भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2186

सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ॥ ७ ॥ अभीषाहाः शूरसेनाः शिवयोऽथ वसातयः । संग्रामे नाजहुर्भीष्मं वध्यमानाः शितैः शरैः ॥ ८ ॥ सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति देशके योद्धा शत्रुओंके तीखे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी संग्रामभूमिमें भीष्मको छोड़कर नहीं भागे ॥ ७-८ ॥ तथैवान्ये महीपाला नानादेशसमागताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त विविधायुधपाणयः ॥ ९ ॥ इसी प्रकार विभिन्न देशोंसे आये हुए अन्य भूपाल भी हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये पाण्डवोंपर आक्रमण करने लगे ॥ ९ ॥ तथैव पाण्डवा राजन् परिवव्रुः पितामहम् । स समन्तात् परिवृतो रथौघैरपराजितः ॥ १० ॥ गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः प्रजज्वाल दहन् परान् । राजन्! पाण्डवोंने भी पितामह भीष्मको घेर लिया। चारों ओरसे रथसमूहोंद्वारा घिरे हुए अपराजित वीर भीष्म गहन वनमें लगायी हुई आगके समान शत्रुओंको दग्ध करते हुए प्रज्वलित हो उठे ॥ १० १/२ ॥ रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगदेन्धनः ॥ ११ ॥ शरस्फुलिङ्गो भीष्माग्निर्ददाह क्षत्रियर्षभान् । रथ ही उनके लिये अग्निशालाके समान था, धनुष ज्वालाओंके समान प्रकाशित होता था, खड्ग, शक्ति और गदा आदि अस्त्र-शस्त्र समिधाका काम कर रहे थे। बाण चिनगारियोंके समान थे। इस प्रकार भीष्मरूपी अग्नि वहाँ क्षत्रियशिरोमणियोंको दग्ध करने लगी ॥ ११ १/२ ॥ सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्गार्ध्रपक्षैः सुतेजनैः ॥ १२ ॥ कर्णिनालीकनाराचैश्छादयामास तद् बलम् । अपातयद् ध्वजांश्चैव रथिनश्च शितैः शरैः ॥ १३ ॥ उन्होंने स्वर्णभूषित गृध्रपंखयुक्त तेज बाणों तथा कर्णी, नालीक और नाराचोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनाको आच्छादित कर दिया। तीखे बाणोंसे ध्वजोंको काट डाला और रथियोंको भी मार गिराया ॥ १२-१३ ॥ मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् । निर्मनुष्यान् रथान् राजन् गजानश्वांश्च संयुगे ॥ १४ ॥ अकरोत् स महाबाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।