Skip to content
BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages
Page 1676Permalink

४. भगवान्‌के इस प्रश्नका अभिप्राय यह है कि मेरा यह उपदेश बड़ा ही दुर्लभ है, मैं हरेक मनुष्यके सामने 'मैं ही साक्षात् परमेश्वर हूँ, तू मेरी ही शरणमें आ जा' इत्यादि बातें नहीं कह सकता; इसलिये तुमने मेरे उपदेशको भलीभाँति ध्यानपूर्वक सुन तो लिया है न? क्योंकि यदि कहीं तुमने उसपर ध्यान न दिया होगा तो तुमने निःसंदेह बड़ी भूल की है।

५. भगवान्‌के इस प्रश्नका भाव यह है कि जिस मोहसे युक्त होकर तुम धर्मके विषयमें अपनेको मूढ़चेता बतला रहे थे (गीता २।७) तथा अपने स्वधर्मका पालन करनेमें पाप समझ रहे थे (गीता १।३६ से ३९) और समस्त कर्तव्यकर्मोंका त्याग करके भिक्षाके अन्नसे जीवन बिताना श्रेष्ठ समझ रहे थे (गीता २।५) एवं जिसके कारण तुम स्वजन-वधके भयसे व्याकुल हो रहे थे (गीता १।४५—४७) और अपने कर्तव्यका निश्चय नहीं कर पाते थे (गीता २।६-७)—तुम्हारा वह अज्ञानजनित मोह अब नष्ट हो गया या नहीं? यदि मेरे उपदेशको तुमने ध्यानपूर्वक सुना होगा तो अवश्य ही तुम्हारा मोह नष्ट हो जाना चाहिये और यदि तुम्हारा मोह नष्ट नहीं हुआ है तो यही मानना पड़ेगा कि तुमने उस उपदेशको एकाग्रचित्तसे नहीं सुना।

यहाँ भगवान्‌के इन दोनों प्रश्नोंमें यह उपदेश भरा हुआ है कि मनुष्यको इस गीताशास्त्रका अध्ययन और श्रवण बड़ी सावधानीके साथ एकाग्रचित्तसे तत्पर होकर करना चाहिये और जबतक अज्ञानजनित मोहका सर्वथा नाश न हो जाय, तबतक यह समझना चाहिये कि अभीतक मैं भगवान्‌के उपदेशको यथार्थ नहीं समझ सका हूँ, अतः पुनः उसपर श्रद्धा और विवेकपूर्वक विचार करना आवश्यक है।

६. अर्जुनके कहनेका अभिप्राय यह है कि आपने यह दिव्य उपदेश सुनाकर मुझपर बड़ी भारी दया की है, आपके उपदेशको सुननेसे मेरा अज्ञानजनित मोह सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात् आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपको यथार्थ न जाननेके कारण जिस मोहसे व्याप्त होकर मैं आपकी आज्ञाको माननेके लिये तैयार नहीं होता था (गीता २।९) और बन्धु-बान्धवोंके विनाशका भय करके शोकसे व्याकुल हो रहा था (गीता १।२८ से ४७ तक)—वह सब मोह अब सर्वथा नष्ट हो गया है तथा मुझे आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपकी पूर्ण स्मृति प्राप्त हो गयी है और आपका समग्र रूप मेरे प्रत्यक्ष हो गया है—मुझे कुछ भी अज्ञात नहीं रहा है। अब आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार स्वरूपके विषयमें तथा धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य आदिके विषयमें मुझे किंचिन्मात्र भी संशय नहीं रहा है। आपकी दयासे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, मेरे लिये अब कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा; अतएव आपके कथनानुसार लोकसंग्रहके लिये युद्धादि समस्त कर्म जैसे आप करवायेंगे, निमित्तमात्र बनकर लीलारूपसे मैं वैसे ही करूँगा।

१. संजयके कथनका यह भाव है कि साक्षात् नर-ऋषिके अवतार महात्मा अर्जुनके पूछनेपर सबके हृदयमें निवास करनेवाले सर्वव्यापी परमेश्वर श्रीकृष्णके द्वारा यह उपदेश दिया गया है, इस कारण यह बड़े ही महत्त्वका है तथा यह उपदेश बड़ा ही आश्चर्यजनक और असाधारण है; इससे मनुष्यको भगवान्‌के दिव्य अलौकिक गुण, प्रभाव और ऐश्वर्ययुक्त समग्ररूपका पूर्ण ज्ञान हो जाता है तथा मनुष्य इसे जैसे-जैसे सुनता और समझता है, वैसे-ही-वैसे हर्ष और आश्चर्यके कारण उसका शरीर पुलकित हो जाता है, उसके समस्त शरीरमें रोमांच हो जाता है।

२. संजयके कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान् व्यासजीने दया करके जो मुझे दिव्य दृष्टि अर्थात् दूर देशमें होनेवाली समस्त घटनाओंको देखने, सुनने और समझने आदिकी अद्भुत शक्ति प्रदान की है, उसीके कारण आज मुझे भगवान्‌का यह दिव्य उपदेश सुननेके लिये मिला; नहीं तो मुझे ऐसा सुयोग कैसे मिलता!

३. भगवान्‌की प्राप्तिके उपायभूत कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग आदि साधनोंका इसमें भलीभाँति वर्णन किया गया है तथा वह स्वयं भी अर्थात् श्रद्धापूर्वक इसका पाठ भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन होनेसे योगरूप ही है।

४. संजयके कथनका यह भाव है कि भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिव्य संवादरूप यह गीताशास्त्र अध्ययन, अध्यापन, श्रवण, मनन और वर्णन आदि करनेवाले मनुष्यको परम पवित्र करके उसका सब प्रकारसे कल्याण करनेवाला तथा भगवान्‌के आश्चर्यमय गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य, तत्त्व, रहस्य और स्वरूपको बतानेवाला है; अतः यह अत्यन्त ही पवित्र, दिव्य एवं अलौकिक है। इस उपदेशने मेरे हृदयको इतना आकर्षित कर लिया है कि अब मुझे दूसरी कोई बात ही अच्छी नहीं लगती; मेरे मनमें बार-बार उस उपदेशकी स्मृति हो रही है और उन भावोंके आवेशमें मैं असीम हर्षका अनुभव कर रहा हूँ, प्रेम और हर्षके कारण विह्वल हो रहा हूँ।

Page 1677Permalink

५. भगवान् श्रीकृष्णके गुण, प्रभाव, लीला, ऐश्वर्य, महिमा, नाम और स्वरूपका श्रवण, मनन, कीर्तन, दर्शन और स्पर्श आदिके द्वारा उनके साथ किसी प्रकारका भी सम्बन्ध हो जानेसे वे मनुष्यके समस्त पापोंको, अज्ञानको और दुःखको हरण कर लेते हैं तथा वे अपने भक्तोंके मनको चुरानेवाले हैं; इसलिये उन्हें 'हरि' कहते हैं।

६. जिस अत्यन्त आश्चर्यमय दिव्य विश्वरूपका भगवान्‌ने अर्जुनको दर्शन कराया था और जिसके दर्शनका महत्त्व भगवान्‌ने ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकोंमें स्वयं बतलाया है, उसी विराट् स्वरूपको लक्ष्य करके संजय यह कह रहे हैं कि भगवान्‌का वह रूप मेरे चित्तसे उतरता ही नहीं, उसे मैं बार-बार स्मरण करता रहता हूँ और मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि भगवान्‌के अतिशय दुर्लभ उस दिव्य रूपका दर्शन मुझे कैसे हो गया! मेरा तो ऐसा कुछ भी पुण्य नहीं था, जिससे मुझे ऐसे रूपके दर्शन हो सकते। अहो! इसमें केवलमात्र भगवान्‌की अहैतुकी दया ही कारण है। साथ ही उस रूपके अत्यन्त अद्भुत दृश्योंको और घटनाओंको याद कर-करके भी मुझे बड़ा आश्चर्य होता है तथा उसे बार-बार याद करके मैं हर्ष और प्रेममें विह्वल भी हो रहा हूँ; मेरे आनन्दका पारावार नहीं है।

३. यहाँ संजयके कहनेका अभिप्राय यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त योगशक्तियोंके स्वामी हैं; वे अपनी योगशक्तिसे क्षणभरमें समस्त जगत्‌की उत्पत्ति, पालन और संहार कर सकते हैं; वे साक्षात् नारायण भगवान् श्रीकृष्ण जिस धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक हैं, उसकी विजयमें क्या शंका है।

इसके सिवा अर्जुन भी नर ऋषिके अवतार, भगवान्‌के प्रिय सखा और गाण्डीव-धनुषके धारण करनेवाले महान् वीर पुरुष हैं; वे भी अपने भाई युधिष्ठिरकी विजयके लिये कटिबद्ध हैं। अतः आज उस युधिष्ठिरकी बराबरी दूसरा कौन कर सकता है; क्योंकि जहाँ सूर्य रहता है, प्रकाश उसके साथ ही रहता है—उसी प्रकार जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण शोभा, सारा ऐश्वर्य और अटल न्याय (धर्म)—ये सब उनके साथ-साथ रहते हैं और जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसीकी विजय होती है। अतः पाण्डवोंकी विजयमें किसी प्रकारकी शंका नहीं है। यदि अब भी तुम अपना कल्याण चाहते हो तो अपने पुत्रोंको समझाकर पाण्डवोंसे संधि कर लो।

(भीष्मवधपर्व)

Page 1678Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

(भीष्मवधपर्व)

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना

वैशम्पायन उवाच

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनिःसृता ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अन्य बहुत-से शास्त्रोंका संग्रह करनेकी क्या आवश्यकता है? गीताका ही अच्छी तरहसे गान (श्रवण, कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण) करना चाहिये; क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवान्‌के साक्षात् मुखकमलसे निकली हुई है ॥ १ ॥

सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः ।
सर्वतीर्थमयी गंगा सर्ववेदमयो मनुः ॥ २ ॥
गीता सर्वशास्त्रमयी है (गीतामें सब शास्त्रोंके सार-तत्त्वका समावेश है)। भगवान् श्रीहरि सर्वदेवमय हैं। गंगा सर्वतीर्थमयी हैं और मनु (उनका धर्मशास्त्र) सर्ववेदमय हैं ॥ २ ॥

गीता गंगा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते ।
चतुर्गकारसंयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ३ ॥
गीता, गंगा, गायत्री और गोविन्द—इन 'ग' कारयुक्त चार नामोंको हृदयमें धारण कर लेनेपर मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता ॥ ३ ॥

षट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः ।
अर्जुनः सप्तपञ्चाशत् सप्तषष्टिं तु संजयः ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ।
इस गीतामें छः सौ बीस श्लोक भगवान् श्रीकृष्णने कहे हैं, सत्तावन श्लोक अर्जुनके कहे हुए हैं, सड़सठ श्लोक संजयने कहे हैं और एक श्लोक धृतराष्ट्रका कहा हुआ है। यह गीताका मान बताया जाता है ॥ ४ १/२ ॥

भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च ।
सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ॥ ५ ॥

