महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2188, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगदाभिर्भिन्दिपालैश्च निशितैश्च शिलीमुखैः । अनुकर्षैरूपासङ्गैश्चक्रैर्भग्नैश्च मारिष ॥ २३ ॥ बाहुभिः कार्मुकैः खड्गैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । तलत्रैरङ्गुलित्रैश्च ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥ २४ ॥ चापैश्च बहुधा छिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी । माननीय प्रजानाथ! वरूथोंसहित टूटे हुए रथ, मारे गये रथी, कटे हुए बाण, कवच, पट्टिश, गदा, भिन्दिपाल, तीखे सायक, छिन्न-भिन्न हुए अनुकर्ष, उपासंग, पहिये, कटी हुई बाँह, धनुष, खड्ग, कुण्डलोंसहित मस्तक, तलत्राण, अंगुलित्राण, गिराये गये ध्वज और अनेक टुकड़ोंमें कटकर गिरे हुए चाप—इन सबके द्वारा वहाँकी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥ २२—२४ १/२ ॥
हतारोहा गजा राजन् हयाश्च हतसादिनः ॥ २५ ॥ न्यपतन्त गतप्राणाः शतशोऽथ सहस्रशः । राजन्! जिनके सवार मार दिये गये थे, ऐसे हाथी और घोड़े सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें निष्प्राण होकर पड़े थे॥ २५ १/२ ॥
यतमानाश्च ते वीरा द्रवमाणान् महारथान् ॥ २६ ॥ नाशक्नुवन् वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् । पाण्डव वीर बहुत प्रयत्न करनेपर भी भीष्मके बाणोंसे पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोक नहीं पा रहे थे॥ २६ १/२ ॥
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः ॥ २७ ॥ अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावतः । महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मजीके द्वारा मारी जाती हुई उस विशाल सेनामें भगदड़ मच गयी थी। दो आदमी भी एक साथ नहीं भागते थे॥ २७ १/२ ॥
आविद्धरथनागाश्वं पतितध्वजसंकुलम् ॥ २८ ॥ अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् । पाण्डवोंकी सेना अचेत-सी होकर हाहाकार कर रही थी। उसके रथ, हाथी और घोड़े बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। ध्वजाएँ कटकर धराशायी हो गयी थीं॥ २८ १/२ ॥
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ॥ २९ ॥ प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात् कृतः । उस भीषण मार-काटमें दैवसे प्रेरित होकर पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको और मित्रने प्यारे मित्रको मार डाला॥ २९ १/२ ॥
विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३० ॥ प्रकीर्य केशान् धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ।