महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2226, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भारत! इन सब महारथियोंद्वारा मारी जाती हुई अपनी सेनाको मैं युद्धमें ठहरानेके लिये आपके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं देखता। देवतुल्य पराक्रमी पुरुषसिंह! केवल आप ही उसकी रक्षामें समर्थ हैं। अतः हम पीड़ितोंके लिये आप शीघ्र ही आश्रयदाता होइये’ ।। २२-२३ ।।
संजय उवाच
एवमुक्तो महाराज पिता देवव्रतस्तव । चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु कृत्वा निश्चयमात्मनः ।। २४ ।। तव संधारयन् पुत्रमब्रवीच्छान्तनोः सुतः । दुर्योधन विजानीहि स्थिरो भूत्वा विशाम्पते ।। २५ ।।
संजय कहते हैं—महाराज! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपके ताऊ शान्तनुनन्दन देवव्रतने दो घड़ीतक कुछ चिन्तन करनेके पश्चात् अपना एक निश्चय करके आपके पुत्र दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—‘प्रजानाथ दुर्योधन! सुस्थिर होकर इधर ध्यान दो ।।
पूर्वकालं तव मया प्रतिज्ञातं महाबल । हत्वा दशसहस्राणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।। २६ ।। संग्रामाद् व्यपयातव्यमेतत् कर्म ममाह्निकम् । इति तत् कृतवांश्चाहं यथोक्तं भरतर्षभ ।। २७ ।।
‘महाबली नरेश! पूर्वकालमें मैंने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि दस हजार महामनस्वी क्षत्रियोंका वध करके ही मुझे संग्रामभूमिसे हटना होगा और यह मेरा दैनिक कर्म होगा। भरतश्रेष्ठ! जैसा मैंने कहा था, वैसा अबतक करता आया हूँ ।। २६-२७ ।।
अद्य चापि महत् कर्म प्रकरिष्ये महाबल । अहं वाद्य हतः शेष्ये हनिष्ये वाद्य पाण्डवान् ।। २८ ।।
‘महाबली वीर! आज भी मैं महान् कर्म करूँगा। या तो आज मैं ही मारा जाकर रणभूमिमें सो जाऊँगा या पाण्डवोंका ही संहार करूँगा ।। २८ ।।
अद्य ते पुरुषव्याघ्र प्रतिमोक्ष्ये ऋणं तव । भर्तृपिण्डकृतं राजन् निहतः पृतनामुखे ।। २९ ।।
‘पुरुषसिंह! नरेश! तुम स्वामी हो, मुझपर तुम्हारे अन्नका ऋण है; आज युद्धके मुहानेपर मारा जाकर मैं तुम्हारे उस ऋणको उतार दूँगा’ ।। २९ ।।
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ क्षत्रियान् प्रवपञ्छरैः । आससाद दुराधर्षः पाण्डवानामनीकिनीम् ।। ३० ।।
भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर दुर्धर्ष वीर भीष्मने क्षत्रियोंपर अपने बाणोंकी वर्षा करते हुए पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया ।। ३० ।।