भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

भीष्म और दुर्योधनका संवाद तथा भीष्मके द्वारा लाखों सैनिकोंका संहार

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

भीष्म और दुर्योधनका संवाद तथा भीष्मके द्वारा लाखों सैनिकोंका संहार

धृतराष्ट्र उवाच

कथं शिखण्डी गाङ्गेयमभ्यधावत् पितामहम् ।
पाञ्चाल्यः समरे क्रुद्धो धर्मात्मानं यतव्रतम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! पांचालराजकुमार शिखण्डीने समरभूमिमें कुपित होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मा पितामह गंगानन्दन भीष्मपर किस प्रकार धावा किया? ॥ १ ॥
केऽरक्षन् पाण्डवानीके शिखण्डिनमुदायुधाः ।
त्वरमाणास्त्वराकाले जिगीषन्तो महारथाः ॥ २ ॥
पाण्डवोंकी सेनाके किन-किन वीर महारथियोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर विजयकी अभिलाषासे उस शीघ्रताके समय अपनी शीघ्रकारिताका परिचय देते हुए शिखण्डीका संरक्षण किया? ॥ २ ॥
कथं शान्तनवो भीष्मः स तस्मिन् दशमेऽहनि ।
अयुध्यत महावीर्यः पाण्डवैः सहसृंजयैः ॥ ३ ॥
महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्मने दसवें दिन पाण्डवों तथा सृंजयोंके साथ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ ३ ॥
न मृष्यामि रणे भीष्मं प्रत्युद्यातं शिखण्डिना ।
कच्चिन्न रथभङ्गोऽस्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः ॥ ४ ॥
रणक्षेत्रमें शिखण्डीने भीष्मपर आक्रमण किया, यह मुझसे सहन नहीं हो रहा है। कहीं उनका रथ तो नहीं टूट गया था अथवा बाणोंका प्रहार करते-करते उनके धनुषके टुकड़े-टुकड़े तो नहीं हो गये थे? ॥ ४ ॥

संजय उवाच

नाशीर्यत धनुश्चास्य रथभङ्गो न चाप्यभूत् ।
युध्यमानस्य संग्रामे भीष्मस्य भरतर्षभ ॥ ५ ॥
निघ्नतः समरे शत्रूञ्शरैः संनतपर्वभिः ।
संजयने कहा— भरतश्रेष्ठ! संग्राममें युद्ध करते समय भीष्मके न तो धनुषके ही टुकड़े-टुकड़े हुए थे और न उनका रथ ही टूटा था। वे समरभूमिमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंका संहार करते जा रहे थे ॥

अनेकशतसाहस्रास्तावकानां महारथाः ॥ ६ ॥
तथा दन्तिगणा राजन् हयाश्चैव सुसज्जिताः ।
अभ्यवर्तन्त युद्धाय पुरस्कृत्य पितामहम् ॥ ७ ॥
राजन्! आपके कई लाख महारथी, हाथी और घोड़े सुसज्जित हो पितामह भीष्मको आगे करके युद्धके लिये बढ़ रहे थे ॥ ६-७ ॥
यथाप्रतिज्ञं कौरव्य स चापि समितिञ्जयः ।
पार्थानमकरोद् भीष्मः सततं समितिक्षयम् ॥ ८ ॥
कुरुनन्दन! युद्धविजयी भीष्म अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार रणक्षेत्रमें कुन्तीकुमारोंके सैनिकोंका निरन्तर संहार कर रहे थे ॥ ८ ॥
युध्यमानं महेष्वासं विनिघ्नन्तं पराञ्शरैः ।
पञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं सर्वे ते नाभ्यवारयन् ॥ ९ ॥
बाणोंद्वारा शत्रुओंको मारते हुए युद्धपरायण महा-धनुर्धर भीष्मको पाण्डवोंसहित सारे पांचाल योद्धा भी आगे बढ़नेसे रोक न सके ॥ ९ ॥
दशमेऽहनि सम्प्राप्ते ततस्तां रिपुवाहिनीम् ।
कीर्यमाणां शितैर्बाणैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥
दसवें दिन शत्रु की सेनापर भीष्मके द्वारा सैकड़ों और हजारों पैने बाणोंकी वर्षा की जाने लगी परंतु पाण्डव इसे रोक न सके ॥ १० ॥
न हि भीष्मं महेष्वासं पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज ।
अशक्नुवन् रणे जेतुं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ ११ ॥
पाण्डुके ज्येष्ठ भ्राता धृतराष्ट्र! पाशधारी यमराजके समान महाधनुर्धर भीष्मको युद्धमें जीतनेके लिये पाण्डव कभी समर्थ न हो सके ॥ ११ ॥
अथोपायान्महाराज सव्यसाची धनंजयः ।
त्रासयन् रथिनः सर्वान् बीभत्सुरपराजितः ॥ १२ ॥
महाराज! तदनन्तर किसीसे परास्त न होनेवाले और बायें हाथसे भी बाण चलानेमें समर्थ धनंजय अर्जुन समस्त रथियोंको भयभीत करते हुए उनके निकट आये ॥ १२ ॥
सिंहवद् विनदन्नुच्चैर्धनुर्ज्यां विक्षिपन् मुहुः ।
शरौघान् विसृजन् पार्थो व्यचरत् कालवद् रणे ॥ १३ ॥
वे कुन्तीकुमार सिंहके समान उच्चस्वरसे गर्जना करते हुए बारंबार अपने धनुषकी डोरी खींचते और बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए रणक्षेत्रमें कालके समान विचरते थे ॥ १३ ॥
तस्य शब्देन वित्रस्तास्तावका भरतर्षभ ।
सिंहस्येव मृगा राजन् व्यद्रवन्त महाभयात् ॥ १४ ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! जैसे सिंहके शब्दसे अत्यन्त भयभीत होकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनके सिंहनादसे संत्रस्त हुए आपके सैनिक महान् भयके कारण भागने

लगे ॥ १४ ॥ जयन्तं पाण्डवं दृष्ट्वा त्वत्सैन्यं चाभिपीडितम् । दुर्योधनस्ततो भीष्ममब्रवीद् भृशपीडितः ॥ १५ ॥ पाण्डुनन्दन अर्जुनको जीतते और आपकी सेनाको पीड़ित होती देख दुर्योधन अत्यन्त पीड़ित होकर भीष्मसे बोला— ॥ १५ ॥ एष पाण्डुसुतस्तात श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । दहते मामकान् सर्वान् कृष्णवर्त्मव काननम् ॥ १६ ॥ ‘तात! ये श्वेत घोड़ोंवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिनके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मेरे सारे सैनिकोंको उसी प्रकार दग्ध करते हैं, जैसे दावानल वनको ॥ १६ ॥ पश्य सैन्यानि गाङ्गेय द्रवमाणानि सर्वशः । पाण्डवेन युधां श्रेष्ठ काल्यमानानि संयुगे ॥ १७ ॥ ‘योद्धाओंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन! देखिये, मेरी सेनाएँ सब ओर भाग रही हैं और अर्जुन युद्धस्थलमें खड़े हो उन्हें खदेड़ रहे हैं ॥ १७ ॥ यथा पशुगणान् पालः संकालयति कानने । तथेदं मापकं सैन्यं काल्यते शत्रुतापन ॥ १८ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पितामह! जैसे चरवाहा जंगलमें पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार मेरी यह सेना अर्जुनके द्वारा हाँकी जा रही है ॥ १८ ॥ धनंजयशरैर्भग्नं द्रवमाणं ततस्ततः । भीमोऽप्येवं दुराधर्षो विद्रावयति मे बलम् ॥ १९ ॥ ‘धनंजयके बाणोंसे आहत हो व्यूह भंग करके इधर-उधर भागनेवाली मेरी सेनाको ये दुर्धर्ष वीर भीमसेन भी पीछेसे खदेड़ रहे हैं ॥ १९ ॥ सात्यकिश्चेकितनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । अभिमन्युः सुविक्रान्तो वाहिनीं द्रवते मम ॥ २० ॥ ‘सात्यकि, चेकितान, पाण्डु और माद्रीके पुत्र नकुल-सहदेव और पराक्रमी अभिमन्यु भी मेरी सेनाको भगा रहे हैं ॥ धृष्टद्युम्नस्तथा शूरो राक्षसश्च घटोत्कचः । व्यद्रावयेतां सहसा सैन्यं मम महारणे ॥ २१ ॥ ‘धृष्टद्युम्न तथा शूरवीर राक्षस घटोत्कचने भी सहसा इस महासमरमें आकर मेरी सेनाको मार भगाया है ॥ २१ ॥ वध्यमानस्य सैन्यस्य सर्वैरेतैर्महारथैः । नान्यां गतिं प्रपश्यामि स्थाने युद्धे च भारत ॥ २२ ॥ ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र देवतुल्यपराक्रम । पर्याप्तस्तु भवाञ्शीघ्रं पीडितानां गतिर्भव ॥ २३ ॥

‘भारत! इन सब महारथियोंद्वारा मारी जाती हुई अपनी सेनाको मैं युद्धमें ठहरानेके लिये आपके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं देखता। देवतुल्य पराक्रमी पुरुषसिंह! केवल आप ही उसकी रक्षामें समर्थ हैं। अतः हम पीड़ितोंके लिये आप शीघ्र ही आश्रयदाता होइये’ ।। २२-२३ ।।

संजय उवाच

एवमुक्तो महाराज पिता देवव्रतस्तव । चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु कृत्वा निश्चयमात्मनः ।। २४ ।। तव संधारयन् पुत्रमब्रवीच्छान्तनोः सुतः । दुर्योधन विजानीहि स्थिरो भूत्वा विशाम्पते ।। २५ ।।

संजय कहते हैं—महाराज! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपके ताऊ शान्तनुनन्दन देवव्रतने दो घड़ीतक कुछ चिन्तन करनेके पश्चात् अपना एक निश्चय करके आपके पुत्र दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—‘प्रजानाथ दुर्योधन! सुस्थिर होकर इधर ध्यान दो ।।

पूर्वकालं तव मया प्रतिज्ञातं महाबल । हत्वा दशसहस्राणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।। २६ ।। संग्रामाद् व्यपयातव्यमेतत् कर्म ममाह्निकम् । इति तत् कृतवांश्चाहं यथोक्तं भरतर्षभ ।। २७ ।।

‘महाबली नरेश! पूर्वकालमें मैंने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि दस हजार महामनस्वी क्षत्रियोंका वध करके ही मुझे संग्रामभूमिसे हटना होगा और यह मेरा दैनिक कर्म होगा। भरतश्रेष्ठ! जैसा मैंने कहा था, वैसा अबतक करता आया हूँ ।। २६-२७ ।।

अद्य चापि महत् कर्म प्रकरिष्ये महाबल । अहं वाद्य हतः शेष्ये हनिष्ये वाद्य पाण्डवान् ।। २८ ।।

‘महाबली वीर! आज भी मैं महान् कर्म करूँगा। या तो आज मैं ही मारा जाकर रणभूमिमें सो जाऊँगा या पाण्डवोंका ही संहार करूँगा ।। २८ ।।

अद्य ते पुरुषव्याघ्र प्रतिमोक्ष्ये ऋणं तव । भर्तृपिण्डकृतं राजन् निहतः पृतनामुखे ।। २९ ।।

‘पुरुषसिंह! नरेश! तुम स्वामी हो, मुझपर तुम्हारे अन्नका ऋण है; आज युद्धके मुहानेपर मारा जाकर मैं तुम्हारे उस ऋणको उतार दूँगा’ ।। २९ ।।

इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ क्षत्रियान् प्रवपञ्छरैः । आससाद दुराधर्षः पाण्डवानामनीकिनीम् ।। ३० ।।

भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर दुर्धर्ष वीर भीष्मने क्षत्रियोंपर अपने बाणोंकी वर्षा करते हुए पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया ।। ३० ।।

अनीकमध्ये तिष्ठन्तं गाङ्गेयं भरतर्षभ । आशीविषमिव क्रुद्धं पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ३१ ॥ सेनाके मध्यभागमें स्थित हुए विषधर सर्पके समान कुपित भीष्मको पाण्डव सैनिक रोकने लगे ॥ ३१ ॥

दशमेऽहनि भीष्मस्तु दर्शयञ्छक्तिमात्मनः । राजञ्छतसहस्राणि सोऽवधीत् कुरुनन्दन ॥ ३२ ॥ किंतु राजन्! कुरुनन्दन! दसवें दिन भीष्मने अपनी शक्तिका परिचय देते हुए लाखों पाण्डव-सैनिकोंका संहार कर डाला ॥ ३२ ॥

पञ्चालानां च ये श्रेष्ठा राजपुत्रा महारथाः । तेषामादत्त तेजांसि जलं सूर्य इवांशुभिः ॥ ३३ ॥ जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा धरतीका जल सोख लेते हैं, उसी प्रकार भीष्मजीने पांचालोंमें जो श्रेष्ठ महारथी राजकुमार थे, उन सबके तेज हर लिये ॥ ३३ ॥

