भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2183, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2183

‘महाबाहो! ये ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर नकुल और सहदेवको साथ लेकर रणभूमिमें आपलोगोंके देखते-देखते मेरी सेनाको खदेड़ रहे हैं। प्रभो! महाबाहो! जैसे तटप्रान्त समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकता है, उसी प्रकार आप भी युधिष्ठिरको आगे बढ़नेसे रोकिये; क्योंकि आपका बल और पराक्रम अत्यन्त असह्य सुना जाता है’ ।। २६-२७ १/२ ।।

पुत्रस्य तव तद् वाक्यं श्रुत्वा शल्यः प्रतापवान् ।। २८ ।। स ययौ रथवंशेन यत्र राजा युधिष्ठिरः ।

राजन्! आपके पुत्रकी यह बात सुनकर प्रतापी राजा शल्य रथसमूहके साथ उसी स्थानपर गये, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ।। २८ १/२ ।।

तदापतद् वै सहसा शल्यस्य सुमहद् बलम् ।। २९ ।। महौघवेगं समरे वारयामास पाण्डवः । मद्रराजं च समरे धर्मराजो महारथः ।। ३० ।।

उस समय सहसा अपनी ओर आती हुई राजा शल्यकी उस विशाल वाहिनी तथा स्वयं मद्रराजको भी पाण्डुपुत्र महारथी धर्मराज युधिष्ठिरने महान् जल-प्रवाहके समान समरभूमिमें रोक दिया ।। २९-३० ।।

दशभिः सायकैस्तूर्णमाजघान स्तनान्तरे । नकुलः सहदेवश्च तं सप्तभिरजिह्मगैः ।। ३१ ।।

उन्होंने शल्यकी छातीमें तुरंत ही दस बाण मारे तथा नकुल और सहदेवने भी सीधे जानेवाले सात बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया ।। ३१ ।।

मद्रराजोऽपि तान् सर्वानजघान त्रिभिस्त्रिभिः । युधिष्ठिरं पुनः षष्ट्या विव्याध निशितैः शरैः ।। ३२ ।।

तब मद्रराज शल्यने भी उनको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। फिर युधिष्ठिरको उन्होंने साठ तीखे बाण मारे ।। ३२ ।।

माद्रीपुत्रौ च सम्भ्रान्तौ द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत् । (पुनः स बहुभिर्बाणैराजघान युधिष्ठिरम् ।)

इसके बाद दो-दो बाणोंसे उन्होंने उत्तम कुलमें उत्पन्न माद्रीकुमारोंको घायल किया तथा अनेक बाणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरको भी पुनः चोट पहुँचायी ।। ३२ १/२ ।।

ततो भीमो महाबाहुर्दृष्ट्वा राजानमाहवे ।। ३३ ।। मद्रराजरथं प्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा । अभ्यपद्यत संग्रामे युधिष्ठिरममित्रजित् ।। ३४ ।।

तब शत्रुविजयी महाबाहु भीमसेन समरभूमिमें राजा युधिष्ठिरको मृत्युके मुखमें पड़े हुएके समान मद्रराजके रथके समीप पहुँचा हुआ देखकर युद्धके लिये वहाँ आ पहुँचे ।। ३३-३४ ।।

(आपतन्नेव भीमस्तु मद्रराजमताडयत् ।