। पहले सात्यकिको चोट पहुँचाकर फिर भीमसेनपर गहरा आघात किया ॥ ५ ½ ॥
तौ च तं प्रत्यविध्येतां त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ ६ ॥
तोत्रैरिव महानागं द्रोणं ब्राह्मणपुङ्गवम् ।
तब उन दोनोंने भी अंकुशोंसे महान् गजराजके समान सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंद्वारा ब्राह्मणप्रवर द्रोणाचार्यको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ॥ ६ ½ ॥

सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ॥ ७ ॥ अभीषाहाः शूरसेनाः शिवयोऽथ वसातयः । संग्रामे नाजहुर्भीष्मं वध्यमानाः शितैः शरैः ॥ ८ ॥ सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति देशके योद्धा शत्रुओंके तीखे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी संग्रामभूमिमें भीष्मको छोड़कर नहीं भागे ॥ ७-८ ॥ तथैवान्ये महीपाला नानादेशसमागताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त विविधायुधपाणयः ॥ ९ ॥ इसी प्रकार विभिन्न देशोंसे आये हुए अन्य भूपाल भी हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये पाण्डवोंपर आक्रमण करने लगे ॥ ९ ॥ तथैव पाण्डवा राजन् परिवव्रुः पितामहम् । स समन्तात् परिवृतो रथौघैरपराजितः ॥ १० ॥ गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः प्रजज्वाल दहन् परान् । राजन्! पाण्डवोंने भी पितामह भीष्मको घेर लिया। चारों ओरसे रथसमूहोंद्वारा घिरे हुए अपराजित वीर भीष्म गहन वनमें लगायी हुई आगके समान शत्रुओंको दग्ध करते हुए प्रज्वलित हो उठे ॥ १० १/२ ॥ रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगदेन्धनः ॥ ११ ॥ शरस्फुलिङ्गो भीष्माग्निर्ददाह क्षत्रियर्षभान् । रथ ही उनके लिये अग्निशालाके समान था, धनुष ज्वालाओंके समान प्रकाशित होता था, खड्ग, शक्ति और गदा आदि अस्त्र-शस्त्र समिधाका काम कर रहे थे। बाण चिनगारियोंके समान थे। इस प्रकार भीष्मरूपी अग्नि वहाँ क्षत्रियशिरोमणियोंको दग्ध करने लगी ॥ ११ १/२ ॥ सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्गार्ध्रपक्षैः सुतेजनैः ॥ १२ ॥ कर्णिनालीकनाराचैश्छादयामास तद् बलम् । अपातयद् ध्वजांश्चैव रथिनश्च शितैः शरैः ॥ १३ ॥ उन्होंने स्वर्णभूषित गृध्रपंखयुक्त तेज बाणों तथा कर्णी, नालीक और नाराचोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनाको आच्छादित कर दिया। तीखे बाणोंसे ध्वजोंको काट डाला और रथियोंको भी मार गिराया ॥ १२-१३ ॥ मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् । निर्मनुष्यान् रथान् राजन् गजानश्वांश्च संयुगे ॥ १४ ॥ अकरोत् स महाबाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

ध्वजाएँ काटकर उन्होंने रथसमूहोंको मुण्डित ताल-वनोंके समान कर दिया। राजन्! युद्धस्थलमें समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु भीष्मने बहुत-से रथों, हाथियों और घोड़ोंको मनुष्योंसे रहित कर दिया ॥ १४ १/२ ॥ तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ १५ ॥ निशम्य सर्वभूतानि समकम्पन्त भारत । अमोघा ह्यापतन् बाणाः पितुस्ते भरतर्षभ ॥ १६ ॥ उनके धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी। भारत! उसे सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे। भरतश्रेष्ठ! आपके ताऊ भीष्मके बाण कभी खाली नहीं जाते थे ॥ १५-१६ ॥ नासज्जन्त तनुत्रेषु भीष्मचापच्युताः शराः । हतवीरान् रथात् राजन् संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः ॥ १७ ॥ अपश्याम महाराज ह्रियमाणान् रणाजिरे । राजन्! भीष्मके धनुषसे छूटे हुए बाण कवचोंमें नहीं अटकते थे (उन्हें छिन्न-भिन्न करके भीतर घुस जाते थे)। महाराज! हमने समरांगणमें ऐसे बहुत-से रथ देखे, जिनके रथी और सारथि तो मार दिये गये थे; परंतु वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए होनेके कारण वे इधर-उधर खींचकर ले जाये जा रहे थे ॥ १७ १/२ ॥ चेदिकाशिकरूषाणां सहस्राणि चतुर्दश ॥ १८ ॥ महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः । अपरावर्तिनः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १९ ॥ संग्रामे भीष्ममासाद्य व्यादितास्यमिवान्तकम् । निमग्नाः परलोकाय सवाजिरथकुञ्जराः ॥ २० ॥ चेदि, काशि और करूष देशके चौदह हजार विख्यात महारथी थे। वे उच्चकुलमें उत्पन्न होकर पाण्डवोंके लिये अपना शरीर निछावर कर चुके थे। उनमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखानेवाला नहीं था। उन सबकी ध्वजाएँ सोनेकी बनी हुई थीं। मुँह बाये हुए कालके समान भीष्मजीके सामने पहुँचकर वे सब-के-सब महारथी युद्धरूपी समुद्रमें डूब गये। भीष्मजीने घोड़े, रथ और हाथियोंसहित उन सबको परलोकका पथिक बना दिया ॥ १८—२० ॥ भग्नाक्षोपस्करान् कांश्चिद् भग्नचक्रांश्च भारत । अपश्याम महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ भरतनन्दन! महाराज! हमने वहाँ सैकड़ों और हजारों ऐसे रथ देखे, जिनके धुरे आदि सामान टूट गये थे और पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे ॥ २१ ॥ सवरूथै रथैर्भग्नै रथिभिश्च निपातितैः । शरैः सुकवचैश्छिन्नैः पट्टिशैश्च विशाम्पते ॥ २२ ॥

गदाभिर्भिन्दिपालैश्च निशितैश्च शिलीमुखैः । अनुकर्षैरूपासङ्गैश्चक्रैर्भग्नैश्च मारिष ॥ २३ ॥ बाहुभिः कार्मुकैः खड्गैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । तलत्रैरङ्गुलित्रैश्च ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥ २४ ॥ चापैश्च बहुधा छिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी । माननीय प्रजानाथ! वरूथोंसहित टूटे हुए रथ, मारे गये रथी, कटे हुए बाण, कवच, पट्टिश, गदा, भिन्दिपाल, तीखे सायक, छिन्न-भिन्न हुए अनुकर्ष, उपासंग, पहिये, कटी हुई बाँह, धनुष, खड्ग, कुण्डलोंसहित मस्तक, तलत्राण, अंगुलित्राण, गिराये गये ध्वज और अनेक टुकड़ोंमें कटकर गिरे हुए चाप—इन सबके द्वारा वहाँकी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥ २२—२४ १/२ ॥

हतारोहा गजा राजन् हयाश्च हतसादिनः ॥ २५ ॥ न्यपतन्त गतप्राणाः शतशोऽथ सहस्रशः । राजन्! जिनके सवार मार दिये गये थे, ऐसे हाथी और घोड़े सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें निष्प्राण होकर पड़े थे॥ २५ १/२ ॥

यतमानाश्च ते वीरा द्रवमाणान् महारथान् ॥ २६ ॥ नाशक्नुवन् वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् । पाण्डव वीर बहुत प्रयत्न करनेपर भी भीष्मके बाणोंसे पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोक नहीं पा रहे थे॥ २६ १/२ ॥

महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः ॥ २७ ॥ अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावतः । महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मजीके द्वारा मारी जाती हुई उस विशाल सेनामें भगदड़ मच गयी थी। दो आदमी भी एक साथ नहीं भागते थे॥ २७ १/२ ॥

आविद्धरथनागाश्वं पतितध्वजसंकुलम् ॥ २८ ॥ अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् । पाण्डवोंकी सेना अचेत-सी होकर हाहाकार कर रही थी। उसके रथ, हाथी और घोड़े बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। ध्वजाएँ कटकर धराशायी हो गयी थीं॥ २८ १/२ ॥

जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ॥ २९ ॥ प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात् कृतः । उस भीषण मार-काटमें दैवसे प्रेरित होकर पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको और मित्रने प्यारे मित्रको मार डाला॥ २९ १/२ ॥

विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३० ॥ प्रकीर्य केशान् धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ।

पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके दूसरे सैनिक कवच उतारकर केश बिखेरे हुए सब ओर भागते दिखायी देते थे॥ ३० १/२ ॥

तद् गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथकूबरम् ॥ ३१ ॥
ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा।
उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सारी सेना (सिंहसे डरी हुई) गौओंके समुदायकी भाँति घबराहटमें पड़ गयी थी। रथके कूबर उलट-पलट हो गये थे और समस्त सैनिक आर्तनाद कर रहे थे॥ ३१ १/२ ॥

प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः ॥ ३२ ॥
उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम्।
उस सेनामें भगदड़ पड़ी देख यादवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको रोककर कुन्तीकुमार अर्जुनसे कहा— ॥ ३२ १/२ ॥

अयं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यः काङ्क्षितस्तव ॥ ३३ ॥
प्रहरास्मिन् नरव्याघ्र न चेन्मोहाद् विमुह्यसे।
‘पार्थ! तुम्हें जिस अवसरकी अभिलाषा और प्रतीक्षा थी, वह आ पहुँचा। पुरुषसिंह! यदि तुम मोहसे मोहित नहीं हो रहे हो तो इन भीष्मपर प्रहार करो॥ ३३ १/२ ॥

यत् पुरा कथितं वीर राज्ञां तेषां समागमे ॥ ३४ ॥
विराटनगरे तात संजयस्य समीपतः।
भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् ॥ ३५ ॥
सानुबन्धान् हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संगरे।
इति तत् कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिंदम ॥ ३६ ॥
क्षत्रधर्ममनुस्मृत्य युध्यस्व विगतज्वरः।
‘वीर! तात! पूर्वकालमें विराटनगरके भीतर जब सम्पूर्ण राजा एकत्र हुए थे, उनके सामने और संजयके समीप जो तुमने यह कहा था कि ‘मैं युद्धमें, जो मेरा सामना करने आयेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि सम्पूर्ण सैनिकोंको सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।’ शत्रुदमन कुन्तीनन्दन! अपने उस कथनको सत्य कर दिखाओ। तुम क्षत्रियधर्मका स्मरण करके सारी चिन्ताएँ छोड़कर युद्ध करो’॥ ३४—३६ १/२ ॥

इत्युक्तो वासुदेवेन तिर्यग्दृष्टिरधोमुखः ॥ ३७ ॥
अकाम इव बीभत्सुरिदं वचनमब्रवीत्।
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने मुँह नीचे किये तिरछी दृष्टिसे देखते हुए अनिच्छुककी भाँति उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ १/२ ॥

अवध्यानां वधं कृत्वा राज्यं वा नरकोत्तरम् ॥ ३८ ॥
दुःखानि वनवासे वा किं नु मे सुकृतं भवेत्।

'प्रभो! अवध्य महापुरुषोंका वध करके नरकसे भी बढ़कर निन्दनीय राज्य प्राप्त करूँ अथवा वनवासमें रहकर कष्ट भोगूँ—इन दोनोंमें कौन मेरे लिये पुण्य-दायक होगा? ।। ३८ ½ ।।

चोदयाश्वान् यतो भीष्मः करिष्ये वचनं तव ।। ३९ ।। पातयिष्यामि दुर्धर्षं भीष्मं कुरुपितामहम् । 'अच्छा, जहाँ भीष्म हैं, उसी ओर घोड़ोंको बढ़ाइये। आज मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। कुरुकुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको मार गिराऊँगा' ।। ३९ ½ ।।

स चाश्वान् रजतप्रख्यांश्चोदयामास माधवः ।। ४० ।। यतो भीष्मस्ततो राजन् दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव । राजन्! तब भगवान् श्रीकृष्णने चाँदीके समान श्वेत वर्णवाले घोड़ोंको उसी ओर हाँका, जहाँ अंशुमाली सूर्यके समान दुर्निरीक्ष्य भीष्म युद्ध कर रहे थे ।। ४० ½ ।।

ततस्तत् पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत् ।। ४१ ।। दृष्ट्वा पार्थं महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे । महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनको भीष्मके साथ युद्ध करनेके लिये उद्यत देख युधिष्ठिरकी वह भागती हुई विशाल सेना पुनः लौट आयी ।। ४१ ½ ।।

ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठः सिंहवद् विनदन् मुहुः ।। ४२ ।। धनंजयरथं शीघ्रं शरवर्षैरवाकिरत् । तब बारंबार सिंहनाद करते हुए कुरुश्रेष्ठ भीष्मने धनंजयके रथपर शीघ्र ही बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ४२ ½ ।।

क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः ।। ४३ ।। शरवर्षेण महता न प्राज्ञायत भारत । भारत! एक ही क्षणमें बाणोंकी उस भारी वर्षाके कारण सारथि और घोड़ोंसहित उनका वह रथ ऐसा अदृश्य हो गया कि उसका कुछ पता ही नहीं चलता था ।। ४३ ½ ।।

वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्वरः ।। ४४ ।। चोदयामास तानश्वान् विनुन्नान् भीष्मसायकैः । भगवान् श्रीकृष्ण बिना किसी घबराहटके धैर्य धारणकर भीष्मके सायकोंसे क्षत-विक्षत हुए उन घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँक रहे थे ।। ४४ ½ ।।

ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् ।। ४५ ।। पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा शितैः शरैः । तब कुन्तीकुमारने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीखे बाणोंद्वारा भीष्मके धनुषको काट गिराया ।। ४५ ½ ।।

स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद् धनुः ।। ४६ ।। निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ।

धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुकुलरत्न भीष्मने पुनः दूसरा धनुष हाथमें ले पलक मारते-मारते उसके ऊपर प्रत्यंचा चढ़ा दी ॥ ४६ १/२ ॥ चकर्ष च ततो दोभ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ ४७ ॥ अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः । तदनन्तर मेघोंके समान गम्भीर नाद करनेवाले उस धनुषको उन्होंने दोनों हाथोंसे खींचा। इतनेहीमें कुपित हुए अर्जुनने उनके उस धनुषको भी काट दिया ॥ ४७ १/२ ॥ तस्य तत् पूजयामास लाघवं शान्तनोः सुतः ॥ ४८ ॥ गाङ्गेयस्त्वब्रवीत् पार्थं धन्विश्रेष्ठमरिंदम । शत्रुदमन नरेश! उस समय शान्तनुकुमार गंगानन्दन भीष्मने धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र अर्जुनकी उस फुर्तीके लिये उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और इस प्रकार कहा— ॥ ४८ १/२ ॥ साधु साधु महाबाहो साधु कुन्तीसुतेति च ॥ ४९ ॥ समाभाष्यैवमपरं प्रगृह्य रुचिरं धनुः । मुमोच समरे भीष्मः शरान् पार्थरथं प्रति ॥ ५० ॥ ‘महाबाहो! कुन्तीकुमार! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, तुम्हें साधुवाद।’ ऐसा कहकर भीष्मने पुनः दूसरा सुन्दर धनुष लेकर समरांगणमें अर्जुनके रथकी ओर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४९-५० ॥ अदर्शयद् वासुदेवो हययाने परं बलम् । मोघान् कुर्वञ्शरांस्तस्य मण्डलानि निदर्शयन् ॥ ५१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंके हाँकनेकी कलामें अपनी अद्भुत शक्ति दिखायी। वे भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए भीष्मके बाणोंको व्यर्थ करते जा रहे थे ॥ ५१ ॥ (सारथ्यं निपुणं कुर्वन् प्रत्यदृश्यत संयुगे । भीष्मस्तावत् सुसंक्रुद्धः पुनर्बाणान् मुमोच ह ॥ पार्थाय युधि राजेन्द्र तदद्भुतमिवाभवत् । अर्जुनस्तु सुसंक्रुद्धः पितामहमरिंदमः । अवर्षद् बाणवर्षेण योद्धुं ह्यभिमुखे स्थितम् ॥ तावुभौ युधि दुर्धर्षो युयुधाते परस्परम् ।) युद्धस्थलमें भगवान् श्रीकृष्ण कुशलतापूर्वक सारथ्य-कर्म करते दिखायी दिये। राजेन्द्र! भीष्म अत्यन्त क्रोधमें भरकर युद्धमें पार्थके ऊपर बारंबार बाणोंकी वर्षा करते रहे। वह अद्भुत-सी बात थी। फिर शत्रुदमन अर्जुनने भी क्रोधमें भरकर युद्धके लिये अपने सामने खड़े हुए भीष्मपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। वे दोनों रण-दुर्जय वीर एक-दूसरेसे युद्ध कर रहे थे। शुशुभाते नरव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ ।

गोवृषाविव संरब्धौ विषाणोल्लिखिताङ्कितौ ॥ ५२ ॥
उस समय पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही भीष्मके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो सींगोंके आघातसे घायल हुए दो रोषभरे साँड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ५२ ॥
(भीष्मोऽतीव सुसंक्रुद्धः पृषत्कैरर्जुनं बलात् ।
जघान समरे मूर्ध्नि सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥)

तत्पश्चात् भीष्मने भी रणक्षेत्रमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने बाणोंद्वारा बलपूर्वक अर्जुनके मस्तकपर आघात किया। उसके बाद वे बारंबार सिंहके समान गर्जना करने लगे।
वासुदेवस्तु सम्प्रेक्ष्य पार्थस्य मृदुयुद्धताम् ।
भीष्मं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि ॥ ५३ ॥
प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनयोः ।
वरान् वरान् विनिघ्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् ॥ ५४ ॥
युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे बले ।

भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि अर्जुन मन लगाकर युद्ध नहीं कर रहे हैं। वे भीष्मके प्रति कोमलता दिखा रहे हैं और उधर भीष्म युद्धमें सेनाके मध्यभागमें खड़े हो निरन्तर बाणोंकी वर्षा करते हुए दोपहरके सूर्यके समान तप रहे हैं। पाण्डवसेनाके चुने हुए उत्तमोत्तम वीरोंको मार रहे हैं और युधिष्ठिरसेनामें प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर रहे हैं ॥ ५३-५४ १/२ ॥
नामृष्यत महाबाहुर्माधवः परवीरहा ॥ ५५ ॥
उत्सृज्य रजतप्रख्यान् हयान् पार्थस्य मारिष ।
वासुदेवस्ततो योगी प्रचस्कन्द महारथात् ॥ ५६ ॥
अभिदुद्राव भीष्मं स भुजप्रहरणो बली ।
प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥ ५७ ॥

तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले महाबाहु माधवको यह सहन नहीं हुआ। आर्य! वे योगेश्वर भगवान् वासुदेव चाँदीके समान सफेद रंगवाले अर्जुनके घोड़ोंको छोड़कर उस विशाल रथसे कूद पड़े और केवल भुजाओंका ही आयुध लिये हाथोंमें चाबुक उठाये बारंबार सिंहनाद करते हुए बलवान् एवं तेजस्वी श्रीहरि भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े ॥ ५५—५७ ॥
दारयन्निव पद्भ्यां स जगतीं जगदीश्वरः ।
क्रोधताम्रेक्षणः कृष्णो जिघांसुरमितद्युतिः ॥ ५८ ॥

सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, अमित तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण क्रोधसे लाल आँखें करके भीष्मको मार डालनेकी इच्छा लेकर पैरोंकी धमकसे वसुधाको विदीर्ण-सी कर रहे थे ॥ ५८ ॥
ग्रसन्तमिव चेतांसि तावकानां महाहवे ।