भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2182

महाराज! उन सुदृढ़ धनुर्धरोंद्वारा मारे गये वे घुड़सवार रणभूमिमें उसी प्रकार गिरते थे, जैसे पर्वतोंकी कन्दरामें बड़े-बड़े हाथी हाथियोंसे ही मारे जाकर गिरते हैं।। १९ १/२ ।।
तेऽपि प्रासैः सुनिशितैः शरैः संनतपर्वभिः ।। २० ।।
न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि विचरन्तो दिशो दश ।
वे घुड़सवार भी दसों दिशाओंमें विचरते हुए झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणों तथा प्रासोंद्वारा शत्रु-पक्षके सैनिकोंके मस्तक काट गिराते थे ।। २० १/२ ।।
अभ्याहता हयारोहा ऋष्टिभिर्भरतर्षभ ।। २१ ।।
अत्यजन्नुत्तमाङ्गानि फलानीव महाद्रुमाः ।
भरतश्रेष्ठ! ऋष्टियोंद्वारा मारे गये घुड़सवार अपने मस्तकोंको उसी प्रकार गिराते थे, जैसे बड़े-बड़े वृक्ष अपने पके हुए फलोंको गिराते हैं ।। २१ १/२ ।।
ससादिनो हया राजंस्तत्र तत्र निषूदिताः ।। २२ ।।
पतिताः पात्यमानाश्च प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ।
राजन्! सवारोंसहित वहाँ मारे गये बहुत-से घोड़े सब ओर गिरे और गिराये जाते हुए दिखायी देते थे ।।
वध्यमाना हयाश्चैव प्राद्रवन्त भयार्दिताः ।। २३ ।।
यथा सिंहं समासाद्य मृगाः प्राणपरायणाः ।
जैसे सिंहका सामना पड़ जानेपर मृग भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये भागते हैं, उसी प्रकार मारे जाते हुए घोड़े भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भाग रहे थे ।। २३ १/२ ।।
पाण्डवाश्च महाराज जित्वा शत्रून् महामृधे ।। २४ ।।
दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च ताडयामासुराहवे ।
महाराज! पाण्डव उस महासमरमें शत्रुओंको जीतकर शंख फूँकने और नगाड़े पीटने लगे ।। २४ १/२ ।।
ततो दुर्योधनो दीनो दृष्ट्वा सैन्यं पराजितम् ।। २५ ।।
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठ मद्रराजमिदं वचः ।
भरतश्रेष्ठ! तब अपनी सेनाको पराजित देख दुर्योधनने दीन होकर मद्रराज शल्यसे इस प्रकार कहा— ।। २५ १/२ ।।
एष पाण्डुसुतो ज्येष्ठो यमाभ्यां सहितो रणे ।। २६ ।।
पश्यतां वो महाबाहो सेनां द्रावयति प्रभो ।
तं वारय महाबाहो वेलेव मकरालयम् ।। २७ ।।
त्वं हि संश्रूयसेऽत्यर्थमसह्यबलविक्रमः ।