महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1941, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंको संताप देनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे आचार्यका पुत्र है, द्रोणका लाड़ला बेटा है तथा ब्राह्मण होनेके कारण भी विशेषरूपसे मेरे लिये माननीय है; आचार्यपुत्रपर कृपा की ॥ १४-१५ ॥ द्रौणिं त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेयः श्वेतवाहनः । युयुधे तावकान् निघ्नंस्त्वरमाणः पराक्रमी ॥ १६ ॥ तदनन्तर श्वेत घोड़ोंवाले कुन्तीकुमार पराक्रमी अर्जुनने अश्वत्थामाको वहीं युद्धस्थलमें छोड़कर बड़ी उतावलीके साथ आपके दूसरे सैनिकोंका संहार करते हुए उनके साथ युद्ध आरम्भ किया ॥ १६ ॥ दुर्योधनस्तु दशभिर्गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । भीमसेनं महेष्वासं रुक्मपुङ्खैः समर्पयत् ॥ १७ ॥ दुर्योधनने शान चढ़ाकर तेज किये हुए गृध्र-पंखयुक्त अथवा सुवर्णमय पंखवाले दस बाण मारकर महाधनुर्धर भीमसेनको बड़ी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥ भीमसेनः सुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् । चित्रं कार्मुकमादत्त शरांश्च निशितान् दश ॥ १८ ॥ आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । अविध्यत् तूर्णमव्यग्रः कुरुराजं महोरसि ॥ १९ ॥ इससे भीमसेन अत्यन्त क्रोधसे जल उठे। उन्होंने एक विचित्र धनुष हाथमें लिया, जो अत्यन्त सुदृढ़ और शत्रुओंके प्राण लेनेमें समर्थ था। उसके ऊपर उन्होंने दस तीखे बाण रखे; फिर धनुषको कानतक खींचकर वे बाण छोड़ दिये। उन सीधे जानेवाले वेगवान् एवं तीक्ष्ण बाणोंद्वारा भीमने बिना किसी व्यग्रताके तुरंत ही कुरुराज दुर्योधनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ तस्य काञ्चनसूत्रस्थः शरैः संछादितो मणिः । रराजोरसि खे सूर्यो ग्रहैरिव समावृतः ॥ २० ॥ दुर्योधनकी छातीपर एक मणि शोभा पाती थी, जो सुवर्णमय सूत्रमें पिरोयी हुई थी। वह भीमसेनके बाणोंसे आच्छादित होकर वैसे ही शोभा पाने लगी, जैसे आकाशमें ग्रहोंसे घिरे हुये सूर्य सुशोभित होते हैं ॥ २० ॥ पुत्रस्तु तव तेजस्वी भीमसेनेन ताडितः । नामृष्यत यथा नागस्तलशब्दं मदोत्कटः ॥ २१ ॥ भीमसेनके बाणोंसे पीड़ित होकर आपका तेजस्वी पुत्र उनके द्वारा किये गये आघातको उसी प्रकार नहीं सह सका, जैसे मतवाला हाथी तालीकी आवाज नहीं सहन करता है ॥ २१ ॥