महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2190, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'प्रभो! अवध्य महापुरुषोंका वध करके नरकसे भी बढ़कर निन्दनीय राज्य प्राप्त करूँ अथवा वनवासमें रहकर कष्ट भोगूँ—इन दोनोंमें कौन मेरे लिये पुण्य-दायक होगा? ।। ३८ ½ ।।
चोदयाश्वान् यतो भीष्मः करिष्ये वचनं तव ।। ३९ ।। पातयिष्यामि दुर्धर्षं भीष्मं कुरुपितामहम् । 'अच्छा, जहाँ भीष्म हैं, उसी ओर घोड़ोंको बढ़ाइये। आज मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। कुरुकुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको मार गिराऊँगा' ।। ३९ ½ ।।
स चाश्वान् रजतप्रख्यांश्चोदयामास माधवः ।। ४० ।। यतो भीष्मस्ततो राजन् दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव । राजन्! तब भगवान् श्रीकृष्णने चाँदीके समान श्वेत वर्णवाले घोड़ोंको उसी ओर हाँका, जहाँ अंशुमाली सूर्यके समान दुर्निरीक्ष्य भीष्म युद्ध कर रहे थे ।। ४० ½ ।।
ततस्तत् पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत् ।। ४१ ।। दृष्ट्वा पार्थं महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे । महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनको भीष्मके साथ युद्ध करनेके लिये उद्यत देख युधिष्ठिरकी वह भागती हुई विशाल सेना पुनः लौट आयी ।। ४१ ½ ।।
ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठः सिंहवद् विनदन् मुहुः ।। ४२ ।। धनंजयरथं शीघ्रं शरवर्षैरवाकिरत् । तब बारंबार सिंहनाद करते हुए कुरुश्रेष्ठ भीष्मने धनंजयके रथपर शीघ्र ही बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ४२ ½ ।।
क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः ।। ४३ ।। शरवर्षेण महता न प्राज्ञायत भारत । भारत! एक ही क्षणमें बाणोंकी उस भारी वर्षाके कारण सारथि और घोड़ोंसहित उनका वह रथ ऐसा अदृश्य हो गया कि उसका कुछ पता ही नहीं चलता था ।। ४३ ½ ।।
वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्वरः ।। ४४ ।। चोदयामास तानश्वान् विनुन्नान् भीष्मसायकैः । भगवान् श्रीकृष्ण बिना किसी घबराहटके धैर्य धारणकर भीष्मके सायकोंसे क्षत-विक्षत हुए उन घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँक रहे थे ।। ४४ ½ ।।
ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् ।। ४५ ।। पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा शितैः शरैः । तब कुन्तीकुमारने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीखे बाणोंद्वारा भीष्मके धनुषको काट गिराया ।। ४५ ½ ।।
स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद् धनुः ।। ४६ ।। निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ।