महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2225, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगे ॥ १४ ॥ जयन्तं पाण्डवं दृष्ट्वा त्वत्सैन्यं चाभिपीडितम् । दुर्योधनस्ततो भीष्ममब्रवीद् भृशपीडितः ॥ १५ ॥ पाण्डुनन्दन अर्जुनको जीतते और आपकी सेनाको पीड़ित होती देख दुर्योधन अत्यन्त पीड़ित होकर भीष्मसे बोला— ॥ १५ ॥ एष पाण्डुसुतस्तात श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । दहते मामकान् सर्वान् कृष्णवर्त्मव काननम् ॥ १६ ॥ ‘तात! ये श्वेत घोड़ोंवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिनके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मेरे सारे सैनिकोंको उसी प्रकार दग्ध करते हैं, जैसे दावानल वनको ॥ १६ ॥ पश्य सैन्यानि गाङ्गेय द्रवमाणानि सर्वशः । पाण्डवेन युधां श्रेष्ठ काल्यमानानि संयुगे ॥ १७ ॥ ‘योद्धाओंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन! देखिये, मेरी सेनाएँ सब ओर भाग रही हैं और अर्जुन युद्धस्थलमें खड़े हो उन्हें खदेड़ रहे हैं ॥ १७ ॥ यथा पशुगणान् पालः संकालयति कानने । तथेदं मापकं सैन्यं काल्यते शत्रुतापन ॥ १८ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पितामह! जैसे चरवाहा जंगलमें पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार मेरी यह सेना अर्जुनके द्वारा हाँकी जा रही है ॥ १८ ॥ धनंजयशरैर्भग्नं द्रवमाणं ततस्ततः । भीमोऽप्येवं दुराधर्षो विद्रावयति मे बलम् ॥ १९ ॥ ‘धनंजयके बाणोंसे आहत हो व्यूह भंग करके इधर-उधर भागनेवाली मेरी सेनाको ये दुर्धर्ष वीर भीमसेन भी पीछेसे खदेड़ रहे हैं ॥ १९ ॥ सात्यकिश्चेकितनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । अभिमन्युः सुविक्रान्तो वाहिनीं द्रवते मम ॥ २० ॥ ‘सात्यकि, चेकितान, पाण्डु और माद्रीके पुत्र नकुल-सहदेव और पराक्रमी अभिमन्यु भी मेरी सेनाको भगा रहे हैं ॥ धृष्टद्युम्नस्तथा शूरो राक्षसश्च घटोत्कचः । व्यद्रावयेतां सहसा सैन्यं मम महारणे ॥ २१ ॥ ‘धृष्टद्युम्न तथा शूरवीर राक्षस घटोत्कचने भी सहसा इस महासमरमें आकर मेरी सेनाको मार भगाया है ॥ २१ ॥ वध्यमानस्य सैन्यस्य सर्वैरेतैर्महारथैः । नान्यां गतिं प्रपश्यामि स्थाने युद्धे च भारत ॥ २२ ॥ ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र देवतुल्यपराक्रम । पर्याप्तस्तु भवाञ्शीघ्रं पीडितानां गतिर्भव ॥ २३ ॥