भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2176

प्रजानाथ! घोड़ोंके मारे जानेपर महारथी चित्रसेन तुरंत ही रथसे कूद पड़े और दुर्मुखके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २२ १/२ ॥ द्रोणश्च द्रुपदं भित्त्वा शरैः संनतपर्वभिः ॥ २३ ॥ सारथिं चास्य विव्याध त्वरमाणः पराक्रमी । पराक्रमी द्रोणाचार्यने भी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे द्रुपदको घायल करके बड़ी उतावलीके साथ उनके सारथिको भी बींध डाला ॥ २३ १/२ ॥ पीड्यमानस्ततो राजा द्रुपदो वाहिनीमुखे ॥ २४ ॥ अपायाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन् । इस प्रकार युद्धके मुहानेपर द्रोणाचार्यसे पीड़ित हो राजा द्रुपद पूर्व वैरका स्मरण करते हुए शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग गये ॥ २४ १/२ ॥ भीमसेनस्तु राजानं मुहूर्तादिव बाह्लिकम् ॥ २५ ॥ व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः । भीमसेनने दो ही घड़ीमें सारी सेनाके देखते-देखते राजा बाह्लीकको घोड़े, सारथि तथा रथसे शून्य कर दिया ॥ २५ १/२ ॥ ससम्भ्रमो महाराज संशयं परमं गतः ॥ २६ ॥ अवप्लुत्य ततो वाहाद् बाह्लीकः पुरुषोत्तमः । आरुरोह रथं तूर्णं लक्ष्मणस्य महारणे ॥ २७ ॥ महाराज! नरश्रेष्ठ बाह्लीक बड़ी घबराहटमें पड़ गये। उनका जीवन अत्यन्त संशयमें पड़ गया। उस अवस्थामें वे रथसे कूदकर शीघ्र ही उस महायुद्धमें लक्ष्मणके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ २६-२७ ॥ सात्यकिः कृतवर्माणं वारयित्वा महारणे । शरैर्बहुविधै राजन्नाससाद पितामहम् ॥ २८ ॥ राजन्! दूसरी ओर उस महायुद्धमें सात्यकिने कृतवर्माको रोककर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए पितामह भीष्मपर धावा किया ॥ २८ ॥ स विद्ध्वा भारतं षष्ट्या निशितैर्लोमवाहिभिः । नृत्यन्निव रथोपस्थे विधुन्वानो महद् धनुः ॥ २९ ॥ उन्होंने अपने विशाल धनुषकी टंकार फैलाते तथा रथकी बैठकमें नृत्य करते हुए-से पंखयुक्त साठ तीखे बाणोंद्वारा भरतवंशी पितामह भीष्मको घायल कर दिया ॥ २९ ॥ तस्यायसीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः । हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम् ॥ ३० ॥ पितामहने सात्यकिपर लोहेकी बनी हुई एक विशाल शक्ति चलायी, जो सुवर्णजटित, अत्यन्त वेगशालिनी तथा सर्पिणीके समान आकारवाली एवं सुन्दर थी ॥ ३० ॥ तामापतन्तीं सहसा मृत्युकल्पां सुदुर्जयाम् ।