हत्वा दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । सारोहाणां महाराज हयानां चायुतं तथा ॥ ३४ ॥ पूर्णे शतसहस्रे द्वे पादातानां नरोत्तमः । प्रजज्वाल रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥ ३५ ॥ महाराज! सवारोंसहित दस हजार वेगशाली हाथियों, उतने ही घोड़ों और घुड़सवारों तथा दो लाख पैदल सैनिकोंको नरश्रेष्ठ भीष्मने रणभूमिमें धूमरहित अग्निकी भाँति फूँक डाला ॥ ३४-३५ ॥

न चैनं पाण्डवेयानां केचिच्छेकुर्निरीक्षितुम् । उत्तरं मार्गमास्थाय तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३६ ॥ उत्तरायणका आश्रय लेकर तपते हुए सूर्यकी भाँति प्रतापी भीष्मकी ओर पाण्डवोंमेंसे कोई देखनेमें समर्थ न हो सके ॥ ३६ ॥

ते पाण्डवेयाः संरब्धा महेष्वासेन पीडिताः । वधायाभ्यद्रवन् भीष्मं सृञ्जयाश्च महारथाः ॥ ३७ ॥ महाधनुर्धर भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हो अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पाण्डव तथा सृंजय महारथी भीष्मके वधके लिये उनपर टूट पड़े ॥ ३७ ॥

संयुद्ध्यमानो बहुभिर्भीष्मः शान्तनवस्तथा । अवकीर्णो महामेरुः शैलो मेघैरिवावृतः ॥ ३८ ॥ बहुत-से योद्धाओंके साथ अकेले युद्ध करते हुए शान्तनुनन्दन भीष्म उस समय बाणोंसे आच्छादित हो मेघोंके समूहसे आवृत हुए महान् पर्वत मेरुकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३८ ॥

पुत्रास्तु तव गाङ्गेयं समन्तात् पर्यवारयन् ।

महत्या सेनया सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥ ३९ ॥
राजन्! आपके पुत्रोंने विशाल सेनाके साथ आकर गंगानन्दन भीष्मको सब ओरसे घेर लिया। तत्पश्चात् वहाँ विकट युद्ध होने लगा ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मदुर्योधनसंवादे
नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-दुर्योधन-संवादविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥

११०-

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दशाधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके प्रोत्साहनसे शिखण्डीका भीष्मपर आक्रमण और दोनों सेनाओंके प्रमुख वीरोंका परस्पर युद्ध तथा दुःशासनका अर्जुनके साथ घोर युद्ध

संजय उवाच

अर्जुनस्तु रणे राजन् दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ।
शिखण्डिनमथोवाच समभ्येहि पितामहम् ॥ १ ॥
न चापि भीस्त्वया कार्या भीष्मादद्य कथंचन ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्ये रथोत्तमात् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! रणभूमिमें भीष्मका पराक्रम देखकर अर्जुनने शिखण्डीसे कहा—'वीर! तुम पितामहका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो। आज भीष्मजीसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। मैं स्वयं अपने पैने बाणोंद्वारा इनको उत्तम रथसे मार गिराऊँगा' ।। १-२ ।।

एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ ।
अभ्यद्रवत गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जब अर्जुनने शिखण्डीसे ऐसा कहा, तब उसने पार्थके उस कथनको सुनकर गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया ।। ३ ।।

धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् सौभद्रश्च महारथः ।
हृष्टावाद्रवतां भीष्मं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥ ४ ॥
राजन्! पार्थका वह भाषण सुनकर धृष्टद्युम्न तथा सुभद्राकुमार महारथी अभिमन्यु—ये दोनों वीर हर्ष और उत्साहमें भरकर भीष्मकी ओर दौड़े ।। ४ ।।

विराटद्रुपदौ वृद्धौ कुन्तिभोजश्च दंशितः ।
अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं पुत्रस्य तव पश्यतः ॥ ५ ॥
दोनों वृद्ध नरेश विराट और द्रुपद तथा कवचधारी कुन्तिभोज भी आपके पुत्रके देखते-देखते गंगानन्दन भीष्मपर टूट पड़े ।। ५ ।।

नकुलः सहदेवश्च धर्मराजश्च वीर्यवान् ।
तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशाम्पते ॥ ६ ॥
समाद्रवन्त गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ।
प्रजानाथ! नकुल, सहदेव, पराक्रमी धर्मराज युधिष्ठिर तथा दूसरे समस्त सैनिक अर्जुनका उपर्युक्त वचन सुनकर भीष्मजीकी ओर बढ़ने लगे ।। ६ १/२ ।।

प्रत्युद्ययुस्तावकाश्च समेतांस्तान् महारथान् ॥ ७ ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं तन्मे निगदतः शृणु ।
इस प्रकार एकत्र हुए पाण्डव महारथियोंपर आपके पुत्रोंने भी जिस प्रकार अपनी शक्ति और उत्साहके अनुसार आक्रमण किया, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥

चित्रसेनो महाराज चेकितानं समभ्ययात् ॥ ८ ॥
भीष्मप्रेप्सुं रणे यान्तं वृषं व्याघ्रशिशुर्यथा ।
महाराज! चित्रसेनने भीष्मके पास पहुँचनेकी इच्छासे रणमें जाते हुए चेकितानका सामना किया, मानो बाघका बच्चा बैलका सामना कर रहा हो ॥ ८ १/२ ॥

धृष्टद्युम्नं महाराज भीष्मान्तिकमुपागतम् ॥ ९ ॥
त्वरमाणं रणे यत्तं कृतवर्मा न्यवारयत् ।
राजन्! कृतवर्माने भीष्मजीके निकट पहुँचकर युद्धके लिये उतावलीपूर्वक प्रयत्न करनेवाले धृष्टद्युम्नको रोका ॥

भीमसेनं सुसंक्रुद्धं गाङ्गेयस्य वधैषिणम् ॥ १० ॥
त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिर्न्यवारयत् ।
महाराज! भीमसेन भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर गङ्गानन्दन भीष्मका वध करना चाहते थे; परंतु सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाने तुरंत आकर उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १० १/२ ॥

तथैव नकुलं शूरं किरन्तं सायकान् बहून् ॥ ११ ॥
विकर्णो वारयामास इच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ।
इसी प्रकार शूरवीर नकुल बहुत-से सायकोंकी वर्षा कर रहे थे, परंतु भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विकर्णने उन्हें रोक दिया ॥ ११ १/२ ॥

सहदेवं तथा राजन् यान्तं भीष्मरथं प्रति ॥ १२ ॥
वारयामास संक्रुद्धः कृपः शारद्वतो युधि ।
राजन्! युद्धस्थलमें भीष्मके रथकी ओर जाते हुए सहदेवको कुपित हुए शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने रोक दिया ॥ १२ १/२ ॥

राक्षसं क्रूरकर्माणं भैमसैनिं महाबलम् ॥ १३ ॥
भीष्मस्य निधनं प्रेप्सुं दुर्मुखोऽभ्यद्रवद् बली ।
भीष्मकी मृत्यु चाहनेवाले क्रूरकर्मा राक्षस महाबली भीमसेनकुमार घटोत्कचपर बलवान् दुर्मुखने आक्रमण किया ॥ १३ १/२ ॥

सात्यकिं समरे यान्तं तव पुत्रो न्यवारयत् ॥ १४ ॥
(भीष्मस्य वधमिच्छन्तं पाण्डवप्रीतिकाम्यया ।)
पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये भीष्मका वध चाहनेवाले सात्यकिको युद्धके लिये जाते देख आपके पुत्र दुर्योधनने रोका ॥ १४ ॥

अभिमन्युं महाराज यान्तं भीष्मरथं प्रति ।

सुदक्षिणो महाराज काम्बोजः प्रत्यवारयत् ।। १५ ।।
महाराज! भीष्मके रथकी ओर अग्रसर होनेवाले अभिमन्युको काम्बोजराज सुदक्षिणने रोका ।। १५ ।।
विराटद्रुपदौ वृद्धौ समेतावरिमर्दनौ ।
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धौ वारयामास भारत ।। १६ ।।
भारत! एक साथ आये हुए शत्रुमर्दन बूढ़े नरेश विराट और द्रुपदको क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने रोक दिया ।।
तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् ।
भारद्वाजो रणे यत्तो धर्मपुत्रमवारयत् ।। १७ ।।
भीष्मके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ज्येष्ठ पाण्डव धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें द्रोणाचार्यने यत्नपूर्वक रोका ।। १७ ।।
अर्जुनं रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
भीष्मप्रेप्सुं महाराज भासयन्तं दिशो दश ।। १८ ।।
दुःशासनो महेष्वासो वारयामास संयुगे ।
महाराज! दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए वेगशाली वीर अर्जुन युद्धमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको मारना चाहते थे। उस समय महाधनुर्धर दुःशासनने युद्धके मैदानमें आकर उन्हें रोका ।। १८ १/२ ।।
अन्ये च तावका योधाः पाण्डवानां महारथान् ।। १९ ।।
भीष्मस्याभिमुखान् यातान् वारयामासुराहवे ।
राजन्! इसी प्रकार आपके अन्य योद्धाओंने भीष्मके सम्मुख गये हुए पाण्डव महारथियोंको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। १९ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्राक्रोशत् पुनः पुनः ।। २० ।।
अभिद्रवत संरब्धा भीष्ममेकं महाबलम् ।
एषोऽर्जुनो रणे भीष्मं प्रयाति कुरुनन्दनः ।। २१ ।।
अभिद्रवत मा भैष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न वः ।
अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासवः ।। २२ ।।
किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोऽल्पजीवितः ।
धृष्टद्युम्न अपने सैनिकोंसे बारंबार पुकार-पुकारकर कहने लगे—‘वीरो! तुम सब लोग उत्साहित होकर एकमात्र महाबली भीष्मपर आक्रमण करो। ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले अर्जुन रणक्षेत्रमें भीष्मपर चढ़ाई करते हैं। तुम भी उनपर टूट पड़ो। डरो मत। भीष्म तुमलोगोंको नहीं पा सकेंगे। इन्द्र भी समरांगणमें अर्जुनके साथ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; फिर ये धैर्य और शक्तिसे शून्य भीष्म रणक्षेत्रमें उनका सामना कैसे कर सकते हैं? अब इनका जीवन थोड़ा ही शेष रहा है’ ।। २०—२२ १/२ ।।

इति सेनापतेः श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ २३ ॥ अभ्यद्रवन्त संहृष्टा गाङ्गेयस्य रथं प्रति । सेनापतिकी यह वचन सुनकर पाण्डव महारथी अत्यन्त हर्षमें भरकर गंगानन्दन भीष्मके रथपर टूट पड़े ॥

आगच्छमानान् समरे वार्योघान् प्रलयानिव ॥ २४ ॥ अवारयन्त संहृष्टास्तावकाः पुरुषर्षभाः । युद्धमें प्रलयकालीन जलप्रवाहके समान आते हुए उन वीरोंको आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने हर्ष और उत्साहमें भरकर रोका ॥ २४ १/२ ॥

दुःशासनो महाराज भयं त्यक्त्वा महारथः ॥ २५ ॥ भीष्मस्य जीविताकाङ्क्षी धनंजयमुपाद्रवत् । महाराज! महारथी दुःशासनने भय छोड़कर भीष्मकी जीवन-रक्षाके लिये धनंजयपर धावा किया ॥ २५ १/२ ॥

तथैव पाण्डवाः शूरा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ २६ ॥ अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान् महारथाः । इसी प्रकार शूरवीर महारथी पाण्डवोंने युद्धमें गंगानन्दन भीष्मके रथकी ओर खड़े हुए आपके पुत्रोंपर आक्रमण किया ॥ २६ १/२ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशाम्पते ॥ २७ ॥ दुःशासनरथं प्राप्य यत् पार्थो नात्यवर्तत । प्रजानाथ! वहाँ हमने सबसे अद्भुत और विचित्र बात यह देखी कि अर्जुन दुःशासनके रथके पास पहुँचकर वहाँसे आगे न बढ़ सके ॥ २७ १/२ ॥

यथा वारयते वेला क्षुब्धतोयं महार्णवम् ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डवं क्रुद्धं तव पुत्रो न्यवारयत् । जैसे तटकी भूमि विक्षुब्ध जलराशिवाले महासागरको रोके रहती है, उसी प्रकार आपके पुत्रने क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको रोक दिया था ॥ २८ १/२ ॥

उभौ तौ रथिनां श्रेष्ठावुभौ भारत दुर्जयौ ॥ २९ ॥ उभौ चन्द्रार्कसदृशौ कान्त्या दीप्त्या च भारत । तथा तौ जातसंरम्भावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३० ॥ (दुःशासनार्जुनौ वीरौ वृत्रेन्द्रसमतेजसौ ।) समीयतुर्महासंख्ये मयशक्रौ यथा पुरा ।

भारत! वे दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और दुर्जय वीर थे। दोनों ही कान्ति और दीप्तिमें चन्द्रमा और सूर्यके समान जान पड़ते थे और भारत! दुःशासन तथा अर्जुन दोनों वीर वृत्रासुर एवं इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे दोनों क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके वधकी अभिलाषा रखते थे। उस महायुद्धमें वे उसी प्रकार एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे, जैसे पूर्वकालमें मयासुर और इन्द्र आपसमें लड़ते थे ॥ २९-३० १/२ ॥

दुःशासनो महाराज पाण्डवं विशिखैस्त्रिभिः ॥ ३१ ॥
वासुदेवं च विंशत्या ताडयामास संयुगे ।
महाराज! दुःशासनने तीन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनको और बीस बाणोंसे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको युद्धमें घायल किया ॥ ३१ १/२ ॥

ततोऽर्जुनो जातमन्युर्वार्ष्णेयं वीक्ष्य पीडितम् ॥ ३२ ॥
दुःशासनं शतेनाजौ नाराचानां समर्पयत् ।
भगवान् श्रीकृष्णको बाणोंसे पीड़ित हुआ देख अर्जुनका क्रोध उभड़ आया और उन्होंने दुःशासनको युद्धमें सौ नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥

ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥ ३३ ॥
(यथैव पन्नगा राजंस्तटाकं तृषितास्तथा ।)
वे नाराच रणक्षेत्रमें दुःशासनका कवच विदीर्ण करके उसका रक्त पीने लगे, मानो प्यासे सर्प तालाबमें घुस गये हों ॥ ३३ ॥

दुःशासनस्त्रिभिः क्रुद्धः पार्थं विव्याध पत्रिभिः ।
ललाटे भरतश्रेष्ठ शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३४ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब दुःशासनने कुपित होकर अर्जुनके ललाटमें झुकी हुई गाँठवाले तीन पंखयुक्त बाण मारे ॥ ३४ ॥

ललाटस्थैस्तु तैर्बाणैः शुशुभे पाण्डवो रणे ।
यथा मेरुर्महाराज शृङ्गैरत्यर्थमुच्छ्रितैः ॥ ३५ ॥
ललाटमें लगे हुए उन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुन युद्धमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मेरुपर्वत अपने तीन अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित होता है ॥ ३५ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासः पुत्रेण तव धन्विना ।
व्यराजत रणे पार्थः किंशुकः पुष्पवानिव ॥ ३६ ॥
आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा युद्धमें अधिक घायल किये जानेपर महाधनुर्धर अर्जुन खिले हुए पलाशवृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ३६ ॥

दुःशासनं ततः क्रुद्धः पीडयामास पाण्डवः ।
पर्वणीय सुसंक्रुद्धो राहुः पूर्णं निशाकरम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर कुपित हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन दुःशासनको उसी प्रकार पीड़ा देने लगे, जैसे पूर्णिमाके दिन अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ राहु पूर्ण चन्द्रमाको पीड़ा देता है ॥ ३७ ॥

पीड़्यमानो बलवता पुत्रस्तव विशाम्पते । विव्याध समरे पार्थं कङ्कपत्त्रैः शिलाशितैः ॥ ३८ ॥ प्रजानाथ! बलवान् अर्जुनके द्वारा पीड़ित होनेपर आपके पुत्रने शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कंक-पत्रयुक्त बाणोंद्वारा समरभूमिमें उन कुन्तीकुमारको बींध डाला ॥ ३८ ॥

तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा रथं चास्य त्रिभिः शरैः । आजघान ततः पश्चात् पुत्रं ते निशितैः शरैः ॥ ३९ ॥ तब अर्जुनने तीन बाणोंसे दुःशासनके रथ और धनुषको छिन्न-भिन्न करके आपके उस पुत्रको पैने बाणोंद्वारा अच्छी तरह घायल किया ॥ ३९ ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय भीष्मस्य प्रमुखे स्थितः । अर्जुनं पञ्चविंशत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ४० ॥ तब दुःशासनने दूसरा धनुष ले भीष्मके सामने खड़े होकर अर्जुनकी दोनों भुजाओं और छातीमें पचीस बाण मारे ॥ ४० ॥

तस्य क्रुद्धो महाराज पाण्डवः शत्रुतापनः । अप्रेषीद् विशिखान् घोरान् यमदण्डोपमान् बहून् ॥ ४१ ॥ महाराज! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो दुःशासनपर यमदण्डके समान भयंकर बहुत-से बाण चलाये ॥ ४१ ॥

अप्राप्तानेव तान् बाणांश्छिच्छेद तनयस्तव । यतमानस्य पार्थस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४२ ॥ परंतु आपके पुत्रने अर्जुनके प्रयत्नशील होते हुए भी उन बाणोंको अपने पास आनेके पहले ही काट डाला। वह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ ४२ ॥

पार्थं च निशितैर्बाणैर्विध्यत् तनयस्तव । ततः क्रुद्धो रणे पार्थः शरान् संधाय कार्मुके ॥ ४३ ॥ प्रेषयामास समरे स्वर्णपुङ्खाञ्छिलाशितान् । बाणोंको काटनेके पश्चात् आपके पुत्रने कुन्तीकुमार अर्जुनको तीखे बाणोंद्वारा बींध डाला, तब रणक्षेत्रमें अर्जुनने कुपित होकर अपने धनुषपर स्वर्णमय पंखसे युक्त एवं शिलापर रगड़कर तेज किये हुए बाणोंका संधान किया और उन्हें दुःशासनपर चलाया ॥ ४३ १/२ ॥

न्यमज्जंस्ते महाराज तस्य काये महात्मनः ॥ ४४ ॥ यथा हंसा महाराज तडागं प्राप्य भारत । महाराज! भरतनन्दन! जैसे हंस तालाबमें पहुँचकर उसके भीतर गोते लगाते हैं, उसी प्रकार वे बाण महामना दुःशासनके शरीरमें धँस गये ॥ ४४ १/२ ॥

पीडितश्चैव पुत्रस्ते पाण्डवेन महात्मना ॥ ४५ ॥ हित्वा पार्थं रणे तूर्णं भीष्मस्य रथमाव्रजत् ।

अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीष्मोऽभवत् तदा ॥ ४६ ॥

इस प्रकार महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनके द्वारा पीड़ित होकर आपका पुत्र दुःशासन युद्धमें अर्जुनको छोड़कर तुरंत ही भीष्मके रथपर जा बैठा। उस समय अगाध समुद्रमें डूबते हुए दुःशासनके लिये भीष्मजी द्वीप हो गये ॥ ४५-४६ ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां पुत्रस्तव विशाम्पते ।
अवारयत् ततः शूरो भूय एव पराक्रमी ॥ ४७ ॥
शरैः सुनिशितैः पार्थं यथा वृत्रं पुरंदरः ।
निर्बिभेद महाकायो विव्यथे नैव चार्जुनः ॥ ४८ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर होश-हवास ठीक होनेपर आपके पराक्रमी एवं शूरवीर पुत्र दुःशासनने पुनः अत्यन्त तीखे बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको रोका, मानो इन्द्रने वृत्रासुरकी गतिको अवरुद्ध कर दिया हो। महाकाय दुःशासनने अर्जुनको अपने बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया; परंतु वे तनिक भी व्यथित नहीं हुए ॥ ४७-४८ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अर्जुनदुःशासनसमागमे दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें अर्जुन और दुःशासनका युद्धविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४९ १/३ श्लोक हैं।]

कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन

संजय उवाच

सात्यकिं दंशितं युद्धे भीष्मायाभ्युद्यतं रणे ।
आर्ष्यशृङ्गिर्महेष्वासो वारयामास संयुगे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! युद्धस्थलमें कवचधारी सात्यकिको भीष्मसे युद्ध करनेके लिये उद्यत देख महाधनुर्धर राक्षस अलम्बुषने आकर उन्हें रोका ॥ १ ॥

माधवस्तु सुसंक्रुद्धो राक्षसं नवभिः शरैः ।
आजघान रणे राजन् प्रहसन्निव भारत ॥ २ ॥
राजन्! भरतनन्दन! यह देख सात्यकिने अत्यन्त कुपित हो उस रणक्षेत्रमें राक्षस अलम्बुषको हँसते हुए-से नौ बाण मारे ॥ २ ॥

तथैव राक्षसो राजन् माधवं नवभिः शरैः ।
अर्दयामास राजेन्द्र संक्रुद्धः शिनिपुङ्गवम् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! तब उस राक्षसने भी अत्यन्त कुपित होकर मधुवंशी सात्यकिको नौ बाणोंसे पीड़ित किया ॥ ३ ॥

शैनेयः शरसंघं तु प्रेषयामास संयुगे ।
राक्षसाय सुसंक्रुद्धो माधवः परवीरहा ॥ ४ ॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी सात्यकि-का क्रोध बहुत बढ़ गया और समरभूमिमें उन्होंने राक्षसपर बाणसमूहोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४ ॥

ततो रक्षो महाबाहुं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।
विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैः सिंहनादं ननाद च ॥ ५ ॥
तदनन्तर राक्षसने सत्यपराक्रमी महाबाहु सात्यकिको तीखे सायकोंसे बींध डाला और सिंहके समान गर्जना की ॥ ५ ॥

माधवस्तु भृशं विद्धो राक्षसेन रणे तदा ।
वार्यमाणश्च तेजस्वी जहास च ननाद च ॥ ६ ॥
उस समय राक्षसके द्वारा रणक्षेत्रमें रोके जाने और अत्यन्त घायल होनेपर भी मधुवंशी तेजस्वी सात्यकि हँसने और गर्जना करने लगे ॥ ६ ॥

भगदत्तस्ततः क्रुद्धो माधवं निशितैः शरैः ।
ताडयामास समरे तोत्रैरिव महागजम् ॥ ७ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए भगदत्तने पैने बाणोंद्वारा मधुवंशी सात्यकिको समरभूमिमें उसी प्रकार पीड़ित किया, जैसे महावत अंकुशोंद्वारा महान् गजराजको पीड़ा देता है।। विहाय राक्षसं युद्धे शैनेयो रथिनां वरः। प्राग्ज्योतिषाय चिक्षेप शरान् संनतपर्वणः॥ ८॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने युद्धमें उस राक्षसको छोड़कर प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तपर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाण चलाये॥ ८॥ तस्य प्राग्ज्योतिषो राजा माधवस्य महद् धनुः। चिच्छेद शतधारेण भल्लेन कृतहस्तवत्॥ ९॥ यह देख प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तने सात्यकिके विशाल धनुषको एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति सौ धारवाले भल्लके द्वारा काट डाला॥ ९॥ अथान्यद् धनुरदाय वेगवत् परवीरहा। भगदत्तं रणे क्रुद्धं विव्याध निशितैः शरैः॥ १०॥ तब शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले सात्यकिने दूसरा वेगवान् धनुष लेकर पैने बाणोंद्वारा युद्धमें क्रुद्ध हुए भगदत्तको बींध डाला॥ १०॥ सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन्। शक्तिं कनकवैदूर्यभूषितामायसीं दृढाम्॥ ११॥ यमदण्डोपमां घोरां चिक्षेप परमाहवे। इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भगदत्त अपने मुँहके दोनों कोने चाटने लगे। फिर उन्होंने उस महायुद्धमें कनक और वैदूर्य मणियोंसे विभूषित लोहेकी बनी हुई सुदृढ़ एवं यमदण्डके समान भयंकर शक्ति चलायी॥ ११ ½॥ तामापतन्तीं सहसा तस्य बाहुबलेरिताम्॥ १२॥ सात्यकिः समरे राजन् द्विधा चिच्छेद सायकैः। उनके बाहुबलसे प्रेरित होकर समरभूमिमें सहसा अपने ऊपर गिरती हुई उस शक्तिके सात्यकिने बाणों-द्वारा दो टुकड़े कर दिये॥ १२ ½॥ ततः पपात सहसा महोल्केव हतप्रभा॥ १३॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते। महता रथवंशेन वारयामास माधवम्॥ १४॥ तब वह शक्ति प्रभाहीन हुई बहुत बड़ी उल्काके समान सहसा भूमिपर गिर पड़ी। प्रजानाथ! भगदत्तकी शक्तिको नष्ट हुई देख आपके पुत्रने विशाल रथसेनाके साथ आकर सात्यकिको रोका॥ १३-१४॥ तथा परिवृतं दृष्ट्वा वार्ष्णेयानां महारथम्। दुर्योधनो भृशं क्रुद्धो भ्रातॄन् सर्वानुवाच ह॥ १५॥

वृष्णिवंशी महारथी सात्यकिको रथसेनासे घिरा हुआ देख दुर्योधनने अत्यन्त कुपित होकर अपने समस्त भाइयोंसे कहो— ॥ १५ ॥ तथा कुरुत कौरव्या यथा वः सात्यको युधि । न जीवन् प्रतिनिर्याति महतोऽस्माद् रथव्रजात् ॥ १६ ॥ ‘कौरवो! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे इस समरांगणमें आये हुए सात्यकि हमारे इस महान् रथ-समुदायसे जीवित न निकलने पावें ॥ १६ ॥ तस्मिन् हते हतं मन्ये पाण्डवानां महद् बलम् । तथेति च वचस्तस्य परिगृह्य महारथाः ॥ १७ ॥ शैनेयं योधयामासुर्भीष्मायाभ्युद्यतं रणे । ‘सात्यकिके मारे जानेपर मैं पाण्डवोंकी विशाल सेनाको मरी हुई ही मानता हूँ।’ दुर्योधनकी इस बातको मानकर कौरव महारथियोंने रणभूमिमें भीष्मका सामना करनेके लिये उद्यत हुए सात्यकिसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १७ १/२ ॥ (अभिमन्युं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्याभ्युद्यतं वधे ।) काम्बोजराजो बलवान् वारयामास संयुगे ॥ १८ ॥ इसी प्रकार भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत होकर आते हुए अर्जुनकुमार अभिमन्युको बलवान् काम्बोजराजने युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १८ ॥ आर्जुनिं नृपतिर्विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः । पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन् विव्याध तं नृप ॥ १९ ॥ राजन्! नरेश्वर! काम्बोजराजने झुकी हुई गाँठवाले अनेक बाणोंद्वारा अभिमन्युको घायल करके पुनः चौंसठ बाणोंसे मारकर उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १९ ॥ सुदक्षिणस्तु समरे पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिं चास्य नवभिरिच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ॥ २० ॥ तदनन्तर समरांगणमें भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले काम्बोजराज सुदक्षिणने अभिमन्युको पुनः पाँच बाण मारे और नौ बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ २० ॥ तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे । यदाभ्यधावद् गाङ्गेयं शिखण्डी शत्रुकर्शनः ॥ २१ ॥ जब शत्रुसूदन शिखण्डीने गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया था, उस समय उन दोनों (अभिमन्यु और सुदक्षिण)-के संघर्षमें वहाँ बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २१ ॥ विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयन्तौ महाचमूम् । भीष्मं च युधि संरब्धावादद्रवन्तौ महारथौ ॥ २२ ॥ बूढ़े राजा महारथी विराट और द्रुपद दुर्योधनकी उस विशाल सेनाको रोकते हुए अत्यन्त क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें भीष्मपर चढ़ आये ॥ २२ ॥

अश्वत्थामा रणे क्रुद्धः समायाद्रथसत्तमः । ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोस्तस्य च भारत ॥ २३ ॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा रणभूमिमें कुपित होकर आया। भारत! फिर अश्वत्थामाका विराट और द्रुपदके साथ भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २३ ॥

विराटो दशभिर्भल्लैराजघान परंतप । यतमानं महेष्वासं द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ २४ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! राजा विराटने संग्राममें शोभा पानेवाले प्रयत्नशील एवं महाधनुर्धर अश्वत्थामाको भल्ल नामक दस बाणोंसे घायल किया ॥ २४ ॥

द्रुपदश्च त्रिभिर्बाणैर्विव्याध निशितैस्तदा । गुरुपुत्रं समासाद्य प्रहरन्तौ महाबलौ ॥ २५ ॥ अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध बहुभिः शरैः । विराटद्रुपदौ वीरौ भीष्मं प्रति समुद्यतौ ॥ २६ ॥ उस समय द्रुपदने भी तीन तीखे बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको घायल कर दिया। इस प्रकार प्रहार करते हुए उन दोनों महाबली नरेशोंको अश्वत्थामाने अनेक बाणोंद्वारा बींध डाला। विराट और द्रुपद दोनों वीर भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत थे ॥ २५-२६ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम वृद्धयोश्चरितं महत् । यद् द्रौणिसायकान् घोरान् प्रत्यवारयतां युधि ॥ २७ ॥ राजन्! वहाँ उन दोनों बूढ़े नरेशोंका हमने अद्भुत एवं महान् पराक्रम यह देखा कि वे युद्धमें अश्वत्थामाके भयंकर बाणोंका निवारण करते जा रहे थे ॥ २७ ॥

सहदेवं तथा यान्तं कृपः शारद्वतोऽभ्ययात् । यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ॥ २८ ॥ इसी प्रकार भीष्मपर चढ़ाई करनेवाले सहदेवको शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने सामने आकर रोका, मानो वनमें किसी मतवाले हाथीपर मदोन्मत्त गजराजने आक्रमण किया हो ॥ २८ ॥

कृपश्च समरे शूरो माद्रीपुत्रं महारथम् । आजघान शरैस्तूर्णं सप्तत्या रुक्मभूषणैः ॥ २९ ॥ शूरवीर कृपाचार्यने समरभूमिमें महारथी माद्रीकुमार सहदेवको सुवर्णभूषित सत्तर बाणोंसे तुरंत घायल कर दिया ॥ २९ ॥

तस्य माद्रीसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद सायकैः । अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध नवभिः शरैः ॥ ३० ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने भी अपने सायकोंद्वारा उनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये और धनुष कट जानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय समरे भारसाधनम् ।

माद्रीपुत्रं सुसंहृष्टो दशभिर्निशितैः शरैः ॥ ३१ ॥ आजघानोरसि क्रुद्ध इच्छन् भीष्मस्य जीवितम् । तदनन्तर भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले कृपाचार्यने समरांगणमें भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा धनुष लेकर अत्यन्त हर्षके साथ सहदेवकी छातीमें क्रोधपूर्वक दस तीखे बाण मारे ॥ ३१ १/२ ॥

तथैव पाण्डवो राजञ्छारद्वतममर्षणम् ॥ ३२ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो भीष्मस्य वधकाङ्क्षया । तयोर्युद्धं समभवद् घोररूपं भयावहम् ॥ ३३ ॥ राजन्! इसी प्रकार पाण्डुकुमार सहदेवने भी कुपित हो भीष्मके वधकी इच्छासे अमर्षशील कृपाचार्यकी छातीमें अपने बाणोंद्वारा प्रहार किया। उन दोनोंका वह युद्ध अत्यन्त घोर एवं भयंकर हो चला ॥ ३२-३३ ॥

नकुलं तु रणे क्रुद्धो विकर्णः शत्रुतापनः । विव्याध सायकैः षष्ट्या रक्षन् भीष्मं महाबलम् ॥ ३४ ॥ दूसरी ओर क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी विकर्णने युद्धके मैदानमें महाबली भीष्मकी रक्षामें तत्पर हो साठ बाणोंद्वारा नकुलको घायल कर दिया ॥ ३४ ॥

नकुलोऽपि भृशं विद्धस्तव पुत्रेण धीमता । विकर्णं सप्तसप्तत्या निर्बिभेद शिलीमुखैः ॥ ३५ ॥ आपके बुद्धिमान् पुत्र विकर्णद्वारा अत्यन्त घायल होकर नकुलने भी सतहत्तर बाणोंसे विकर्णको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३५ ॥

तत्र तौ नरशार्दूलौ भीष्महेतोः परंतपौ । अन्योन्यं जघ्नुतुर्वीरौ गोष्ठे गोवृषभाविव ॥ ३६ ॥ जैसे गोशालामें दो साँड़ आपसमें लड़ते हों, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों पुरुषसिंह वीर विकर्ण और नकुल भीष्मकी रक्षाके लिये एक-दूसरेपर घातक प्रहार कर रहे थे ॥ ३६ ॥

घटोत्कचं रणे यान्तं निघ्नन्तं तव वाहिनीम् । दुर्मुखः समरे प्रायाद् भीष्महेतोः पराक्रमी ॥ ३७ ॥ उसी समय पराक्रमी दुर्मुखने समरभूमिमें भीष्मकी रक्षाके लिये राक्षस घटोत्कचपर आक्रमण किया, जो युद्धके मैदानमें आपकी सेनाका संहार करता हुआ आगे बढ़ रहा था ॥ ३७ ॥

हैडिम्बस्तु रणे राजन् दुर्मुखं शत्रुतापनम् । आजघानोरसि क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ॥ ३८ ॥ राजन्! उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले दुर्मुखको क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥

भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः । षष्ट्या वीरो नदन् हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ॥ ३९ ॥ तब वीर दुर्मुखने हर्षपूर्वक गर्जना करते हुए अपने तीखी नोकवाले बाणोंद्वारा भीमसेनके पुत्र घटोत्कचको युद्धके मुहानेपर साठ बाणोंसे बींध डाला ॥ ३९ ॥ धृष्टद्युम्नं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् । हार्दिक्यो वारयामास रथश्रेष्ठं महारथः ॥ ४० ॥ इसी प्रकार भीष्मके वधकी इच्छासे आते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको महारथी कृतवर्माने रोक दिया ॥ ४० ॥ हार्दिक्यः पार्षतं चापि विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः । पुनः पञ्चाशता तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ४१ ॥ कृतवर्माने द्रुपदकुमारको लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे बींधकर फिर तुरंत ही पचास बाणोंसे घायल किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४१ ॥ आजघान महाबाहुः पार्षतं तं महारथम् । तं चैव पार्षतो राजन् हार्दिक्यं नवभिः शरैः ॥ ४२ ॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः । इस प्रकार महाबाहु कृतवर्माने महारथी धृष्टद्युम्नको गहरी चोट पहुँचायी। राजन्! तब धृष्टद्युम्नने भी कंकपत्रविभूषित सीधे जानेवाले तीखे एवं पैने नौ बाणोंसे कृतवर्माको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥ तयोः समभवद् युद्धं भीष्महेतोर्महाहवे ॥ ४३ ॥ अन्योन्यातिशये युक्तं यथा वृत्रमहेन्द्रयोः । उस समय भीष्मजीके निमित्त उस महान् संग्राममें वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनों वीरोंका घोर युद्ध होने लगा, जिसमें वे एक-दूसरेसे आगे बढ़ जानेके प्रयत्नमें लगे थे ॥ ४३ १/२ ॥ भीमसेनं तथाऽऽयान्तं भीष्मं प्रति महारथम् ॥ ४४ ॥ भूरिश्रवाभ्ययात् तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । इसी तरह महारथी भीष्मकी ओर आते हुए भीमसेनपर भूरिश्रवाने तुरंत आक्रमण किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४४ १/२ ॥ सौमदत्तिरथो भीममाजघान स्तनान्तरे ॥ ४५ ॥ नाराचेन सुतीक्ष्णेन रुक्मपुङ्खेन संयुगे । तदनन्तर सोमदत्तकुमारने युद्धस्थलमें सुवर्णमय पंखसे युक्त अत्यन्त तीखे नाराचद्वारा भीमसेनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४५ १/२ ॥ उरःस्थेन बभौ तेन भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ स्कन्दशक्त्या यथा क्रौञ्चः पुरा नृपतिसत्तम ।

नृपश्रेष्ठ! छातीमें लगे हुए उस बाणसे प्रतापी भीमसेन वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयकी शक्तिसे आविद्ध होनेपर क्रौंच पर्वतकी शोभा हुई थी॥ ४६ १/२ ॥
तौ शरान् सूर्यसंकाशान् कर्मारपरिमार्जितान् ॥ ४७ ॥
अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते नरर्षभौ ।
क्रोधमें भरे हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ युद्धमें एक-दूसरेपर लोहारके द्वारा माँजकर साफ किये हुए सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंका प्रहार कर रहे थे॥ ४७ १/२ ॥
भीमो भीष्मवधाकाङ्क्षी सौमदत्तिं महारथम् ॥ ४८ ॥
तथा भीष्मजये गृध्नुः सौमदत्तिस्तु पाण्डवम् ।
कृतप्रतिकृते यत्तौ योधयामासतू रणे ॥ ४९ ॥
भीमसेन भीष्मके वधकी इच्छा रखकर महारथी भूरिश्रवापर चोट करते थे और भूरिश्रवा भीष्मकी विजय चाहता हुआ पाण्डुकुमार भीमसेनपर प्रहार करता था। वे दोनों युद्धमें एक-दूसरेके अस्त्रोंका प्रतीकार करते हुए लड़ रहे थे॥ ४८-४९॥
युधिष्ठिरं तु कौन्तेयं महत्या सेनया वृतम् ।
भीष्माभिमुखमायान्तं भारद्वाजो न्यवारयत् ॥ ५० ॥
(तत्र युद्धमभूद् घोरं तयोः पुरुषसिंहयोः ।)
दूसरी ओर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको विशाल सेनाके साथ भीष्मके सम्मुख आते देख द्रोणाचार्यने रोक दिया; वहाँ उन दोनों पुरुषसिंहोंमें घोर युद्ध हुआ॥ ५० ॥
द्रोणस्य रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ।
श्रुत्वा प्रभद्रका राजन् समकम्पन्त मारिष ॥ ५१ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके रथकी घरघराहट मेघकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी। आर्य! उसे सुनकर प्रभद्रक वीर काँप उठे॥ ५१॥
सा सेना महती राजन् पाण्डुपुत्रस्य संयुगे ।
द्रोणेन वारिता यत्ता न चचाल पदात् पदम् ॥ ५२ ॥
महाराज! उस युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी वह विशाल सेना द्रोणके द्वारा जब रोक दी गयी, तब प्रयत्न करनेपर भी वह एक पग भी आगे न बढ़ सकी॥ ५२॥
चेकितानं रणे यत्तं भीष्मं प्रति जनेश्वर ।
चित्रसेनस्तव सुतः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५३ ॥
जनेश्वर! दूसरी ओर भीष्मके प्रति प्रयत्नपूर्वक आक्रमण करनेवाले क्रोधमें भरे हुए चेकितानको रणभूमिमें आपके पुत्र चित्रसेनने रोक दिया॥ ५३॥
भीष्महेतोः पराक्रान्तश्चित्रसेनः पराक्रमी ।
चेकितानं परं शक्त्या योधयामास भारत ॥ ५४ ॥
तथैव चेकितानोऽपि चित्रसेनमवारयत् ।
तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे ॥ ५५ ॥