Page 1679Permalink

भारतरूपी अमृतराशिके सर्वस्व सारभूत गीताका मन्थन करके उसका सार निकालकर श्रीकृष्णने अर्जुनके मुखमें (कानोंद्वारा मन-बुद्धिमें) डाल दिया है ॥ ५ ॥*

संजय उवाच

ततो धनंजयं दृष्ट्वा बाणगाण्डीवधारिणम् । पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथाः ॥ ६ ॥ पाण्डवाः सोमकाश्चैव ये चैषामनुयायिनः । दध्मुश्च मुदिताः शङ्खान् वीराः सागरसम्भवान् ॥ ७ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर अर्जुनको गाण्डीव धनुष और बाण धारण किये देख पाण्डव महारथियों, सोमकों तथा उनके अनुगामी सैनिकोंने पुनः बड़े जोरसे सिंहनाद किया। साथ ही उन सभी वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक समुद्रसे प्रकट होनेवाले शंखोंको बजाया ॥ ६-७ ॥

ततो भेर्यश्च पेश्यश्च क्रकचा गोविषाणिकाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त ततः शब्दो महानभूत् ॥ ८ ॥ तदनन्तर भेरी, पेशी, क्रकच और नरसिंहे आदि बाजे सहसा बज उठे। इससे वहाँ महान् शब्द गूँजने लगा ॥ ८ ॥

तथा देवाः सगन्धर्वाः पितरश्च जनाधिप । सिद्धचारणसंघाश्च समीयुस्ते दिदृक्षया ॥ ९ ॥ ऋषयश्च महाभागाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् । समीयुस्तत्र सहिता द्रष्टुं तद् वैशसं महत् ॥ १० ॥ नरेश्वर! उस समय देवता, गन्धर्व, पितर, सिद्ध, चारण तथा महाभाग महर्षिगण देवराज इन्द्रको आगे करके उस भीषण मार-काटको देखनेके लिये एक साथ वहाँ आये ॥ ९-१० ॥

ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचल‍िते नृप ॥ ११ ॥ विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् । अवरुह्य रथात् क्षिप्रं पद्भ्यामेव कृतांजलिः ॥ १२ ॥ पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । वाग्यतः प्रययौ येन प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥ १३ ॥ राजन्! तदनन्तर वीर राजा युधिष्ठिरने समुद्रके समान उन दोनों सेनाओंको युद्धके लिये उपस्थित और चंचल हुई देख कवच खोलकर अपने उत्तम आयुधोंको नीचे डाल दिया और रथसे शीघ्र उतरकर वे पैदल ही हाथ जोड़े पितामह भीष्मको लक्ष्य करके चल दिये। धर्मराज युधिष्ठिर मौन एवं पूर्वाभिमुख हो शत्रुसेनाकी ओर चले गये ॥ ११—१३ ॥

Page 1680Permalink

तं प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अवतीर्य रथात् तूर्णं भ्रातृभिः सहितोऽन्वयात् ॥ १४ ॥ वासुदेवश्च भगवान् पृष्ठतोऽनुजगाम तम् । तथा मुख्याश्च राजानस्तच्चित्ता जग्मुरुत्सुकाः ॥ १५ ॥ कुन्तीपुत्र धनंजय उन्हें शत्रु-सेनाकी ओर जाते देख तुरंत रथसे उतर पड़े और भाइयोंसहित उनके पीछे-पीछे जाने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके पीछे गये तथा उन्हींमें चित्त लगाये रहनेवाले प्रधान-प्रधान राजा भी उत्सुक होकर उनके साथ गये ॥ १४-१५ ॥

अर्जुन उवाच किं ते व्यवसितं राजन् यदस्मानपहाय वै । पद्भ्यामेव प्रयातोऽसि प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥ १६ ॥ अर्जुनने पूछा—राजन्! आपने क्या निश्चय किया है कि हमलोगोंको छोड़कर आप पूर्वाभिमुख हो पैदल ही शत्रुसेनाकी ओर चल दिये हैं? ॥ १६ ॥

भीमसेन उवाच क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचायुधः । दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातृनुत्सृज्य पार्थिव ॥ १७ ॥ भीमसेनने पूछा—महाराज! पृथ्वीनाथ! कवच और आयुध नीचे डालकर भाइयोंको भी छोड़कर कवच आदिसे सुसज्जित हुई शत्रु-सेनामें कहाँ जायँगे? ॥ १७ ॥

नकुल उवाच एवं गते त्वयि ज्येष्ठे मम भ्रातरि भारत । भीर्मे दुनोति हृदयं ब्रूहि गन्ता भवान् क्व नु ॥ १८ ॥ नकुलने पूछा—भारत! आप मेरे बड़े भाई हैं। आपके इस प्रकार शत्रुसेनाकी ओर चल देनेपर भारी भय मेरे हृदयको पीड़ित कर रहा है। बताइये, आप कहाँ जायँगे? ॥ १८ ॥

सहदेव उवाच अस्मिन् रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये । उत्सृज्य क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृप ॥ १९ ॥ सहदेवने पूछा—नरेश्वर! इस रणक्षेत्रमें जहाँ शत्रु-सेनाका समूह जुटा हुआ है और महान् भय उपस्थित है, आप हमें छोड़कर शत्रुओंकी ओर कहाँ जायँगे? ॥ १९ ॥

संजय उवाच एवमाभाष्यमाणोऽपि भ्रातृभिः कुरुनन्दनः ।

Page 1681Permalink

नोवाच वाग्यतः किंचिद् गच्छत्येव युधिष्ठिरः ॥ २० ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भाइयोंके इस प्रकार कहनेपर भी कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा युधिष्ठिर उनसे कुछ नहीं बोले। चुपचाप चलते ही गये ॥ २० ॥
तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामनाः ।
अभिप्रायोऽस्य विज्ञातो मयेति प्रहसन्निव ॥ २१ ॥
तब परम बुद्धिमान् महामना भगवान् वासुदेवने उन चारों भाइयोंसे हँसते हुए-से कहा—'इनका अभिप्राय मुझे ज्ञात हो गया है ॥ २१ ॥
एष भीष्मं तथा द्रोणं गौतमं शल्यमेव च ।
अनुमान्य गुरून् सर्वान् योत्स्यते पार्थिवोऽरिभिः ॥ २२ ॥
'ये राजा युधिष्ठिर भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और शल्य—इन समस्त गुरुजनोंसे आज्ञा लेकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ॥ २२ ॥
श्रूयते हि पुराकल्पे गुरूनननुमान्य यः ।
युध्यते स भवेद् व्यक्तमपध्यातो महत्तरैः ॥ २३ ॥
'सुना जाता है कि प्राचीन कालमें जो गुरुजनोंकी अनुमति लिये बिना ही युद्ध करता था, वह निश्चय ही उन माननीय पुरुषोंकी दृष्टिमें गिर जाता था ॥ २३ ॥
अनुमान्य यथाशास्त्रं यस्तु युध्येन्महत्तरैः ।
ध्रुवस्तस्य जयो युद्धे भवेदिति मतिर्मम ॥ २४ ॥
'जो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार माननीय पुरुषोंसे आज्ञा लेकर युद्ध करता है, उसकी उस युद्धमें अवश्य विजय होती है, ऐसा मेरा विश्वास है' ॥ २४ ॥
एवं ब्रुवति कृष्णेऽत्र धार्तराष्ट्रचमूं प्रति ।
(नेत्रैरनिमिषैः सर्वैः प्रेक्षन्ते स्म युधिष्ठिरम् ॥)
हाहाकारो महानासीन्निःशब्दास्त्वपरेऽभवन् ॥ २५ ॥
जब भगवान् श्रीकृष्ण ये बातें कह रहे थे, उस समय दुर्योधनकी सेनाकी ओर आते हुए युधिष्ठिरको सब लोग अपलक नेत्रोंसे देख रहे थे। कहीं महान् हाहाकार हो रहा था और कहीं दूसरे लोग मुँहसे एक शब्द भी न बोलकर चुप हो गये थे ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं दूराद् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकाः ।
मिथः संकथयाञ्चक्रुरेषो हि कुलपांसनः ॥ २६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1682)

Page 1682Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

श्रीकृष्ण एवं भाइयोंसहित युधिष्ठिरका भीष्मको प्रणाम करके उनसे युद्धके लिये आज्ञा माँगना

Page 1683Permalink

युधिष्ठिरको दूरसे ही देखकर दुर्योधनके सैनिक आपसमें इस प्रकार बातचीत करने लगे—'यह युधिष्ठिर तो अपने कुलका जीता-जागता कलंक ही है ॥ २६ ॥ व्यक्तं भीत इवाभ्येति राजासौ भीष्ममन्तिकम् । युधिष्ठिरः ससोदर्यः शरणार्थं प्रयाचकः ॥ २७ ॥ 'देखो, स्पष्ट ही दिखायी दे रहा है कि वह राजा युधिष्ठिर भयभीतकी भाँति भाइयोंसहित भीष्मजीके निकट शरण माँगनेके लिये आ रहा है ॥ २७ ॥ धनंजये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे । नकुले सहदेवे च भीतिरभ्येति पाण्डवम् ॥ २८ ॥ 'पाण्डुनन्दन धनंजय, वृकोदर भीम तथा नकुल-सहदेव-जैसे सहायकोंके रहते हुए युधिष्ठिरके मनमें भय कैसे हो गया! ॥ २८ ॥ न नूनं क्षत्रियकुले जातः सम्प्रथिते भुवि । यथास्य हृदयं भीतमल्पसत्त्वस्य संयुगे ॥ २९ ॥ 'निश्चय ही यह भूमण्डलमें विख्यात क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न नहीं हुआ है। इसका मानसिक बल अत्यन्त अल्प है; इसीलिये युद्धके अवसरपर इसका हृदय इतना भयभीत है' ॥ २९ ॥ ततस्ते सैनिकाः सर्वे प्रशंसन्ति स्म कौरवान् । हृष्टाः सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुश्च ह ॥ ३० ॥ तदनन्तर वे सब सैनिक कौरवोंकी प्रशंसा करने लगे और प्रसन्नचित्त हो हर्षमें भरकर अपने कपड़े हिलाने लगे ॥ ३० ॥ व्यनिन्दंश्च तथा सर्वे योधास्तव विशाम्पते । युधिष्ठिरं ससोदर्यं सहितं केशवेन हि ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! आपके वे सब योद्धा भाइयों तथा श्रीकृष्णसहित युधिष्ठिरकी विशेषरूपसे निन्दा करते थे ॥ ३१ ॥ ततस्तत् कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्ठिरम् । निःशब्दमभवत् तूर्णं पुनरेव विशाम्पते ॥ ३२ ॥ राजन्! इस प्रकार युधिष्ठिरको धिक्कार देकर सारी कौरव-सेना पुनः शीघ्र ही चुप हो गयी ॥ ३२ ॥ किं नु वक्ष्यति राजासौ किं भीष्मः प्रतिवक्ष्यति । किं भीमः समरश्लाघी किं नु कृष्णार्जुनाविति ॥ ३३ ॥ सब लोग मन-ही-मन सोचने लगे कि वह राजा क्या कहेगा और भीष्मजी क्या उत्तर देंगे? युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीमसेन तथा श्रीकृष्ण और अर्जुन भी क्या कहेंगे? ॥ ३३ ॥ विवक्षितं किमस्येति संशयः सुमहानभूत् ।

Page 1684Permalink

उभयोः सेनयो राजन् युधिष्ठिरकृते तदा ॥ ३४ ॥
राजन्! दोनों ही सेनाओंमें युधिष्ठिरके विषयमें महान् संशय उत्पन्न हो गया था। सब सोचते थे कि राजा युधिष्ठिर क्या कहना चाहते हैं ॥ ३४ ॥
सोऽवगाह्य चमूं शत्रोः शरशक्तिसमाकुलाम् ।
भीष्ममेवाभ्ययात् तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ३५ ॥
बाण और शक्तियोंसे भरी हुई शत्रु की सेनामें घुसकर भाइयोंसे घिरे हुए युधिष्ठिर तुरंत ही भीष्मजीके पास जा पहुँचे ॥ ३५ ॥
तमुवाच ततः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डवः ।
भीष्मं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ३६ ॥
वहाँ जाकर उन पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने दोनों हाथोंसे पितामहके चरणोंको दबाया और युद्धके लिये उपस्थित हुए उन शान्तनुनन्दन भीष्मसे इस प्रकार कहा ॥ ३६ ॥

युधिष्ठिर उवाच
आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष त्वया योत्स्यामहे सह ।
अनुजानीहि मां तात आशिषश्च प्रयोजय ॥ ३७ ॥

Page 1685Permalink

युधिष्ठिर बोले—दुर्धर्ष वीर पितामह! मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ, मुझे आपके साथ युद्ध करना है। तात! इसके लिये आप मुझे आज्ञा और आशीर्वाद प्रदान करें ॥ ३७ ॥

भीष्म उवाच

यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते ।
शपेयं त्वां महाराज पराभावाय भारत ॥ ३८ ॥
भीष्मजी बोले—पृथिवीपते! भरतकुलनन्दन! महाराज! यदि इस युद्धके समय तुम इस प्रकार मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हें पराजित होनेके लिये शाप दे देता ॥ ३८ ॥
प्रीतोऽहं पुत्र युध्यस्व जयमाप्नुहि पाण्डव ।
यत् तेऽभिलषितं चान्यत् तदवाप्नुहि संयुगे ॥ ३९ ॥
पाण्डुनन्दन! पुत्र! अब मैं प्रसन्न हूँ और तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम युद्ध करो और विजय पाओ। इसके सिवा और भी जो तुम्हारी अभिलाषा हो, वह इस युद्धभूमिमें प्राप्त करो ॥ ३९ ॥
व्रियतां च वरः पार्थ किमस्मत्तोऽभिकाङ्क्षसि ।
एवंगते महाराज न तवास्ति पराजयः ॥ ४० ॥
पार्थ! वर माँगो। तुम मुझसे क्या चाहते हो? महाराज! ऐसी स्थितिमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी ॥ ४० ॥
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ४१ ॥
महाराज! पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ ॥ ४१ ॥
अतस्त्वां क्लीबवद् वाक्यं ब्रवीमि कुरुनन्दन ।
भृतोऽस्म्यर्थेन कौरव्य युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ४२ ॥
कुरुनन्दन! इसीलिये आज मैं तुम्हारे सामने नपुंसकके समान वचन बोलता हूँ। कौरव! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने धनके द्वारा मेरा भरण-पोषण किया है; इसलिये (तुम्हारे पक्षमें होकर) उनके साथ युद्ध करनेके अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो, यह बताओ ॥ ४२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मन्त्रयस्व महाबाहो हितैषी मम नित्यशः ।
युध्यस्व कौरवस्यार्थे ममैष सततं वरः ॥ ४३ ॥
युधिष्ठिर बोले—महाबाहो! आप सदा मेरा हित चाहते हुए मुझे अच्छी सलाह दें और दुर्योधनके लिये युद्ध करें। मैं सदाके लिये यही वर चाहता हूँ ॥ ४३ ॥

भीष्म उवाच

Page 1686Permalink

राजन् किमंत्र साह्यं ते करोमि कुरुनन्दन । कामं योत्स्ये परस्यार्थे ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ॥ ४४ ॥ भीष्म बोले— राजन्! कुरुनन्दन! मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? युद्ध तो मैं इच्छानुसार तुम्हारे शत्रुकी ओरसे ही करूँगा; अतः बताओ, तुम क्या कहना चाहते हो? ॥ ४४ ॥

युधिष्ठिर उवाच कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् । एतन्मे मन्त्रय हितं यदि श्रेयः प्रपश्यसि ॥ ४५ ॥ युधिष्ठिर बोले— पितामह! आप तो किसीसे पराजित होनेवाले हैं नहीं, फिर मैं आपको युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? यदि आप मेरा कल्याण देखते और सोचते हैं तो मेरे हितकी सलाह दीजिये ॥ ४५ ॥

भीष्म उवाच नैनं पश्यामि कौन्तेय यो मां युध्यन्तमाहवे । विजयेत पुमान् कश्चित् साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ४६ ॥ भीष्मने कहा— कुन्तीनन्दन! मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो संग्रामभूमिमें युद्ध करते समय मुझे पराजित कर सके। युद्धकालमें कोई पुरुष, साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, मुझे परास्त नहीं कर सकता ॥ ४६ ॥

युधिष्ठिर उवाच हन्त पृच्छामि तस्मात् त्वां पितामह नमोऽस्तु ते । वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मनः समरे परैः ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर बोले— पितामह! आपको नमस्कार है। इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ, आप युद्धमें शत्रुओंद्वारा अपने मारे जानेका उपाय बताइये ॥ ४७ ॥

भीष्म उवाच न स्म तं तात पश्यामि समरे यो जयेत माम् । न तावन्मृत्युकालोऽपि पुनरागमनं कुरु ॥ ४८ ॥ भीष्म बोले— बेटा! जो समरभूमिमें मुझे जीत ले, ऐसे किसी वीरको मैं नहीं देखता हूँ। अभी मेरा मृत्युकाल भी नहीं आया है; अतः अपने इस प्रश्नका उत्तर लेनेके लिये फिर कभी आना ॥ ४८ ॥

संजय उवाच ततो युधिष्ठिरो वाक्यं भीष्मस्य कुरुनन्दन ।

Page 1687Permalink

शिरसा प्रतिजग्राह भूयस्तमभिवाद्य च ॥ ४९ ॥
प्रायात् पुनर्महाबाहुरार्चायस्य रथं प्रति ।
पश्यतां सर्वसैन्यानां मध्येन भ्रातृभिः सह ॥ ५० ॥
स द्रोणमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।
उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनिःश्रेयसं वचः ॥ ५१ ॥
**संजय बोले—**कुरुनन्दन! तदनन्तर महाबाहु युधिष्ठिरने भीष्मकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और पुनः उन्हें प्रणाम करके वे द्रोणाचार्यके रथकी ओर गये। सारी सेना देख रही थी और वे उसके बीचसे होकर भाइयोंसहित द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचे। वहाँ राजाने उन्हें प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और उन दुर्जय वीर-शिरोमणिसे अपने हितकी बात पूछी— ॥ ४९—५१ ॥

आमन्त्रये त्वां भगवन् योत्स्ये विगतकल्मषः ।
कथं जये रिपून् सर्वाननुज्ञातस्त्वया द्विज ॥ ५२ ॥
‘भगवन्! मैं सलाह पूछता हूँ, किस प्रकार आपके साथ निरपराध एवं पापरहित होकर युद्ध करूँगा? विप्रवर! आपकी आज्ञासे मैं समस्त शत्रुओंको किस प्रकार जीतूँ?’ ॥ ५२ ॥
द्रोण उवाच

Page 1688Permalink

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः ।
शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वशः ॥ ५३ ॥
**द्रोणाचार्य बोले—**महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हारी सर्वथा पराजय होनेके लिये तुम्हें शाप दे देता ॥ ५३ ॥
तत् युधिष्ठिर तुष्टोऽस्मि पूजितश्च त्वयानघ ।
अनुजानामि युध्यस्व विजयं समवाप्नुहि ॥ ५४ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुमने मेरा बड़ा आदर किया। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, शत्रुओंसे लड़ो और विजय प्राप्त करो ॥ ५४ ॥
करवाणि च ते कामं ब्रूहि त्वमभिकाङ्क्षितम् ।
एवंगते महाराज युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ५५ ॥
महाराज! मैं तुम्हारी कामना पूर्ण करूँगा। तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ क्या है? वर्तमान परिस्थितिमें मैं तुम्हारी ओरसे युद्ध तो कर नहीं सकता; उसे छोड़कर तुम बताओ, क्या चाहते हो? ॥ ५५ ॥
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ५६ ॥
पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ ॥ ५६ ॥
ब्रवीम्येतत् क्लीबवत् त्वां युद्धादन्यत् किमिच्छसि ।
योत्स्येऽहं कौरवस्यार्थे त्वाशास्यो जयो मया ॥ ५७ ॥
इसीलिये आज नपुंसककी तरह तुमसे पूछता हूँ कि तुम युद्धके सिवा और क्या चाहते हो? मैं दुर्योधनके लिये युद्ध करूँगा; परंतु जीत तुम्हारी ही चाहूँगा ॥ ५७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

जयमाशास्व मे ब्रह्मन् मन्त्रयस्व च मद्धितम् ।
युद्धयस्व कौरवस्यार्थे वर एष वृतो मया ॥ ५८ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**ब्रह्मन्! आप मेरी विजय चाहें और मेरे हितकी सलाह देते रहें; युद्ध दुर्योधनकी ओरसे ही करें। यही वर मैंने आपसे माँगा है ॥ ५८ ॥

द्रोण उवाच

ध्रुवस्ते विजयो राजन् यस्य मन्त्री हरिस्तव ।
अहं त्वामभिजानामि रणे शत्रून् विमोक्ष्यसे ॥ ५९ ॥
**द्रोणाचार्यने कहा—**राजन्! तुम्हारी विजय तो निश्चित है; क्योंकि साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे मन्त्री हैं। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्धमें शत्रुओंको उनके प्राणोंसे विमुक्त कर दोगे ॥ ५९ ॥

Page 1689Permalink

यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः ।
युद्ध्यस्व गच्छ कौन्तेय पृच्छ मां किं ब्रवीमि ते ।। ६० ।।
जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है। कुन्तीकुमार! जाओ, युद्ध करो। और भी पूछो, तुम्हें क्या बताऊँ? ।। ६० ।।

युधिष्ठिर उवाच

पृच्छामि त्वां द्विजश्रेष्ठ शृणु यन्मेऽभिकाङ्क्षितम् ।
कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् ।। ६१ ।।
युधिष्ठिर बोले— द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरे मनोवांछित प्रश्नको सुनिये। आप किसीसे भी परास्त होनेवाले नहीं हैं; फिर आपको मैं युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? ।। ६१ ।।

द्रोण उवाच

न तेऽस्ति विजयस्तावद् यावद् युद्ध्याम्यहं रणे ।
ममाशु निधने राजन् यतस्व सह सोदरैः ।। ६२ ।।
द्रोणाचार्य बोले— राजन्! मैं जबतक समरभूमिमें युद्ध करूँगा, तबतक तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। तुम अपने भाइयोंसहित ऐसा प्रयत्न करो, जिससे शीघ्र मेरी मृत्यु हो जाय ।। ६२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

हन्त तस्मान्महाबाहो वधोपायं वदात्मनः ।
आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमोऽस्तु ते ।। ६३ ।।
युधिष्ठिर बोले— महाबाहु आचार्य! इसलिये अब आप अपने वधका उपाय मुझे बताइये। आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके यह प्रश्न कर रहा हूँ ।। ६३ ।।

द्रोण उवाच

न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद् रथे स्थितम् ।
युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षौघवर्षिणम् ।। ६४ ।।
द्रोणाचार्य बोले— तात! जब मैं रथपर बैठकर कुपित हो बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धमें संलग्न रहूँ, उस समय जो मुझे मार सके, ऐसे किसी शत्रुको नहीं देख रहा हूँ ।। ६४ ।।

ऋते प्रायगतं राजन् न्यस्तशस्त्रमचेतनम् ।
हन्यान्मां युधि योधानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ६५ ।।

Page 1690Permalink

राजन्! जब मैं हथियार डालकर अचेत-सा होकर आमरण अनशनके लिये बैठ जाऊँ, उस अवस्थाको छोड़कर और किसी समय कोई मुझे नहीं मार सकता। उसी अवस्थामें कोई श्रेष्ठ योद्धा युद्धमें मुझे मार सकता है; यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ ।। ६५ ।। शस्त्रं चाहं रणे जह्यां श्रुत्वा तु महदप्रियम् । श्रद्धेयवाक्यात् पुरुषादेतत् सत्यं ब्रवीमि ते ।। ६६ ।। यदि मैं किसी विश्वसनीय पुरुषसे युद्ध-भूमिमें कोई अत्यन्त अप्रिय समाचार सुन लूँ तो हथियार नीचे डाल दूँगा। यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ ।। ६६ ।।

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा महाराज भारद्वाजस्य धीमतः । अनुमान्य तमाचार्यं प्रायाच्छारद्वतं प्रति ।। ६७ ।। **संजय कहते हैं—**महाराज! परम बुद्धिमान् द्रोणाचार्यकी यह बात सुनकर उनका सम्मान करके राजा युधिष्ठिर कृपाचार्यके पास गये ।। ६७ ।। सोऽभिवाद्य कृपं राजा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । उवाच दुर्धर्षतमं वाक्यं वाक्यविदां वरः ।। ६८ ।। उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने दुर्धर्ष वीर कृपाचार्यसे कहा— ।। ६८ ।।

Page 1691Permalink

अनुमानये त्वां योत्स्येऽहं गुरो विगतकल्मषः ।
जयेयं च रिपून् सर्वाननुज्ञातस्त्वयानघ ॥ ६९ ॥
‘निष्पाप गुरुदेव! मैं पापरहित रहकर आपके साथ युद्ध कर सकूँ, इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका आदेश पाकर मैं समस्त शत्रुओंको संग्राममें जीत सकता हूँ’ ॥ ६९ ॥

कृप उवाच

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः ।
शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वशः ॥ ७० ॥
**कृपाचार्य बोले—**महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हारी सर्वथा पराजय होनेके लिये तुम्हें शाप दे देता ॥ ७० ॥
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ७१ ॥
पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ ॥ ७१ ॥

Page 1692Permalink

तेषामर्थे महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः।
अतस्त्वां क्लीबवद् ब्रूयां युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ७२ ॥
महाराज! मैं निश्चय कर चुका हूँ कि मुझे उन्हींके लिये युद्ध करना है; अतः तुमसे नपुंसककी तरह पूछ रहा हूँ कि तुम युद्धसम्बन्धी सहयोगको छोड़कर मुझसे और क्या चाहते हो? ॥ ७२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वचः।
इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतनः ॥ ७३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**आचार्य! इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरी बात सुनिये। इतना कहकर राजा युधिष्ठिर व्यथित और अचेत-से होकर उनसे कुछ भी बोल न सके ॥ ७३ ॥

संजय उवाच

तं गौतमः प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम् ।
अवध्योऽहं महीपाल युद्ध्यस्व जयमाप्नुहि ॥ ७४ ॥
**संजय कहते हैं—**पृथ्वीपते! कृपाचार्य यह समझ गये कि युधिष्ठिर क्या कहना चाहते हैं; अतः उन्होंने उनसे इस प्रकार कहा—'राजन्! मैं अवध्य हूँ। जाओ, युद्ध करो और विजय प्राप्त करो' ॥ ७४ ॥

प्रीतस्तेऽभिगमनेनाहं जयं तव नराधिप ।
आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७५ ॥
'नरेश्वर! तुम्हारे इस आगमनसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; अतः सदा उठकर मैं तुम्हारी विजयके लिये शुभकामना करूँगा। यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ ७५ ॥

एतच्छ्रुत्वा महाराज गौतमस्य विशाम्पते ।
अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट् ॥ ७६ ॥
महाराज! प्रजानाथ! कृपाचार्यकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर उनकी अनुमति ले जहाँ मद्रराज शल्य थे, उस ओर चले गये ॥ ७६ ॥

स शल्यमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।
उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनःश्रेयसं वचः ॥ ७७ ॥
दुर्जय वीर शल्यको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उनसे अपने हितकी बात कही— ॥ ७७ ॥

Page 1693Permalink

अनुमानये त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये विगतकल्मषः । जयेयं नु परान् राजन्ननुज्ञातस्त्वया रिपून् ॥ ७८ ॥ 'दुर्धर्ष वीर! मैं पापरहित एवं निरपराध रहकर आपके साथ युद्ध करूँगा; इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। राजन्! आपकी आज्ञा पाकर मैं समस्त शत्रुओंको युद्धमें परास्त कर सकता हूँ' ॥ ७८ ॥

शल्य उवाच

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय वै रणे ॥ ७९ ॥ **शल्य बोले—**महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं युद्धमें तुम्हारी पराजयके लिये तुम्हें शाप दे देता ॥ ७९ ॥ तुष्टोऽस्मि पूजितश्चास्मि यत् काङ्क्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जयमाप्नुहि ॥ ८० ॥ अब मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुमने मेरा बड़ा सम्मान किया। तुम जो चाहते हो, वह पूर्ण हो। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्ध करो और विजय प्राप्त करो ॥ ८० ॥

Page 1694Permalink

ब्रूहि चैव परं वीर केनार्थः किं ददामि ते ।
एवंगते महाराज युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ८१ ॥
वीर! तुम कुछ और बताओ, किस प्रकार तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा? मैं तुम्हें क्या दूँ? महाराज! इस परिस्थितिमें युद्धविषयक सहयोगको छोड़कर तुम मुझसे और क्या चाहते हो? ॥ ८१ ॥

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ८२ ॥
पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ ॥ ८२ ॥

करिष्यामि हि ते कामं भागिनेय यथेप्सितम् ।
ब्रवीम्यतः क्लीबवत् त्वां युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ८३ ॥
इसलिये मैं तुमसे नपुंसककी भाँति कह रहा हूँ। बताओ, तुम युद्धविषयक सहयोगके सिवा और क्या चाहते हो? मेरे भानजे! मैं तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करूँगा ॥ ८३ ॥

युधिष्ठिर उवाच
मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मद्वितमुत्तमम् ।
कामं युद्ध्य परस्यार्थे वरमेतं वृणोम्यहम् ॥ ८४ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**महाराज! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ कि आप प्रतिदिन उत्तम हितकी सलाह मुझे देते रहें। अपने इच्छानुसार युद्ध दूसरेके लिये करें ॥ ८४ ॥

शल्य उवाच
किमत्र ब्रूहि साह्यं ते करोमि नृपसत्तम ।
कामं योत्स्ये परस्यार्थे बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ८५ ॥
**शल्य बोले—**नृपश्रेष्ठ! बताओ, इस विषयमें मैं तुम्हारी क्या सहायता करूँ? कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ; अतः अपने इच्छानुसार युद्ध तो मैं तुम्हारे विपक्षीकी ओरसे ही करूँगा ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिर उवाच
स एव मे वरः शल्य उद्योगे यस्त्वया कृतः ।
सूतपुत्रस्य संग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया ॥ ८६ ॥
(त्वां हि योक्ष्यति सूतत्वे सूतपुत्रस्य मातुल ।
दुर्योधनो रणे शूरमिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥)
**युधिष्ठिर बोले—**मामाजी! जब युद्धके लिये उद्योग चल रहा था, उन दिनों आपने मुझे जो वर दिया था, वही वर आज भी मेरे लिये आवश्यक है। सूतपुत्रका अर्जुनके साथ युद्ध

Page 1695Permalink

हो तो उस समय आपको उसका उत्साह नष्ट करना चाहिये। मामाजी! मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि उस युद्धमें दुर्योधन आप-जैसे शूरवीरको सूतपुत्रके सारथिका कार्य करनेके लिये अवश्य नियुक्त करेगा॥ ८६॥

शल्य उवाच सम्पत्स्यत्येष ते कामः कुन्तीपुत्र यथेप्सितम्। गच्छ युध्यस्व विश्रब्धः प्रतिजाने वचस्तव॥ ८७॥ **शल्य बोले—**कुन्तीनन्दन! तुम्हारा यह अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। जाओ, निश्चिन्त होकर युद्ध करो। मैं तुम्हारे वचनका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करता हूँ॥ ८७॥

संजय उवाच अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम्। निर्जगाम महासैन्याद् भ्रातृभिः परिवारितः॥ ८८॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने मामा मद्रराज शल्यकी अनुमति लेकर भाइयोंसे घिरे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उस विशाल सेनासे बाहर निकल गये॥ ८८॥

वासुदेवस्तु राधेयमाहवेऽभिजगाम वै। तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः॥ ८९॥ इसी समय भगवान् श्रीकृष्ण उस युद्धमें राधानन्दन कर्णके पास गये। वहाँ जाकर उन गदाग्रजने पाण्डवोंके हितके लिये उससे इस प्रकार कहा—॥ ८९॥

श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात् किल न योत्स्यसे। अस्मान् वरय राधेय यावद् भीष्मो न हन्यते॥ ९०॥ 'कर्ण! मैंने सुना है, तुम भीष्मसे द्वेष होनेके कारण युद्ध नहीं करोगे। राधानन्दन! ऐसी दशामें जबतक भीष्म मारे नहीं जाते हैं, तबतक हमलोगोंका पक्ष ग्रहण कर लो॥ ९०॥

हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम्। धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत् समम्॥ ९१॥ 'राधेय! जब भीष्म मारे जायँ, उसके बाद तुम यदि ठीक समझो तो युद्धमें पुनः दुर्योधनकी सहायताके लिये चले आना'॥ ९१॥

कर्ण उवाच न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव। त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम्॥ ९२॥ **कर्ण बोला—**केशव! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं दुर्योधनका हितैषी हूँ। उसके लिये अपने प्राणोंको निछावर किये बैठा हूँ; अतः मैं उसका अप्रिय कदापि नहीं करूँगा॥ ९२॥