महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्वावसुः सुजानुश्च मैत्रेयः शुनको बली ॥ बको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनस्तथा । आयोदधौम्यो धौम्यश्च अणीमाण्डव्यकौशिकौ ॥ दामोष्णीषस्त्रिश्रवणः पर्णादो घटजानुकः । मौज्जायनो वायुभक्षः पाराशर्योऽथ शालिकः ॥ शीलवानशनिर्धाता शून्यपालोऽकृतव्रणः । श्वेतकेतुः कहोलश्च रामश्चैव महातपाः ॥ ) (नारदजीके अतिरिक्त जो महर्षि वहाँ उपस्थित थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—) अधःशिरा, सर्पमाली, महर्षि देवल, अर्वावसु, सुजानु, मैत्रेय, शुनक, बली, दल्भपुत्र बक, स्थूलशिरा, पराशरनन्दन श्रीकृष्णद्वैपायन, आयोदधौम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष त्रिश्रवण, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, शालिक, शीलवान्, अशनि, धाता, शून्यपाल, अकृतव्रण, श्वेतकेतु, कहोल एवं महातपस्वी परशुराम। तमब्रवीज्जामदग्न्य उपेत्य मधुसूदनम् । परिष्वज्य च गोविन्दं सुरासुरपतेः सखा ॥ ६५ ॥ उस समय देवराज तथा दैत्यराजके भी सखा जमदग्निनन्दन परशुरामने मधुसूदन श्रीकृष्णके पास जाकर उन्हें हृदयसे लगाया और इस प्रकार कहा— ॥ ६५ ॥ देवर्षयः पुण्यकृतो ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । राजर्षयश्च दाशार्ह मानयन्तस्तपस्विनः । देवासुरस्य द्रष्टारः पुराणस्य महामते ॥ ६६ ॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं दिदृक्षन्तश्च सर्वतः । सभासदश्च राजानस्त्वां च सत्यं जनार्दनम् ॥ ६७ ॥ एतन्महत् प्रेक्षणीयं द्रष्टुं गच्छाम केशव । धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव ॥ ६८ ॥ त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परंतप । 'महामते केशव! जिन्होंने पुरातन देवासुरसंग्रामको भी अपनी आँखोंसे देखा है, वे पुण्यात्मा देवर्षिगण, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् ब्रह्मर्षिगण तथा आपका सम्मान करनेवाले तपस्वी राजर्षिगण सम्पूर्ण दिशाओंसे एकत्र हुए भूमण्डलके क्षत्रियनरेशोंको, सभामें बैठे हुए भूपालों-को तथा सत्यस्वरूप आप भगवान् जनार्दनको देखना चाहते हैं। इस परम दर्शनीय वस्तुका दर्शन करनेके लिये ही हम हस्तिनापुरमें चल रहे हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले माधव! वहाँ कौरवों तथा अन्य राजाओंकी मण्डलीमें आपके द्वारा कही जानेवाली धर्म और अर्थसे युक्त बातोंको हम सुनना चाहते हैं ॥ ६६—६८ ½ ॥ भीष्मद्रोणादयश्चैव विदुरश्च महामतिः ॥ ६९ ॥ त्वं च यादवशार्दूल सभायां वै समेष्यथ ।